बाढ़ के बाद भी खेती से मुनाफा संभव
बिहार और देश के कई अन्य हिस्सों में हर साल बाढ़ किसानों के लिए बड़ी मुसीबत बनकर आती है। खेतों में लंबा समय तक पानी जमा रहने के कारण बुवाई का चक्र बिगड़ जाता है, जिसका सीधा असर किसान की आमदनी पर पड़ता है। जब तक फसल बाजार तक पहुंचती है, तब तक सब्जियों के दाम गिर चुके होते हैं। हालांकि, कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि थोड़ी सी सावधानी और आधुनिक तकनीक अपनाकर बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के किसान भी नेनुआ की अगात खेती के जरिए अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत कर सकते हैं। समय की बचत और सही किस्म का चुनाव इस खेती की सफलता की चाबी है।
छत पर पौध तैयार करने की अनूठी तकनीक
आमतौर पर किसान खेतों से बाढ़ का पानी पूरी तरह उतर जाने के बाद ही बीज की बुवाई करते हैं, जिसमें काफी समय बर्बाद हो जाता है। भागलपुर के कृषि विशेषज्ञ गूँजेश गुंजन का सुझाव है कि किसान इस प्रक्रिया को तेज करने के लिए अपनी छत का उपयोग कर सकते हैं। सितंबर के महीने में जब बाढ़ का पानी अभी खेतों में ही होता है, किसान घर की छत पर प्लास्टिक या पेपर की ट्रे में नेनुआ के बीजों की बुवाई कर सकते हैं।
इस विधि से फायदा यह होता है कि जैसे ही खेतों से जलजमाव खत्म होता है और जमीन सूखने लगती है, किसान के पास पहले से तैयार पौध उपलब्ध होती है। इस तैयार पौध को सीधे खेत में लगाने से फसल की वृद्धि तेज होती है और समय की भारी बचत होती है। जब सामान्य तरीके से खेती करने वाले किसान उस समय बीज लगा रहे होते हैं, तब अगात पद्धति अपनाने वाले किसानों की फसल बढ़ने लगती है। इससे फसल बाजार में तय समय से पहले पहुंच जाती है और किसान को सब्जियों का सही दाम मिल पाता है।
बेहतर किस्मों का चुनाव है जरूरी
नेनुआ की खेती में बंपर उत्पादन पाने के लिए उन्नत किस्मों का चयन करना बेहद अहम है। कृषि जानकारों के मुताबिक, भागलपुर और आसपास के इलाकों के लिए आलोक, मोहिनी और देशी किस्मों को सबसे उपयुक्त माना गया है। इन किस्मों की विशेषता यह है कि इनमें बीमारियों और कीटों का प्रभाव अन्य किस्मों की तुलना में काफी कम देखने को मिलता है। इनका फलन भी अधिक होता है, जिससे प्रति एकड़ पैदावार में वृद्धि होती है। किसान अपने स्थानीय मिट्टी और जलवायु के अनुसार इन किस्मों में से अपनी पसंद का चुनाव कर सकते हैं।
मुनाफा बढ़ाने का गणित
अगात खेती केवल एक कृषि तकनीक नहीं, बल्कि बाजार की मांग को समय पर पूरा करने का एक स्मार्ट तरीका है। जब किसान समय से पहले फसल तैयार कर लेते हैं, तो वे बाजार के उस दौर का फायदा उठाते हैं जब सब्जियों की आवक कम होती है और कीमतें ऊंचे स्तर पर रहती हैं। बाढ़ प्रभावित इलाकों के किसान अक्सर देरी होने के डर से घबरा जाते हैं, लेकिन ट्रे में पौध तैयार करने वाली यह विधि जोखिम को कम करती है।
- सितंबर में घर की छत पर ट्रे में बीज लगाएं।
- पौधों को पर्याप्त धूप और उचित देखभाल प्रदान करें।
- जैसे ही खेत का पानी उतरे, जमीन तैयार कर रोपाई करें।
- कीटों से बचाव के लिए विशेषज्ञों की सलाह पर कीटनाशकों का प्रयोग करें।
इस तरह की पूर्व-तैयारी न केवल फसलों को बाढ़ के कारण होने वाली देरी से बचाती है, बल्कि किसानों को सालभर मुनाफे की राह पर बनाए रखती है। कृषि जगत में नवाचार अपनाकर छोटे किसान भी अपनी आय को दोगुना करने का सपना साकार कर सकते हैं।
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