आतंकवाद पर चीन का भारत को समर्थन
शंघाई सहयोग संगठन यानी एससीओ के 26वें शिखर सम्मेलन में एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जिसने भू-राजनीतिक समीकरणों को बदल दिया है। इस सम्मेलन में सदस्य देशों ने आतंकवाद, कट्टरपंथ और अलगाववाद के विरुद्ध पूरी मजबूती के साथ एकजुट होने का संकल्प लिया है। जब चीन ने इस संयुक्त घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर किए, तो इसका सीधा असर पाकिस्तान पर पड़ना तय माना जा रहा है। दुनिया जानती है कि पाकिस्तान को अक्सर इन तीन तरह की आतंकी गतिविधियों का केंद्र माना जाता है। ऐसे में चीन द्वारा भारत के स्टैंड का समर्थन करना पाकिस्तान के लिए किसी बड़े कूटनीतिक झटके से कम नहीं है।
बिश्केक घोषणा पत्र और भारत की जीत
बिश्केक में आयोजित शिखर सम्मेलन के दौरान जो आधिकारिक घोषणा पत्र जारी किया गया, उसमें आतंकवाद का मुद्दा केंद्र बिंदु रहा है। इस दस्तावेज पर सभी सदस्य देशों की सहमति और हस्ताक्षर इस बात को पुख्ता करते हैं कि आतंकवाद के प्रति अब किसी भी प्रकार की नरमी नहीं बरती जाएगी। भारत लंबे समय से इस बात पर जोर देता रहा है कि आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में शून्य सहिष्णुता होनी चाहिए। विदेश मंत्रालय ने इस बारे में जानकारी देते हुए बताया कि सभी देशों ने अलगाववाद, कट्टरपंथ और आतंकवाद से निपटने की अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया है।
डबल स्टैंडर्ड की नीति पर रोक
घोषणा पत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सदस्य देश आतंकवाद के सभी स्वरूपों की कड़ी निंदा करते हैं। इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में दोहरा मापदंड या डबल स्टैंडर्ड पूरी तरह से अस्वीकार्य है। किसी भी स्वार्थी उद्देश्य की पूर्ति के लिए आतंकी या अलगाववादी समूहों का इस्तेमाल करना गलत है। घोषणा में संयुक्त राष्ट्र की केंद्रीय भूमिका का समर्थन किया गया है और सभी सदस्य देशों से आह्वान किया गया है कि वे सीमा पार आतंकवादियों की आवाजाही को रोकने के लिए सामूहिक और कड़ी कार्रवाई करें। यह शब्दावली और दृष्टिकोण पूरी तरह से भारत की सुरक्षा प्राथमिकताओं के अनुरूप है।
सुरक्षा चुनौतियों के लिए नई नियमावली
विदेश मंत्रालय ने शिखर सम्मेलन के 13 प्रमुख परिणामों को साझा करते हुए सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए एक महत्वपूर्ण यूनिवर्सल सेंटर की नियमावली का जिक्र किया है। यह केंद्र भविष्य में आतंकवाद और संगठित अपराधों के खिलाफ आपसी सहयोग और सूचना साझा करने की दिशा में एक प्रभावी मंच साबित होगा। यह पहल इस बात का प्रमाण है कि क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर अब सभी देश गंभीर हो रहे हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कड़ा संदेश
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस शिखर सम्मेलन में शहबाज शरीफ और शी जिनपिंग की मौजूदगी में आतंकवाद के खिलाफ बेहद कड़ा और स्पष्ट संदेश दिया। उन्होंने कहा कि आतंकवाद के वित्तपोषण, भर्ती करने वाले नेटवर्क, उग्रवाद और आतंकियों के लिए सुरक्षित ठिकानों के पूरे ढांचे को नष्ट करना अनिवार्य है। प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा कि आतंकवाद के मामले में दोहरे मापदंड के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए। उन्होंने बिना नाम लिए उन देशों को चेतावनी दी जो आतंकवाद को अपनी राज्य नीति का उपकरण बनाते हैं कि उन्हें यह समझना होगा कि आतंकवाद कभी भी किसी की रणनीतिक संपत्ति नहीं बन सकता है।
बीता साल बनाम वर्तमान स्थिति
साल 2025 की स्थिति आज से बिल्कुल अलग और चुनौतीपूर्ण थी। अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद जब एससीओ के रक्षा मंत्रियों की किंगदाओ बैठक हुई थी, तो भारत को इस हमले का उल्लेख करने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी थी। उस समय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया था क्योंकि उसमें न तो आतंकवाद का जिक्र था और न ही पहलगाम हमले का। हालांकि, बाद में तियानजिन शिखर सम्मेलन में एससीओ ने अंततः पहलगाम हमले की निंदा की थी।
पाकिस्तान की कूटनीतिक हार
अब 2026 में चीन का भारत के रुख के साथ पूरी तरह सहमत होना पाकिस्तान के लिए एक बड़ी मुसीबत बन गया है। इस्लामाबाद वर्षों से सीमा पार आतंकवाद को भारत के खिलाफ अपनी नीति का हिस्सा मानता रहा है। एससीओ की सर्वसम्मति ने पाकिस्तान की उस पुरानी रणनीति को कमजोर कर दिया है, जिसके जरिए वह चीन की मदद से आतंकवाद संबंधी अंतरराष्ट्रीय भाषा को नरम बनाने की कोशिश करता था। हालांकि पाकिस्तान को जल्द ही एससीओ की अध्यक्षता मिलने वाली है, लेकिन मौजूदा घोषणा पत्र और क्षेत्रीय सहमति का दबाव उसे अपने व्यवहार में बदलाव लाने के लिए मजबूर कर सकता है।
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