अफगानिस्तान से पकड़ कमजोर पड़ते ही अपनी पुरानी चालों पर लौटा पाकिस्तान, शुरू किया खतरनाक खेल

अफगानिस्तान में अपना प्रभाव खोता देख पाकिस्तान एक बार फिर पुरानी आतंकवादी नीतियों का सहारा ले रहा है। एक हालिया रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि पाकिस्तान अपने रणनीतिक हितों को साधने के लिए आईएसकेपी जैसे आतंकवादी समूहों के प्रति नरम रुख अपना रहा है।

पाकिस्तान की बदलती रणनीति और पुराना ढर्रा

अफगानिस्तान में पाकिस्तान का प्रभाव लगातार कम हो रहा है और इस बदलते समीकरण को देखकर पाकिस्तान फिर से अपने पुराने तौर-तरीकों पर उतर आया है। एक समय था जब पाकिस्तान ने अपने फायदे के लिए चुनिंदा आतंकवादी संगठनों को ढाल की तरह इस्तेमाल किया था, और अब ऐसी खबरें सामने आ रही हैं कि वह उसी पुरानी रणनीति को दोहराने की तैयारी में है। अमेरिकन थिंकर की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि तालिबान और पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव के कारण इस्लामाबाद अब अपनी पकड़ को फिर से मजबूत करने के लिए आतंकवादी समूहों के साथ सांठगांठ करने का जोखिम उठा रहा है।

इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रोविंस (ISKP) पर टिकी नजर

रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला पहलू आईएसकेपी यानी इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रोविंस को लेकर है। ऐसा माना जा रहा है कि पाकिस्तान का तंत्र आईएसकेपी के प्रति एक नरम रुख अपना रहा है ताकि तालिबान पर दबाव बनाया जा सके। रिपोर्ट के अनुसार, आईएसकेपी का नेटवर्क अभी भी पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान जैसे इलाकों में काफी सक्रिय है। इस नेटवर्क को पाकिस्तानी सुरक्षा व्यवस्था के भीतर बैठे कुछ तत्वों से मदद मिलने की बातें भी कही जा रही हैं, जिससे इन आतंकवादियों को अपना काम जारी रखने का मौका मिल रहा है।

तालिबान के गंभीर आरोप

तालिबान और पाकिस्तान के बीच रिश्ते पिछले कुछ समय से किसी भी निचले स्तर पर पहुंच गए हैं। तालिबान का साफ तौर पर आरोप है कि पाकिस्तान अपनी जमीन का इस्तेमाल आईएसकेपी को पनपने और उसे सुरक्षित पनाहगाह देने के लिए कर रहा है। तालिबान के दावों के अनुसार, आईएसकेपी नेता सनाउल्लाह गफारी अक्सर पाकिस्तान में मौजूद आईएसकेपी से जुड़े ठिकानों का दौरा करता रहा है। तालिबान ने जून के महीने में बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा के उन इलाकों में कार्रवाई करने का दावा भी किया था, जिन्हें आईएसकेपी का गढ़ माना जाता है।

रणनीतिक गहराई का पुराना फॉर्मूला

पाकिस्तान हमेशा से अपनी उस पुरानी रणनीति पर चलता आया है जिसे वह 'स्ट्रैटेजिक डेप्थ' यानी रणनीतिक गहराई कहता है। इसका मूल उद्देश्य अफगानिस्तान में एक ऐसी सरकार को सत्ता में बिठाना और समर्थन देना था, जो पाकिस्तान के इशारों पर काम करे। पाकिस्तानी रणनीतिकारों का मानना था कि काबुल में अपनी पसंद की सरकार होने से भारत के खिलाफ उन्हें रणनीतिक बढ़त मिलेगी और उनकी पश्चिमी सीमा भी सुरक्षित रहेगी। हालांकि, अगस्त 2021 में जब तालिबान की सत्ता में वापसी हुई, तो पूरा गणित बिगड़ गया। पाकिस्तान को उम्मीद थी कि तालिबान डूरंड रेखा को मान्यता देगा और टीटीपी के खिलाफ सख्त कदम उठाएगा, लेकिन तालिबान ने अपनी स्वतंत्र नीतियां अपना लीं। इसके बाद से ही दोनों देशों के बीच तनाव, सीमा पर झड़पों और व्यापारिक दबाव की खबरें आम हो गई हैं।

टीटीपी के बाद अब आईएसकेपी चुनौती

अफगानिस्तान के लिए टीटीपी और आईएसकेपी दोनों ही बड़ी सुरक्षा चुनौतियां हैं। जहां टीटीपी पाकिस्तान समर्थित एक विद्रोही समूह के रूप में जाना जाता है, वहीं आईएसकेपी विचारधारा के स्तर पर तालिबान का कट्टर दुश्मन है। आईएसकेपी न केवल तालिबान की सत्ता को अवैध मानता है, बल्कि वह वैश्विक इस्लामिक स्टेट की कट्टरपंथी विचारधारा का प्रसार भी करता है। साल 2021 के बाद से तालिबान ने आईएसकेपी को खत्म करने के लिए कई बड़े अभियान चलाए हैं। ऐसे में अगर पाकिस्तान का हाथ आईएसकेपी के सिर पर आता है, तो यह तालिबान के लिए एक बहुत बड़ी मुसीबत साबित हो सकती है, जिससे पूरे क्षेत्र में हिंसा और अस्थिरता का नया दौर शुरू हो सकता है।

वाखान कॉरिडोर: एक नया भू-राजनीतिक खेल

इस पूरे घटनाक्रम में वाखान कॉरिडोर की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो गई है। यह अफगानिस्तान का एक संकरा भू-भाग है जो सीधे तौर पर चीन के शिनजियांग प्रांत से जुड़ता है। रिपोर्ट के अनुसार, अफगानिस्तान सरकार चीन के साथ संपर्क साधने के लिए इस क्षेत्र में एक सड़क का निर्माण कर रही है। अफगान अधिकारियों के मुताबिक, मई 2026 तक इस परियोजना का करीब 70 फीसदी काम पूरा हो चुका था। यदि यह सीधा मार्ग पूरी तरह से चालू हो जाता है, तो अफगानिस्तान के लिए चीन के साथ व्यापारिक संबंधों और सामान की आवाजाही के लिए पाकिस्तान पर निर्भरता लगभग खत्म हो जाएगी। यही बदलाव पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन गया है क्योंकि उसकी उपयोगिता धीरे-धीरे कम होती जा रही है।

चीन की कनेक्टिविटी और पाकिस्तान की चिंता

अंत में, यह मुद्दा केवल अफगानिस्तान और पाकिस्तान की आपसी दुश्मनी तक सीमित नहीं है। इसमें चीन की कनेक्टिविटी का भी बड़ा पहलू शामिल है। यदि वाखान कॉरिडोर के माध्यम से चीन और अफगानिस्तान के बीच सीधा व्यापारिक गलियारा बनता है, तो पाकिस्तान क्षेत्रीय राजनीति में अपना दबदबा खो देगा। रिपोर्ट यह तर्क देती है कि पाकिस्तान जानबूझकर इस क्षेत्र में गड़बड़ी फैला सकता है ताकि चीन-अफगानिस्तान कनेक्टिविटी प्रभावित हो और चीन को यह महसूस हो कि पाकिस्तान के बिना इस क्षेत्र में शांति या व्यापार संभव नहीं है। यह पाकिस्तान की तरफ से अपनी उपयोगिता साबित करने का एक और कुटिल प्रयास माना जा रहा है।

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