क्या है कृष्णा पादालु परंपरा
श्री कृष्ण जन्माष्टमी का त्योहार पूरे भारत में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है, लेकिन तेलंगाना में इसे मनाने का तरीका काफी अनोखा और आध्यात्मिक है। यहाँ सदियों पुरानी कृष्णा पादालु परंपरा आज भी पूरे उत्साह के साथ निभाई जाती है। इस रस्म के दौरान घर के मुख्य द्वार से लेकर पूजा घर तक चावल के शुद्ध आटे का इस्तेमाल करके बाल-कृष्ण के नन्हे कदमों के निशान बनाए जाते हैं।
घर में खुशहाली का आगमन
इस परंपरा के पीछे गहरी धार्मिक आस्था जुड़ी है। स्थानीय लोगों का मानना है कि मध्यरात्रि के समय जब कान्हा का जन्म होता है, तो वे स्वयं इन पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए घर में प्रवेश करते हैं। माना जाता है कि भगवान कृष्ण माखन की तलाश में घर के भीतर आते हैं और अपने भक्तों को सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद देकर जाते हैं।
पर्यावरण और जीव दया का संदेश
इस अनूठी परंपरा की सबसे बड़ी खासियत इसकी पवित्रता और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता है।
- इस रस्म में किसी भी प्रकार के कृत्रिम रंगों या पेंट का इस्तेमाल नहीं किया जाता है।
- केवल शुद्ध चावल के आटे का ही प्रयोग होता है, जो पूरी तरह से प्राकृतिक है।
- यह परंपरा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भूत दया का संदेश भी देती है।
- चावल के आटे से बने इन पदचिह्नों को चींटियों और अन्य छोटे कीट-पतंगों के भोजन के रूप में देखा जाता है, जिससे जीव मात्र की सेवा का भाव झलकता है।
इस प्रकार, तेलंगाना की यह परंपरा न केवल भक्ति का प्रदर्शन करती है, बल्कि यह सिखाती है कि धर्म और प्रकृति का आपस में गहरा संबंध है।
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