नेपाल में आपदा का तांडव
नेपाल इस वक्त एक बेहद विनाशकारी प्राकृतिक आपदा की चपेट में है। देश के विभिन्न हिस्सों में अचानक आई बाढ़ और भूस्खलन ने तबाही का ऐसा मंजर पेश किया है, जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है। इस संकट की घड़ी में नेपाल के जाने-माने उद्योगपति और चौधरी ग्रुप के चेयरमैन बिनोद चौधरी का बयान सामने आया है। उन्होंने इस आपदा को न केवल अकल्पनीय करार दिया है, बल्कि इसे एक गहरे सदमे के रूप में भी परिभाषित किया है। शुरुआती रिपोर्ट्स और जमीनी हालातों को देखते हुए आशंका जताई जा रही है कि इस भीषण आपदा में 7,000 से अधिक लोगों की जान गई है या वे बुरी तरह प्रभावित हुए हैं।
बिनोद चौधरी का दर्द और अनुभव
काठमांडू में मीडिया से बातचीत करते हुए बिनोद चौधरी ने अपना दुख साझा किया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि नेपाल ने अतीत में कई बड़े संकट देखे हैं। साल 2015 का भयावह भूकंप हो, कोविड महामारी की मार हो, या फिर पिछले साल आई प्राकृतिक आपदाएं; नेपाल ने हर बार मजबूती से सामना किया है। हालांकि, इस बार का अनुभव बिल्कुल अलग और डरावना था। चौधरी के शब्दों में कहें तो, इस बार की तबाही के लिए कोई भी देश या वहां की व्यवस्था तैयार नहीं थी। उन्होंने बताया कि उनकी पहली प्रतिक्रिया असीम दुख और गहरा झटका थी, क्योंकि उन्होंने अपने आंखों के सामने सब कुछ बिखरते देखा है।
मिनटों में गायब हो गए गांव
त्रासदी की भयावहता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि नेपाल के पर्वतीय इलाकों में कुछ ही मिनटों के भीतर पूरे के पूरे गांव पानी और मलबे के साथ बह गए। बिनोद चौधरी ने बताया कि हालात इतने नियंत्रण से बाहर थे कि किसी को यह समझ नहीं आ रहा था कि विनाश का यह सिलसिला कहां जाकर थमेगा। उन्होंने कहा, 'हमने देखा कि पक्के पुल ढह गए, रास्ते गायब हो गए और हजारों लोग इस आपदा की चपेट में आ गए। यह सब इतनी तेजी से हुआ कि किसी को संभलने का मौका तक नहीं मिला।'
चीन के बुनियादी ढांचे पर बड़ा सवाल
इस आपदा के दौरान चीन के साथ जुड़े सीमावर्ती क्षेत्रों में हुए नुकसान पर बिनोद चौधरी ने गंभीर चिंता और आश्चर्य व्यक्त किया। चीन को दुनिया भर में अपने आधुनिक और बेहद मजबूत बुनियादी ढांचे के लिए जाना जाता है। लेकिन इस बाढ़ का प्रकोप इतना शक्तिशाली था कि चीन से जोड़ने वाले अत्याधुनिक ढांचे और पुल भी ताश के पत्तों की तरह ढह गए। चौधरी ने तंज कसते हुए कहा कि अगर चीन जैसा मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर इस आपदा के आगे नहीं टिक सका, तो इससे यह साफ होता है कि इस प्राकृतिक प्रलय का स्तर कितना विनाशकारी रहा होगा। यह घटना अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बुनियादी ढांचे की सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन के खतरों पर नई बहस छेड़ रही है।
राहत कार्यों में जुटी सरकार
गंभीर संकट के बीच बिनोद चौधरी ने नेपाल सरकार और प्रशासन की सक्रियता की सराहना की। उन्होंने कहा कि पहली बार ऐसा देखा गया है कि पूरा सरकारी तंत्र और आपदा प्रबंधन विभाग एक साथ मिलकर काम कर रहा है। प्रशासन का समन्वय इस बार काफी प्रभावी रहा है। उन्होंने बताया कि अब तक हेलीकॉप्टरों की मदद से बड़ी संख्या में लोगों को सुरक्षित स्थानों पर एयरलिफ्ट किया जा चुका है और अनगिनत जिंदगियां बचाई गई हैं। चौधरी के अनुसार, इस समय जीवित बचे लोगों को बचाना और उन्हें हर संभव राहत सामग्री उपलब्ध कराना ही प्राथमिकता होनी चाहिए।
तबाही के आंकड़े और आगे की चुनौती
हालांकि बचाव कार्य युद्ध स्तर पर चल रहे हैं, लेकिन तबाही का दायरा बहुत बड़ा है। शुरुआती आंकड़ों के अनुसार, मृतकों की संख्या 7,000 के आंकड़े तक पहुंच सकती है क्योंकि कई ऐसे गांव हैं जो अब मानचित्र से ही मिट चुके हैं। लगातार खराब मौसम और टूट चुकी सड़कों के कारण राहत और बचाव दल को भीषण चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। पर्वतीय क्षेत्रों में भूस्खलन के कारण कई रास्ते बंद हैं, जिससे दुर्गम इलाकों तक पहुंचना कठिन हो गया है। नेपाल सरकार, सुरक्षा बल और अंतरराष्ट्रीय राहत एजेंसियां इस वक्त मलबे में दबे लोगों को खोजने की जद्दोजहद में लगी हुई हैं। यह आपदा नेपाल के लिए एक बहुत बड़ा सबक है, जो जलवायु परिवर्तन और भविष्य की सुरक्षा नीतियों पर फिर से सोचने के लिए मजबूर कर रहा है।
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