नेपाल में प्रलयकारी बाढ़ का मंजर, इतिहास की वे 5 आपदाएं जब पानी के सैलाब ने ली लाखों लोगों की जान

नेपाल में आई भीषण बाढ़ से अब तक 626 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि बचाव अभियान लगातार जारी है। हालांकि, इतिहास गवाह है कि जलप्रलय की ऐसी घटनाएं पहले भी कई बार मानवता के लिए काल बनकर आई हैं, जिनमें लाखों लोगों ने अपनी जान गंवाई है।

नेपाल में तबाही और बचाव कार्य

पड़ोसी देश नेपाल में हाल ही में आई फ्लैश फ्लड यानी अचानक आई बाढ़ ने भारी विनाश किया है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस आपदा में अब तक कम से कम 626 लोगों की मृत्यु हो चुकी है। बचाव दलों ने अथक प्रयास करते हुए अब तक 4451 लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला है। राहत शिविरों और बचाव अभियानों में बड़ी संख्या में विदेशी नागरिकों की भागीदारी रही है, जिनमें से 187 विदेशी नागरिक और 114 भारतीय शामिल हैं। हालांकि, अभी भी 24 से अधिक लोग लापता बताए जा रहे हैं और अधिकारियों का मानना है कि मरने वालों का आंकड़ा बढ़ सकता है। लाखों लोग इस भीषण आपदा से प्रभावित हुए हैं और आने वाले दिनों में भी खतरा पूरी तरह टला नहीं है।

बाढ़ का खौफनाक इतिहास

बाढ़ को अक्सर एक सामान्य मौसमी आपदा के रूप में देखा जाता है, लेकिन इतिहास के पन्नों में ऐसी घटनाएं दर्ज हैं जिन्होंने पूरी सभ्यताओं, शहरों और बस्तियों को मिटा दिया। नदियों ने अपना बहाव बदल दिया और बांधों के टूटने से जो जलप्रलय आया, उसने लोगों को संभलने का मौका तक नहीं दिया। इन आपदाओं का सबसे भयावह पहलू यह रहा कि पानी उतरने के बाद भी संकट खत्म नहीं हुआ, बल्कि बीमारियां, भुखमरी और विस्थापन ने बची हुई आबादी को अपनी चपेट में ले लिया। आइए जानते हैं इतिहास की पांच सबसे घातक बाढ़ों के बारे में।

1. चीन की 1931 की महा-बाढ़

इतिहास की सबसे घातक बाढ़ों की सूची में 1931 में चीन में आई बाढ़ को शीर्ष स्थान दिया जाता है। उस समय भारी बारिश और पहाड़ों से पिघली बर्फ ने चीन की यांग्त्से, हुआंग हे यानी येलो रिवर और हुआई नदी को उफान पर ला दिया था। अगस्त 1931 में देखते ही देखते लगभग 88 हजार वर्ग किलोमीटर जमीन पूरी तरह जलमग्न हो गई, जबकि 21 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र आंशिक रूप से बाढ़ की चपेट में आया। इस आपदा से करीब 8 करोड़ लोग बेघर हो गए थे। केवल डूबने से ही 1 लाख 40 हजार लोगों की मौत हुई थी, लेकिन बाढ़ के बाद फैली बीमारियों और अकाल के कारण मरने वालों का कुल आंकड़ा 8 लाख 50 हजार से लेकर 40 लाख तक बताया जाता है।

2. 1887 की येलो रिवर की आपदा

चीन के इतिहास में 1887 का साल भी एक काले अध्याय की तरह दर्ज है। सितंबर और अक्टूबर के महीनों में येलो रिवर के तटबंध टूट गए, जिससे लगभग 50 हजार वर्ग किलोमीटर का इलाका डूब गया। इस तबाही के बाद महामारी और अकाल ने जानमाल का भारी नुकसान किया। अमेरिकी राजनयिकों के दस्तावेजों के अनुसार, केवल हेनान प्रांत में ही 25 लाख लोग बुरी तरह प्रभावित हुए थे। अनुमान लगाया जाता है कि इस जलप्रलय में 9 लाख से 20 लाख के बीच लोगों ने दम तोड़ दिया था।

3. 1938 की कृत्रिम बाढ़

साल 1938 में आई बाढ़ प्राकृतिक आपदा के साथ-साथ युद्ध रणनीति का परिणाम थी। दूसरे चीन-जापान युद्ध के दौरान चीनी राष्ट्रीय सेना ने जापानी सैनिकों की प्रगति को रोकने के लिए काईफेंग के पास येलो रिवर के तटबंधों को तोड़ने का फैसला किया। 9 जून 1938 को जब तटबंध तोड़े गए, तो पानी ने 54 हजार वर्ग किलोमीटर के इलाके को अपनी आगोश में ले लिया। इस विनाशकारी कदम से करीब 40 लाख लोग विस्थापित हुए। अलग-अलग शोधों के मुताबिक, इस घटना के बाद फैली भुखमरी और बीमारियों के कारण 5 लाख से 9 लाख के बीच लोगों की मृत्यु हुई, जबकि कुछ अध्ययनों में यह आंकड़ा 8 लाख से अधिक बताया गया है।

4. 1975 की बांगकियाओ बांध त्रासदी

अगस्त 1975 में टाइफून नीना के कारण चीन के हेनान प्रांत में ऐसी मूसलाधार बारिश हुई कि स्थिति अनियंत्रित हो गई। नतीजतन, बांगकियाओ बांध और 61 अन्य बांध ढह गए। इस दौरान पानी की 10 मीटर ऊंची लहरें कई किलोमीटर चौड़े इलाके में फैल गईं। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 26 हजार लोगों की डूबने से मौत हुई थी, लेकिन बाद में महामारी और भुखमरी से 1 लाख 45 हजार और लोगों ने जान गंवाई। कुल मिलाकर इस आपदा में 2 लाख 20 हजार से अधिक लोग मारे गए और करीब 1 करोड़ लोग प्रभावित हुए।

5. 1970 का भोला चक्रवात

12 से 13 नवंबर 1970 के बीच बंगाल की खाड़ी में आया 'भोला चक्रवात' इतिहास के सबसे घातक चक्रवातों में गिना जाता है। उस समय के पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) के तटीय इलाकों में 10.5 मीटर ऊंची तूफानी लहरें घुस गईं। इन लहरों ने पूरे के पूरे गांव और बस्तियों को समुद्र में समा लिया। विश्व मौसम विज्ञान संगठन और एनओएए के अनुसार, इस आपदा में 3 लाख से 5 लाख लोगों ने अपनी जान गंवाई। पीने के पानी की कमी और महामारी ने तबाही के इस मंजर को और भी दर्दनाक बना दिया था।

बाढ़ के बाद का असली संकट

इन सभी घटनाओं में एक बात समान रही है कि मुख्य आपदा के बाद भी स्थिति सामान्य नहीं हुई। पीने के पानी का अभाव, भोजन की किल्लत और महामारी का प्रकोप अक्सर बाढ़ के उतरने के बाद ही सामने आता है। यही कारण है कि इतिहास की इन त्रासदियों में मरने वालों की सही संख्या का आकलन करना बहुत चुनौतीपूर्ण होता है, क्योंकि कई मामलों में केवल डूबकर मरने वालों को ही आधिकारिक रूप से दर्ज किया गया था।

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