बागेश्वर: प्रेमा कोरंगा की डेयरी ने बदली पशुपालकों की तकदीर, हर महीने हो रही एक लाख रुपये से अधिक की कमाई

उत्तराखंड के बागेश्वर जिले में एक स्थानीय डेयरी उद्यम ग्रामीण पशुपालकों के लिए आर्थिक संबल बन गया है, जहाँ दूध की नियमित बिक्री से किसानों को हर महीने लाखों की आय सुनिश्चित हो रही है।

पशुपालकों के लिए आय का नया जरिया

बागेश्वर शहर के सरस मार्केट के पास संचालित एक डेयरी इकाई स्थानीय पशुपालन व्यवसाय को नई ऊंचाई पर ले जा रही है। प्रेमा कोरंगा द्वारा संचालित इस डेयरी से वर्तमान में 25 से अधिक पशुपालक सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं। यह पहल न केवल दूध के उचित दाम दिलाने में सहायक सिद्ध हो रही है, बल्कि ग्रामीण स्तर पर रोजगार के नए द्वार भी खोल रही है। डेयरी से जुड़े काश्तकारों को हर महीने एक लाख रुपये से अधिक का भुगतान किया जा रहा है, जो स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए एक सकारात्मक संकेत है।

दूध की बिक्री की समस्या से मिली मुक्ति

प्रेमा कोरंगा का कहना है कि पशुपालकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने उत्पाद को बेचने के लिए एक विश्वसनीय बाजार ढूंढने की होती है। अब इस डेयरी के माध्यम से गांव-गांव से दूध एकत्र किया जाता है, जिससे पशुपालकों को अपना उत्पाद बेचने के लिए दूर-दराज के बाजारों की खाक नहीं छाननी पड़ती। उन्हें उनके घर के पास ही दूध का उचित मूल्य मिल जाता है। यह व्यवस्था उन छोटे और सीमांत किसानों के लिए विशेष रूप से फायदेमंद साबित हो रही है, जिनकी आजीविका पूरी तरह से पशुपालन पर निर्भर है। नियमित भुगतान मिलने से परिवारों को आर्थिक सुरक्षा का अनुभव हो रहा है, जिससे वे भविष्य में पशुपालन के व्यवसाय को और अधिक विस्तार देने के लिए प्रेरित हो रहे हैं।

डेयरी उत्पादों की बढ़ती मांग

इस डेयरी में केवल दूध ही नहीं बेचा जाता, बल्कि दूध से जुड़े कई मूल्यवर्धित उत्पाद भी तैयार किए जाते हैं। यहां संग्रहित किए गए दूध का उपयोग ताजा दही, शुद्ध घी और छाछ जैसे उत्पादों को बनाने में होता है। उपभोक्ताओं को भी इसका सीधा लाभ मिल रहा है, क्योंकि उन्हें बाजार में बिकने वाले पैकेट बंद उत्पादों की तुलना में ताजा और शुद्ध सामग्री स्थानीय स्तर पर उपलब्ध हो रही है। उत्पादन से लेकर प्रसंस्करण और बिक्री तक की पूरी प्रक्रिया में स्थानीय लोगों की सक्रिय भागीदारी बनी हुई है, जिससे क्षेत्र में स्वरोजगार की संभावनाएं लगातार बढ़ रही हैं।

पशुपालन में निवेश की नई उम्मीदें

प्रेमा कोरंगा के अनुसार, स्थानीय दूध की खपत जिस प्रकार से बढ़ रही है, उसे देखते हुए भविष्य में पशुपालन के क्षेत्र में निवेश की अपार संभावनाएं हैं। यदि पशुपालकों को दूध के बदले नियमित भुगतान मिलता रहे, तो ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक लोग इस पेशे को अपना सकते हैं। दूध एक खराब होने वाली वस्तु है, इसलिए यदि इसे समय पर बाजार न मिले, तो किसानों को भारी नुकसान झेलना पड़ता है। लेकिन स्थानीय स्तर पर डेयरी की उपलब्धता ने किसानों को इस चिंता से पूरी तरह मुक्त कर दिया है।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए मील का पत्थर

बागेश्वर जैसे पहाड़ी जिले के लिए, जहां खेती के साथ-साथ पशुपालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, ऐसी छोटी डेयरी इकाइयां एक बड़े बदलाव की वाहक बन सकती हैं। प्रेमा कोरंगा की यह पहल दर्शाती है कि यदि सही दिशा में प्रयास किया जाए, तो स्थानीय संसाधनों का उपयोग करके ही स्वरोजगार पैदा किया जा सकता है। 25 से अधिक पशुपालकों का इस डेयरी से जुड़ना और उन्हें हर महीने एक लाख रुपये से अधिक का भुगतान होना इस बात का प्रमाण है कि संगठित होकर काम करने से किसानों की आय में निश्चित रूप से वृद्धि की जा सकती है। इससे न केवल पशुओं की संख्या बढ़ाने को प्रोत्साहन मिलेगा, बल्कि दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में भी नई तकनीक और निवेश को बढ़ावा मिलेगा।

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