परीक्षा की घोषणा और बढ़ता तनाव
मध्य प्रदेश में शिक्षा विभाग द्वारा स्पेशल टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट यानी एमपी स्पेशल टीईटी (MP Special TET) की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। आधिकारिक जानकारी के अनुसार, इस परीक्षा का आयोजन आगामी 12 अक्टूबर 2026 को किया जाना है। हालांकि परीक्षा की तारीख तय होने के बावजूद, प्रदेश के शिक्षकों के बीच एक गहरा भ्रम पैदा हो गया है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि विभाग ने अभी तक ऐसी कोई स्पष्ट सूची जारी नहीं की है जिससे यह पता चल सके कि किन शिक्षकों के लिए यह परीक्षा अनिवार्य है और किसे इससे छूट मिलेगी।
विभागीय स्पष्टीकरण का अभाव
शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने मौखिक रूप से यह संकेत दिया है कि जिन शिक्षकों की अंकसूची पर पहले से ही टीईटी उत्तीर्ण होने का उल्लेख है, उन्हें इस नई परीक्षा से छूट दी जा सकती है। लेकिन, बिना किसी आधिकारिक लिखित अधिसूचना या दिशा-निर्देश के, शिक्षक अपनी नौकरी की सुरक्षा को लेकर आशंकित हैं। लिखित नियमों के अभाव में हज़ारों शिक्षक इस उधेड़बुन में हैं कि क्या उन्हें परीक्षा में शामिल होना चाहिए या नहीं, क्योंकि स्पष्टता न होने से भविष्य में प्रशासनिक कार्रवाई का डर बना हुआ है।
क्या है पूरा विवाद?
शिक्षक संगठनों और संबंधित शिक्षकों के अनुसार, विवाद का केंद्र बिंदु वे संविदा शिक्षक हैं जिन्हें वर्ष 2005 और 2009 के बीच नियुक्त किया गया था। उस दौरान व्यापम (Vyapam) के माध्यम से आयोजित चयन प्रक्रिया के उपरांत जो प्रमाणपत्र दिए गए थे, उनका नाम ‘संविदा शाला शिक्षक पात्रता परीक्षा’ था। प्रशासन द्वारा इन पुराने प्रमाणपत्रों और वर्तमान टीईटी के बीच तकनीकी अंतर या समानता को स्पष्ट न किए जाने के कारण असमंजस की स्थिति बन गई है।
शिक्षकों का यह तर्क है कि सर्वोच्च न्यायालय की गाइडलाइन के अनुसार एक बार पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण कर लेना ही पर्याप्त है। ऐसे में नई व्यवस्था या अपडेटेड सिलेबस के नाम पर बार-बार परीक्षा में बैठने के लिए मजबूर करना तर्कहीन है।
उलझन पैदा करने वाले तकनीकी बिंदु
इस मामले में कुछ अन्य तकनीकी पहलू भी हैं जो स्थिति को और जटिल बना रहे हैं:
- सिलेबस में समानता: वर्ष 2005 और 2009 के दौरान व्यापम द्वारा ली गई परीक्षा का पाठ्यक्रम काफी हद तक मौजूदा टीईटी सिलेबस से मिलता-जुलता था। शिक्षक सवाल उठा रहे हैं कि उसी स्तर की परीक्षा दोबारा देने का क्या औचित्य है।
- भेदभाव का आरोप: जिन शिक्षकों की नियुक्ति 1999 और 2004 के बीच बिना किसी लिखित परीक्षा के हुई थी, उन्हें बाद में ऊंचे पदों पर पदोन्नत कर दिया गया। अब उन्हें छूट देना और अन्य शिक्षकों के लिए परीक्षा अनिवार्य करना भेदभावपूर्ण माना जा रहा है।
- हायर पोस्ट चार्ज का पेच: कई शिक्षक वर्तमान में ‘हायर पोस्ट चार्ज’ पॉलिसी के तहत उच्च ग्रेड लेवल पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। ऐसे में यह स्पष्ट नहीं है कि उन्हें अपने मूल पद के आधार पर आवेदन करना चाहिए या उस उच्च पद के आधार पर जिस पर वे कार्यरत हैं।
फिलहाल, परीक्षा की तारीख नजदीक आने के साथ शिक्षकों की चिंताएं लगातार बढ़ती जा रही हैं और वे प्रशासन से जल्द से जल्द लिखित स्पष्टीकरण जारी करने की मांग कर रहे हैं।
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