परमाणु सिंडिकेट का काला इतिहास: पाकिस्तान से सावधान रहने के लिए भारत ने जापान को दी चेतावनी

भारत ने जापान को आगाह किया है कि वह पाकिस्तान के साथ संवेदनशील रक्षा तकनीक साझा करने में अत्यधिक सावधानी बरते। इस चेतावनी के पीछे पाकिस्तान के कुख्यात परमाणु तस्कर अब्दुल कदीर खान और उनके द्वारा वैश्विक स्तर पर परमाणु रहस्यों की बिक्री का काला इतिहास है।

पाकिस्तान का परमाणु इतिहास और भारत की चिंता

भारत ने हाल ही में जापान को पाकिस्तान के विवादास्पद और खतरनाक ट्रैक रिकॉर्ड के प्रति सचेत किया है। नई दिल्ली ने टोक्यो को स्पष्ट रूप से आगाह किया है कि पाकिस्तान का इतिहास संवेदनशील और उच्च-स्तरीय तकनीकों को चुराने और उन्हें गलत हाथों में सौंपने का रहा है। भारत ने जापान को याद दिलाया है कि संवेदनशील डेटा और एडवांस्ड टेक्नोलॉजी किसी भी स्थिति में पाकिस्तान जैसे देश के पास नहीं जानी चाहिए। इस चेतावनी के समर्थन में भारत ने अब्दुल कदीर खान, जिन्हें एक्यू खान के नाम से जाना जाता है, के तथाकथित न्यूक्लियर सिंडिकेट का उदाहरण दिया है। यह वही सिंडिकेट है जिसने सत्तर के दशक में नीदरलैंड्स से यूरेनियम संवर्धन के डिजाइन्स चुराए थे और बाद में उन परमाणु रहस्यों को उत्तर कोरिया, ईरान और लीबिया जैसे देशों को खुलेआम बेच दिया था।

परमाणु माफिया के रूप में अब्दुल कदीर खान

पाकिस्तान को परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र बनाने वाले वैज्ञानिक के रूप में पहचाने जाने वाले अब्दुल कदीर खान का नाम आज एक वैज्ञानिक से अधिक एक न्यूक्लियर माफिया के तौर पर लिया जाता है। भारत ने जापान के रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइजुमी के साथ हुई रक्षा वार्ता और युद्धपोत से जुड़ी डील के दौरान यह मुद्दा उठाया है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने जापान को स्पष्ट रूप से सलाह दी है कि वे अपनी किसी भी अत्याधुनिक रक्षा तकनीक को पाकिस्तान के साथ साझा करने की गलती न करें, क्योंकि इस बात की प्रबल संभावना है कि वह तकनीक वहां से आगे किसी अन्य देश को स्थानांतरित कर दी जाएगी। भारत ने जापान को उस समय की याद दिलाई है जब एक्यू खान ने वैश्विक स्तर पर परमाणु हथियारों का एक काला बाजार खड़ा कर दिया था।

क्या था एक्यू खान का न्यूक्लियर ब्लैक मार्केट?

इस खौफनाक अध्याय की शुरुआत सत्तर के दशक में हुई थी, जब अब्दुल कदीर खान नीदरलैंड्स की यूरेनियम संवर्धन कंपनी यूरेन्को में कार्यरत थे। उस दौरान उन्होंने बड़ी चतुराई से सेंट्रीफ्यूज और यूरेनियम एनरिचमेंट से संबंधित अत्यंत गोपनीय दस्तावेजों और डिजाइन्स को चुरा लिया। इन डिजाइन्स का उपयोग करते हुए पाकिस्तान ने अपने परमाणु हथियार तो बना लिए, लेकिन उनकी भूख यहीं शांत नहीं हुई। अस्सी और नब्बे के दशक के दौरान, खान ने अंतरराष्ट्रीय तस्करों और बिचौलियों का एक ऐसा जाल बुना, जिसने परमाणु रहस्यों को बाजार में बिकने वाली वस्तु बना दिया। इस सिंडिकेट ने न केवल पैसा कमाया, बल्कि उन देशों को भी परमाणु सामग्री पहुंचाई जिन पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लगे हुए थे।

किन देशों तक पहुंचे परमाणु रहस्य?

एक्यू खान के इस नेटवर्क ने वैश्विक सुरक्षा के लिए कई खतरे पैदा किए, जिनमें तीन नाम प्रमुख हैं:

  • उत्तर कोरिया: पाकिस्तान और उत्तर कोरिया का सौदा सबसे विनाशकारी साबित हुआ। पाकिस्तान ने उत्तर कोरिया को सेंट्रीफ्यूज तकनीक दी और बदले में नोडोंग मिसाइल तकनीक प्राप्त की। इसी नोडोंग मिसाइल को पाकिस्तान में गोरी मिसाइल का नाम दिया गया। आज उत्तर कोरिया जो परमाणु धमकियां दे रहा है, उसकी नींव में पाकिस्तान का यही सहयोग है।
  • ईरान: अस्सी के दशक के अंत में एक्यू खान के सिंडिकेट ने ईरान को P-1 सेंट्रीफ्यूज के डिजाइन्स और महत्वपूर्ण कलपुर्जे बेचे। ईरान के परमाणु कार्यक्रम के तेजी से विस्तार में पाकिस्तान से मिली इस मदद की भूमिका अत्यंत निर्णायक रही है।
  • लीबिया: मुअम्मर गद्दाफी के शासनकाल में लीबिया ने करोड़ों डॉलर खर्च करके एक्यू खान से परमाणु बम का पूरा खाका खरीदा था। वर्ष 2003 में जब लीबिया ने अपने कार्यक्रम का खुलासा किया, तो वहां चीनी भाषा में लिखे ऐसे डिजाइन्स मिले जो स्पष्ट रूप से पाकिस्तान के माध्यम से आपूर्ति किए गए थे।

पाकिस्तान के झूठ का पर्दाफाश

वर्ष 2004 में जब अमेरिकी और वैश्विक खुफिया एजेंसियों ने एक्यू खान के पूरे नेटवर्क का भंडाफोड़ किया, तो पाकिस्तान की सरकार और सेना दोनों ने अपने बचाव का रास्ता खोजा। उस समय के राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ ने पूरा दोष एक्यू खान पर मढ़ दिया। इसके बाद खान को टेलीविजन पर सार्वजनिक रूप से माफी मांगने के लिए मजबूर किया गया। दुनिया जानती थी कि पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई की सीधी सरपरस्ती और अनुमति के बिना इतना विशाल अंतरराष्ट्रीय परमाणु जाल बिछाना किसी एक व्यक्ति के बस की बात नहीं थी। बाद के वर्षों में उन्हें घर में नजरबंद रखा गया, लेकिन पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों को उनसे सीधे पूछताछ करने की इजाजत कभी नहीं दी।

भारत ने जापान को क्यों किया आगाह?

भारत और जापान के बीच रक्षा और उभरती हुई नई तकनीकों के क्षेत्र में रणनीतिक साझेदारी बढ़ रही है। भारत ने इस साझेदारी के महत्व को समझते हुए जापान को स्पष्ट किया है कि पाकिस्तान के साथ तकनीक साझा करने के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। इस अलर्ट के पीछे निम्नलिखित प्रमुख कारण हैं:

  • तकनीकी रिसाव का जोखिम: यदि जापान की कोई भी संवेदनशील या दोहरे उपयोग वाली सैन्य तकनीक पाकिस्तान को मिलती है, तो यह मान लेना तर्कसंगत है कि वह उत्तर कोरिया या चीन के हाथों में पहुंच जाएगी।
  • उत्तर कोरिया का खतरा: उत्तर कोरिया आए दिन जापान की समुद्री सीमा की ओर मिसाइलें दागता है। जिस उत्तर कोरिया से जापान की सीधी दुश्मनी है, उसे परमाणु शक्ति बनाने वाला मूल खिलाड़ी पाकिस्तान ही है। यदि जापानी तकनीक पाकिस्तान के जरिए उत्तर कोरिया तक पहुंचती है, तो यह जापान की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सीधी चुनौती बन जाएगी।
  • चीन और पाकिस्तान का गठबंधन: वर्तमान में पाकिस्तान पूरी तरह से चीन के प्रभाव में है। पाकिस्तान को दी गई कोई भी तकनीक बिना देरी के चीन के पास पहुंच जाएगी, जो भारत और जापान दोनों के लिए इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में एक बड़ा खतरा है।

गैर-जिम्मेदार परमाणु राष्ट्र का सच

एक्यू खान का सिंडिकेट यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि पाकिस्तान एक गैर-जिम्मेदार परमाणु ताकत है। जबकि भारत का रिकॉर्ड हमेशा स्पष्ट रहा है और भारत ने अपनी नो फर्स्ट यूज नीति के माध्यम से परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने की जिम्मेदारी निभाई है, वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान ने इन हथियारों को एक बिजनेस मॉडल की तरह इस्तेमाल किया है। वर्तमान में जब दुनिया एआई और आधुनिक तकनीक के युग में प्रवेश कर रही है, तब तकनीक की सुरक्षा का मुद्दा सबसे महत्वपूर्ण है। भारत द्वारा जापान को दिया गया यह अलर्ट केवल एक कूटनीतिक सलाह नहीं है, बल्कि दुनिया को याद दिलाने का प्रयास है कि इतिहास की अनदेखी कितनी घातक हो सकती है। यदि पाकिस्तान जैसे देशों पर भरोसा किया गया, तो भविष्य में एक्यू खान जैसा कोई नया सिंडिकेट फिर से जन्म ले सकता है जो वैश्विक शांति को गंभीर संकट में डाल देगा।

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