बागेश्वर में सांतू-आठू लोकपर्व की धूम, मायके आईं गौरा और उन्हें लेने पहुंचे शिव

उत्तराखंड के बागेश्वर में पारंपरिक सांतू-आठू पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है, जिसमें गौरा और शिव के पौराणिक संबंधों को लोकगीतों और अनुष्ठानों के माध्यम से जीवंत किया जाता है।

परंपरा और आस्था का संगम

उत्तराखंड के बागेश्वर में कुमाऊं की समृद्ध लोक संस्कृति से ओतप्रोत सांतू-आठू, जिसे सातूं-आठूँ के नाम से भी जाना जाता है, बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। यह उत्सव महज धार्मिक अनुष्ठानों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह मायके और ससुराल के बीच के खूबसूरत रिश्तों और पारिवारिक संवेदनाओं को भी दर्शाता है।

गौरा और महेश की पौराणिक कथा

इस पर्व के दौरान माता गौरा को बहन और भगवान शिव को जीजाजी के रूप में पूजने की परंपरा है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, गौरा रुष्ट होकर अपने मायके आ जाती हैं। इस दौरान घर के आंगन में लोकगीत गूंजते हैं और पारंपरिक रस्में निभाई जाती हैं। पंचमी तिथि से ही इस पर्व की तैयारियों का सिलसिला शुरू हो जाता है, जो सातूं और आठूं तक विशेष रूप से चलता है।

आठूं पर विदाई की रस्में

पर्व की मुख्य कड़ी सातूं के दिन गौरा का अपने मायके आने का आगमन है। इसके अगले दिन यानी आठूं को भगवान महेश यानी शिव उन्हें वापस लेने के लिए उनके मायके पहुंचते हैं। इस दौरान पूरा माहौल लोक संस्कृति के रंगों में रंगा नजर आता है। बागेश्वर के विभिन्न घरों में इस लोकपर्व की रौनक देखने लायक है, जहां लोग पूरी निष्ठा के साथ इन प्राचीन रीति-रिवाजों का पालन कर रहे हैं।

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