अनुकंपा नियुक्ति पर हाईकोर्ट की दो टूक
झारखंड हाईकोर्ट ने अनुकंपा के आधार पर नौकरी दिए जाने के विषय में एक अत्यंत संवेदनशील और ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि किसी बेटी का वैवाहिक दर्जा उसके पिता के निधन के बाद मिलने वाली अनुकंपा नियुक्ति के अधिकार को समाप्त नहीं कर सकता है। जस्टिस दीपक रोशन की पीठ ने कोयला खान भविष्य निधि संगठन (CMPFO) को फटकार लगाते हुए निर्देश दिया है कि वे दिवंगत कर्मचारी की बेटी को अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति प्रदान करें। कोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया को पूरा करने के लिए प्रबंधन को 8 सप्ताह का समय दिया है।
क्या था पूरा मामला
इस पूरे प्रकरण की शुरुआत धनबाद स्थित कोयला खदान से जुड़ी है। वहां सहायक के पद पर तैनात अर्जुन प्रसाद का निधन 25 नवंबर 2013 को हुआ था। उनके परिवार में उनकी बुजुर्ग पत्नी, एक बेटी और दो बेटे मौजूद थे। अर्जुन प्रसाद की मृत्यु के बाद परिवार ने बेटी को अनुकंपा पर नौकरी दिए जाने की मांग उठाई थी। प्रबंधन ने जुलाई 2017 में इस दावे को यह कहते हुए नकार दिया कि बेटी शादीशुदा है, इसलिए वह नियमों के दायरे में नियुक्ति की पात्र नहीं है।
कानूनी लड़ाई और प्रबंधन का रवैया
प्रबंधन के इस फैसले के खिलाफ बेटी ने 2023 में झारखंड हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद महिला ने फिर से आवेदन दिया, लेकिन फरवरी 2024 में अवमानना याचिका की सुनवाई के समय भी कंपनी ने उसे फिर से खारिज कर दिया। कंपनी का तर्क था कि चूंकि महिला विवाहित है, उसके पति की अपनी कमाई है और मृत कर्मचारी के दो बेटे भी हैं, इसलिए वह पिता पर आश्रित नहीं मानी जा सकती। इन तर्कों के जवाब में याचिकाकर्ता ने पुन: अदालत की शरण ली और कंपनी के निर्णय को चुनौती दी।
किडनी दान करने वाली मां और बदहाल स्थिति
याचिकाकर्ता की तरफ से वकील रत्नेश कुमार ने कोर्ट को बताया कि दिवंगत कर्मचारी की पत्नी (याचिकाकर्ता की मां) काफी वृद्ध हैं। महिला ने अपने पति के जीवित रहते हुए उन्हें एक किडनी दान की थी, जिसके कारण उनका स्वास्थ्य अब ठीक नहीं रहता और वह शारीरिक रूप से काम करने की स्थिति में बिल्कुल नहीं हैं। मां ने अपनी देखरेख के लिए अपनी बेटी को अनुकंपा नियुक्ति के लिए नामित किया था। वकील ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता शादी के बावजूद अपने पिता पर निर्भर थी, क्योंकि उसके पति की आमदनी बहुत मामूली है और वह अपनी मां की जिम्मेदारी उठाने के लिए पूरी तरह तैयार है।
बेटों की उपेक्षा और पति की मामूली आय
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि मृत कर्मचारी के दोनों बेटों ने अपनी बुजुर्ग मां की जिम्मेदारी लेने से साफ इनकार कर दिया था। वे अपनी मां से अलग रह रहे थे और परिवार की कोई सहायता नहीं कर रहे थे। स्थिति यह थी कि मां और बेटी केवल खदान से मिलने वाली नाममात्र की पेंशन राशि के सहारे अपना गुजारा कर रही थीं। कोर्ट ने इस पर टिप्पणी की कि किसी के पति की मामूली आय का अर्थ यह कतई नहीं है कि बेटी अपने पिता पर आश्रित नहीं थी।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
जस्टिस दीपक रोशन ने 12 अगस्त को अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता (बेटी) अपने पिता के स्थान पर अनुकंपा नियुक्ति की पूरी तरह हकदार है। वह अपने पिता की मृत्यु के समय उन पर पूरी तरह आश्रित थी और उसके पास अपना व अपनी बूढ़ी मां का भरण-पोषण करने के लिए आय का कोई अन्य स्वतंत्र जरिया मौजूद नहीं है।
अदालत ने आगे कहा कि प्रतिवादियों यानी कंपनी ने तथ्यों की गलत व्याख्या की है। महज शादीशुदा होने या पति की कम आय होने के आधार पर किसी को निर्भरता के दावे से बाहर करना अनुचित है। हाईकोर्ट ने कोयला खान भविष्य निधि संगठन को निर्देश दिया है कि वे नियमों का पालन करते हुए निर्धारित समय सीमा के भीतर महिला को नियुक्ति पत्र सौंपें।
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