सिरोही नस्ल की बकरियों से बदल रही है पशुपालकों की आर्थिक स्थिति
पशुपालन के क्षेत्र में अपना भविष्य तलाश रहे लोगों के लिए एक बेहतरीन खबर सामने आई है। राजस्थान के जनजाति क्षेत्रों में पशुपालकों की आय बढ़ाने और उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए केंद्र और राज्य सरकार मिलकर काम कर रही हैं। वर्तमान में धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष योजना के माध्यम से पशुपालकों को सिरोही नस्ल की बकरियों की यूनिट स्थापित करने के लिए विशेष सहायता प्रदान की जा रही है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य स्थानीय स्तर पर रोजगार के साधन उपलब्ध कराना और पशुपालन को एक लाभदायक व्यवसाय के रूप में स्थापित करना है।
सिरोही नस्ल की बकरियों की खासियत
सिरोही जिले से ही अपना नाम पाने वाली सिरोही नस्ल की बकरियां देश भर में अपनी पहचान रखती हैं। इन बकरियों की शारीरिक बनावट अत्यंत मजबूत होती है और ये देश की लगभग हर प्रकार की जलवायु में खुद को ढालने में सक्षम हैं। यही कारण है कि देश भर के बाजारों में सिरोही नस्ल की बकरियों की भारी मांग बनी रहती है। जिले के वरिष्ठ पशु चिकित्सक डॉक्टर जगदेव चौधरी के अनुसार इन बकरियों में रोगों से लड़ने की क्षमता अन्य नस्लों की तुलना में काफी बेहतर होती है। इसके अलावा, बकरी पालन केवल दूध या मांस के विक्रय तक सीमित नहीं है, बल्कि इनसे प्राप्त होने वाली मेंगनी उच्च गुणवत्ता वाली खाद का काम करती है, जो मिट्टी की उर्वरकता बढ़ाने में बहुत कारगर है।
योजना के तहत मिलने वाली वित्तीय सहायता
इस योजना का लाभ उठाने के लिए पशुपालकों को विशेष प्रावधानों के तहत आर्थिक अनुदान दिया जाता है। इस योजना की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं:
- पात्र लाभार्थियों को बकरी पालन की इकाई स्थापित करने के लिए 50,000 रुपये से लेकर 1,00,000 रुपये तक की सब्सिडी दी जाती है।
- जनजाति वर्ग के पशुपालकों को एक बकरा और एक बकरी पूरी तरह निशुल्क उपलब्ध कराए जाते हैं।
- योजना का लाभ लेने के लिए पशुपालक का टीएसपी क्षेत्र का निवासी होना और उनके पास वनाधिकार पट्टा या निवास का प्रमाण पत्र होना अनिवार्य है।
- पशुपालक संबंधित पशुपालन विभाग के कार्यालय में जाकर इसके लिए अपना आवेदन जमा कर सकते हैं।
आवेदन के लिए आवश्यक दस्तावेज
इस सरकारी योजना का लाभ उठाने के लिए पशुपालकों को कुछ जरूरी कागजात अपने पास रखने होंगे। इनमें मुख्य रूप से जन आधार कार्ड, अनुसूचित जनजाति का जाति प्रमाण पत्र, बैंक खाते का विवरण और निवास या पट्टा प्रमाण पत्र शामिल हैं। इन दस्तावेजों के आधार पर ही लाभार्थियों का चयन किया जाता है। एक बार यूनिट शुरू हो जाने के बाद, सिरोही नस्ल की बकरियों की उच्च मांग के चलते पशुपालकों को बाजार में अच्छे दाम मिल जाते हैं। एक स्वस्थ बकरी सामान्यतः दो से तीन बच्चों को जन्म देती है और इनका दुग्ध उत्पादन भी अन्य साधारण नस्लों की तुलना में बेहतर होता है। कम रखरखाव खर्च और बेहतर रिटर्न के कारण यह व्यवसाय बहुत कम समय में लोकप्रिय हो रहा है।
पशु बीमा का सुरक्षा कवच
सरकार ने इस योजना के साथ पशुपालकों के जोखिम को कम करने के लिए मुख्यमंत्री मंगला पशु बीमा योजना को भी जोड़ा है। इस सुरक्षा कवच के तहत एक जन आधार कार्ड पर पशुपालक अपनी 10 बकरियों का बीमा करवा सकता है। यदि किसी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति में बकरी की मृत्यु हो जाती है, तो बीमा कंपनी की ओर से पशुपालक को निर्धारित मुआवजा दिया जाता है, जिससे उसे बड़ा वित्तीय नुकसान नहीं झेलना पड़ता। कुल मिलाकर, सिरोही नस्ल की बकरी पालन की यह यूनिट पशुपालकों के लिए लंबे समय तक आय का एक निरंतर जरिया बन सकती है।
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