दृष्टिहीन होकर भी सुरों के जादूगर हैं छतरपुर के सुरेश, लखनऊ से दिल्ली तक गूंज रही है उनकी आवाज

मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के रहने वाले सुरेश खरे जन्म से देख नहीं सकते, लेकिन अपनी जादुई आवाज और गायकी से वे पूरे देश में अपनी पहचान बना चुके हैं। संगीत ही उनके जीवन का आधार है और इसी के जरिए वे अपनी आजीविका भी चला रहे हैं।

सपनों में रंग भरता संगीत

मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के रहने वाले सुरेश खरे एक ऐसी मिसाल हैं, जो यह साबित करते हैं कि अगर हौसले बुलंद हों, तो शारीरिक कमियां कभी भी आगे बढ़ने में बाधा नहीं बनतीं। सुरेश जन्म से ही दृष्टिहीन हैं, लेकिन उनकी सुरीली आवाज ने उन्हें एक अलग पहचान दी है। आज उनकी शायरी और गजलों की चर्चा केवल मध्य प्रदेश तक ही सीमित नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश से लेकर दिल्ली तक फैली हुई है। उनके संगीत का जादू ऐसा है कि सुनने वाले मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।

संगीत का माहौल और शुरुआती सफर

सुरेश बताते हैं कि उन्होंने कभी भी संगीत की कोई औपचारिक शिक्षा या प्रशिक्षण नहीं लिया है। उन्हें यह कला विरासत में मिली है। उनके घर में पिता, चाचा और भाई अक्सर हारमोनियम और ढोलक बजाते थे, जिन्हें सुनकर सुरेश के मन में भी संगीत के प्रति लगाव पैदा हुआ। 8 साल की छोटी सी उम्र में उन्होंने पहली बार हारमोनियम को हाथ लगाया और उसे बजाना सीख लिया। धीरे-धीरे उन्होंने संगीत के विभिन्न वाद्ययंत्रों में महारत हासिल कर ली और अपने हुनर को निखारना शुरू कर दिया।

देश के बड़े शहरों में बिखेरे सुर

सुरेश की गायकी की ख्याति धीरे-धीरे उनके गृह जिले छतरपुर से बाहर निकलने लगी। वे कीर्तन और भजन संध्याओं में अपनी प्रस्तुति देने लगे। आज स्थिति यह है कि वे लखनऊ, रायबरेली, बरेली, दिल्ली और यहां तक कि नेपाल तक जाकर अपनी गायकी का प्रदर्शन कर चुके हैं। उनकी शायरी, गजल और भजन लोगों के दिलों को छू लेते हैं। सुरेश का कहना है कि उनकी आवाज को मिलने वाला प्यार ही उनके जीवन की सबसे बड़ी कमाई है।

जीवन का आधार बना संगीत

सुरेश का जन्म छतरपुर जिले के लवकुश नगर के पास एक छोटे से गांव सिजई में हुआ था। दृष्टिहीनता और संसाधनों की कमी के कारण उन्हें कभी औपचारिक शिक्षा नहीं मिल सकी, जिसका उन्हें मलाल भी है। उन्होंने विवाह नहीं किया और अपना पूरा जीवन संगीत के प्रति समर्पित कर दिया। आज संगीत न केवल उनकी आत्मा की शांति का माध्यम है, बल्कि उनकी कमाई का मुख्य जरिया भी है। वे कहते हैं कि संगीत से ही उन्हें जीने की शक्ति मिलती है और यह उनके लिए किसी ईश्वरीय आशीर्वाद से कम नहीं है।

नित्य रियाज और संगीत से जुड़ाव

सुरेश के लिए संगीत केवल एक शौक नहीं, बल्कि जीवन की एक अनिवार्य प्रक्रिया है। वे हर दिन ढोलक और हारमोनियम का रियाज करते हैं। उनका लगाव संगीत के वाद्ययंत्रों से इतना अधिक है कि अगर किसी काम से उन्हें बाहर जाना पड़ता है और वे वाद्ययंत्रों से दूर होते हैं, तो वे बेचैन हो जाते हैं। खुद के लिखे गीत और गजलों को अपनी आवाज देना उन्हें बेहद सुकून देता है। उनकी यह कहानी उन सभी के लिए प्रेरणा है जो विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपने सपनों को जीने का साहस रखते हैं।

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