MQ-9B रीपर ड्रोन और भारत का भविष्य
भारत सरकार ने अपनी तीनों सेनाओं के आधुनिकीकरण की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए अमेरिकी कंपनी से 31 MQ-9B रीपर ड्रोन्स खरीदने का समझौता किया है। इस सौदे की कुल लागत लगभग 25,000 करोड़ रुपये यानी करीब 3 बिलियन डॉलर बताई जा रही है। भारत इसे अपनी सुरक्षा रणनीति के लिए एक गेमचेंजर मान रहा है, लेकिन हाल ही में मध्य पूर्व में हुए संघर्ष ने इन ड्रोन्स की उपयोगिता पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। ईरान और उसके समर्थक गुटों के खिलाफ संघर्ष में अमेरिका के 45 से अधिक MQ-9 रीपर ड्रोन्स मार गिराए गए हैं, जो उनकी कुल तादाद का करीब एक तिहाई हिस्सा है।
युद्ध के मैदान में क्यों कमजोर साबित हुआ रीपर?
MQ-9 रीपर ड्रोन पिछले दो दशकों से अमेरिकी सेना की निगरानी और सटीक हमले करने की प्राथमिक पसंद रहा है। इसका उपयोग मुख्य रूप से अफगानिस्तान, इराक और सीरिया जैसे उन क्षेत्रों में किया गया था, जहां दुश्मनों के पास उन्नत एयर डिफेंस सिस्टम का अभाव था। हालांकि, ईरान के साथ हालिया तनाव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आधुनिक रडार और एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम के सामने यह ड्रोन असुरक्षित है।
- धीमी गति: MQ-9 रीपर की गति काफी धीमी है और इसका फ्लाइट पाथ अक्सर अनुमानित होता है।
- आसान निशाना: आधुनिक रडार के चलते ये ड्रोन दुश्मन के एयर डिफेंस के लिए आसान लक्ष्य बन जाते हैं।
- इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर: कई मामलों में सैटेलाइट कम्युनिकेशन लिंक जाम होने के कारण इन ड्रोन्स का कंट्रोल खो गया और वे क्रैश हो गए।
भारत के सामने रणनीतिक चुनौतियां
भारत की सीमाएं ऐसे देशों से घिरी हैं जिनके पास दुनिया के सबसे उन्नत एयर डिफेंस और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम मौजूद हैं। चीन और पाकिस्तान दोनों ही लगातार अपने रक्षा तंत्र को मजबूत कर रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, चीन का HQ-9 और पाकिस्तान का HQ-16FE एयर डिफेंस सिस्टम ऐसे धीमी गति वाले ड्रोन्स को बहुत आसानी से ट्रैक करके नष्ट करने में सक्षम हैं। यही कारण है कि रक्षा विशेषज्ञों के बीच यह बहस शुरू हो गई है कि क्या 25,000 करोड़ रुपये का यह निवेश हाई इंटेंसिटी वॉर यानी भीषण युद्ध की स्थिति में भारत को अपेक्षित परिणाम दे पाएगा।
फिर भी भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण हैं ये ड्रोन्स?
इसके बावजूद कि रीपर ड्रोन पूरी तरह अभेद्य नहीं हैं, इन्हें पूरी तरह से बेकार मान लेना भी उचित नहीं होगा। यह ड्रोन उन विशिष्ट कार्यों के लिए बेहद कारगर है जिनमें सीधे फ्रंटलाइन युद्ध शामिल नहीं है:
1. हिंद महासागर में निगरानी: यह ड्रोन 40 घंटे से अधिक समय तक लगातार हवा में रहने में सक्षम है। यह भारतीय नौसेना के लिए पूरे हिंद महासागर क्षेत्र में चीनी पनडुब्बियों और जहाजों की गतिविधियों पर नजर रखने का सबसे शक्तिशाली जरिया है।
2. LAC पर टोही मिशन: वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी (LAC) पर बिना किसी युद्ध के इंटेलिजेंस और टोही मिशन के लिए यह एक बेहतरीन प्लेटफार्म है, जो दुश्मन की हर हलचल पर नजर रख सकता है।
तकनीकी तुलना: MQ-9B बनाम अन्य ड्रोन्स
विभिन्न ड्रोन्स की क्षमताओं का विश्लेषण करने से यह स्पष्ट होता है कि प्रत्येक ड्रोन का उपयोग अलग-अलग उद्देश्यों के लिए होता है:
- MQ-9B रीपर (अमेरिका/भारत): इसकी रेंज लगभग 11,000 किमी है, एंड्योरेंस 35 से 40+ घंटे है और अधिकतम स्पीड 388 किमी/घंटा है। यह 50,000 फीट की ऊंचाई तक उड़ सकता है।
- CH-5 रेनबो (चीन): इसकी रेंज 10,000 किमी है, एंड्योरेंस 30 से 60 घंटे और स्पीड 400 किमी/घंटा है। यह 30,000 फीट तक की ऊंचाई के लिए बेहतर है।
- शाहद-136 (ईरान): यह एक आत्मघाती यानी कामिकेज ड्रोन है जिसकी रेंज 2,500 किमी है और इसकी अधिकतम स्पीड 185 किमी/घंटा है।
अंत में, यह कहा जा सकता है कि मध्य पूर्व के अनुभव ने साबित कर दिया है कि MQ-9B रीपर कोई अजेय हथियार नहीं है। यह चीन जैसे शक्तिशाली देश के खिलाफ अग्रिम हवाई युद्ध में कमजोर पड़ सकता है। भारत को इसका उपयोग बहुत ही सावधानी से और एक स्पष्ट रणनीतिक ढांचे के तहत करना होगा ताकि इसका अधिकतम लाभ उठाया जा सके।
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