छपरा की मिठास ने जीती लोगों की पसंद
मिठाइयों की दुनिया में वैसे तो कोलकाता का नाम सबसे ऊपर आता है, लेकिन बिहार के छपरा जिले के एक छोटे से ग्रामीण बाजार में बनने वाला पेड़ा स्वाद और शुद्धता के मामले में बड़ी-बड़ी मशहूर दुकानों को कड़ी टक्कर दे रहा है। छपरा के मशरख प्रखंड के अंतर्गत आने वाले देवरिया बाजार की एक छोटी सी दुकान का यह पेड़ा न केवल स्थानीय निवासियों के बीच प्रसिद्ध है, बल्कि इसका स्वाद अब देश की सीमाओं को पार कर सऊदी अरब तक अपनी पहचान बना चुका है। कोलकाता में बसे प्रवासियों की भी यह पहली पसंद है।
कोयले की आंच पर तैयार होता है शुद्ध मावा
इस अनूठी मिठाई को बनाने वाले दुकानदार राजकुमार सिंह बताते हैं कि इस पेड़े की सबसे बड़ी खासियत इसकी शुद्धता है। वे ग्रामीण इलाकों से सीधे शुद्ध दूध मंगवाते हैं, जिसमें किसी भी प्रकार की मिलावट या केमिकल का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। पेड़ा तैयार करने की प्रक्रिया काफी पारंपरिक है। दूध को कोयले की भट्ठी पर रखा जाता है और घंटों तक धीमी आंच पर लगातार चलाया जाता है, जिससे शुद्ध मावा या खोआ तैयार होता है। स्वाद और खुशबू को और अधिक बढ़ाने के लिए इसमें सीमित मात्रा में चीनी, इलायची, काजू और पिस्ता का मिश्रण किया जाता है। यही पारंपरिक तकनीक इसे बाजार में मिलने वाली अन्य मिठाइयों से अलग और खास बनाती है।
किफायती दाम और परदेस में बढ़ती लोकप्रियता
राजकुमार सिंह का कहना है कि उनकी दुकान पर पेड़ा और चाय मुख्य रूप से उपलब्ध रहती है। जो भी व्यक्ति एक बार इस स्वाद को चख लेता है, वह इसका मुरीद हो जाता है। वर्तमान में इस पेड़े की कीमत 350 रुपये प्रति किलो है और इसे 10 रुपये प्रति पीस के हिसाब से भी बेचा जाता है। इसकी गुणवत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सऊदी अरब में काम करने वाले स्थानीय लोग और कोलकाता में रहने वाले प्रवासी जब भी अपने गांव लौटते हैं, तो वे इसे बड़ी मात्रा में अपने साथ ले जाना कभी नहीं भूलते।
कोलकाता की मिठाइयों पर भारी पड़ता है यह स्वाद
दुकान पर मौजूद एक ग्राहक लीलावती देवी ने बताया कि उनका पूरा परिवार लंबे समय से कोलकाता में रहता है। कोलकाता अपनी बेहतरीन मिठाइयों के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है, जहाँ हर कोने पर एक से बढ़कर एक मिठाई की दुकानें हैं। इसके बावजूद, उनके बेटी, दामाद और अन्य रिश्तेदार जब भी छपरा आते हैं, तो वे यहां से ढेर सारा पेड़ा खरीदकर कोलकाता ले जाते हैं। उनका कहना है कि इस पेड़े में जो देसी स्वाद और शुद्धता मिलती है, वह बड़े शहरों में मिलना मुश्किल है। इसी वजह से आज इस मिठाई की साख छपरा से निकलकर दूर-दराज के इलाकों में भी फैल गई है।
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