PoK का उभरता जन-आक्रोश और भारत की ओर बढ़ती उम्मीदें
पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर यानी PoK में इन दिनों हालात बेहद तनावपूर्ण बने हुए हैं। वहां की जनता ने पाकिस्तान के शासन और वहां की सेना के अत्याचारों के खिलाफ सड़कों पर मोर्चा खोल दिया है। स्थानीय नागरिक अब खुलकर यह कहने लगे हैं कि उन्हें पाकिस्तान का हिस्सा बने रहने में कोई रुचि नहीं है और वे भारत में विलय की गुहार लगा रहे हैं। पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसिम मुनीर और वहां के हुक्मरानों की दमनकारी नीतियों से तंग आकर आम जनता का गुस्सा सातवें आसमान पर है। इस बीच, राजनीतिक गलियारों और आम चर्चाओं में यह सवाल सबसे प्रमुख है कि क्या वाकई PoK की भारत में वापसी संभव है? वास्तविकता यह है कि PoK नाम का कोई भौगोलिक अस्तित्व 1947 से पहले था ही नहीं। यह पूरा क्षेत्र अखंड भारत के जम्मू-कश्मीर रियासत का एक समृद्ध और अभिन्न हिस्सा था, जिसे अपनी पुरानी पहचान और गौरव को पुनः पाने के लिए आज एक लंबे संघर्ष से गुजरना पड़ रहा है।
1947 से पहले की प्रशासनिक और भौगोलिक स्थिति
जब 26 अक्टूबर 1947 को जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने भारत के साथ ऐतिहासिक विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए थे, तब आज जिसे हम PoK कहते हैं, वह पूरा इलाका अविभाजित जम्मू-कश्मीर का खुशहाल हिस्सा था। डोगरा शासनकाल के दौरान इस पूरी रियासत को प्रशासनिक सुविधा के लिए विभिन्न जिलों और सीमांत क्षेत्रों में विभाजित किया गया था। आजादी से ठीक पहले, इस पूरे क्षेत्र को मुख्य रूप से दो बड़े भौगोलिक और प्रशासनिक खंडों में बांटा गया था:
- पश्चिमी जिले: इसमें मीरपुर, मुजफ्फराबाद और पुंछ शामिल थे, जो सीधे तौर पर जम्मू और कश्मीर घाटी के प्रशासनिक नियंत्रण में थे। मीरपुर उस समय जम्मू प्रांत का व्यापारिक दृष्टिकोण से एक अत्यंत समृद्ध जिला माना जाता था। मुजफ्फराबाद, जो झेलम और नीलम नदियों के मिलन बिंदु पर स्थित है, कश्मीर घाटी का एक प्रमुख प्रशासनिक केंद्र हुआ करता था। पुंछ की स्थिति विशेष थी क्योंकि इसे एक स्वतंत्र जागीर का दर्जा प्राप्त था, जिसका संचालन महाराजा के प्रशासन के प्रत्यक्ष अधीन होता था।
- उत्तरी क्षेत्र: इसमें गिलगित एजेंसी और बाल्टिस्तान का विस्तृत भू-भाग सम्मिलित था। ये क्षेत्र सैन्य और रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण थे। गिलगित एजेंसी को अंग्रेजों ने रणनीतिक महत्व के कारण 1935 में महाराजा से पट्टे पर लिया था, लेकिन आजादी से पहले ही इसे पुनः महाराजा हरि सिंह को लौटा दिया गया था। वहीं, बाल्टिस्तान सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रूप से लद्दाख वजीरात का अभिन्न अंग था और लद्दाख के साथ इसका गहरा जुड़ाव था।
पाकिस्तानी कब्जे का काला इतिहास
पाकिस्तान द्वारा इस क्षेत्र पर अवैध कब्जे की पटकथा 15 अगस्त 1947 के बाद लिखी गई थी। जब महाराजा हरि सिंह ने भारत या पाकिस्तान किसी भी देश में शामिल न होने के लिए एक स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट का प्रस्ताव रखा था, तब पाकिस्तान ने धोखे की चाल चली। 22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान ने ऑपरेशन गुलमर्ग के नाम से कबाइलियों के भेष में अपनी नियमित सेना और लड़ाकों को जम्मू-कश्मीर में प्रवेश कराया। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए जब महाराजा ने 26 अक्टूबर 1947 को भारत के साथ विलय पत्र पर दस्तखत किए, तो 27 अक्टूबर 1947 को भारतीय सेना ने श्रीनगर में उतरकर दुश्मनों को खदेड़ना शुरू किया। दुर्भाग्यवश, 1 जनवरी 1949 को संयुक्त राष्ट्र के हस्तक्षेप और युद्धविराम लागू होने के कारण भारतीय सेना को उस सीमा पर रुकना पड़ा, जिससे जम्मू-कश्मीर का लगभग एक-तिहाई हिस्सा पाकिस्तान के अवैध कब्जे में रह गया। कब्जा करने के बाद पाकिस्तान ने सुनियोजित तरीके से इस क्षेत्र की पहचान मिटानी शुरू कर दी। उन्होंने इसे दो भागों में बांट दिया, जिसमें एक हिस्से को 'आजाद जम्मू और कश्मीर' का नाम दिया गया, जबकि उत्तरी भाग का नाम बदलकर 'नॉर्दर्न एरियाज' कर दिया गया, जिसे बाद में 2009 में गिलगित-बाल्टिस्तान कहा जाने लगा।
भारत का रुख और वर्तमान परिस्थितियां
वर्तमान में PoK के लोग पाकिस्तान के सौतेले व्यवहार और वहां के संसाधनों के दोहन से त्रस्त हो चुके हैं। उनका स्पष्ट आरोप है कि पाकिस्तान उनकी जमीन का उपयोग तो कर रहा है, लेकिन बुनियादी सुविधाओं जैसे कि बिजली, पानी और राशन तक से उन्हें वंचित रखा जा रहा है। इसी हताशा और गुस्से ने लोगों को भारत के साथ जुड़ने के लिए प्रेरित किया है। भारत का दृष्टिकोण इस विषय पर दशकों से अटल रहा है। 22 फरवरी 1994 को भारतीय संसद ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया था कि PoK और गिलगित-बाल्टिस्तान समेत समूचा जम्मू-कश्मीर भारत का अटूट हिस्सा है। 5 अगस्त 2019 को धारा 370 के निरस्त होने के बाद जब भारत ने अपना नया मानचित्र जारी किया, तो उसमें मुजफ्फराबाद और मीरपुर को जम्मू-कश्मीर और गिलगित-बाल्टिस्तान को लद्दाख का हिस्सा स्पष्ट रूप से दर्शाया गया है। यह स्पष्ट है कि मीरपुर, मुजफ्फराबाद, पुंछ, गिलगित और बाल्टिस्तान जैसे नाम केवल नक्शों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये भारत की उस सांस्कृतिक और भौगोलिक धरोहर का हिस्सा हैं, जो आज भी भारत के संविधान और गौरव में संरक्षित हैं।
https://hindi.news18.com/world/pakistan-pok-wants-to-rejoin-india-real-history-of-muzaffarabad-mirpur-and-gilgit-before-1947-explained-10764319.html