सरगुजा: मेझरी की पारंपरिक खेती का जलवा बरकरार, कम खर्च में मिलता है बंपर मुनाफा

छत्तीसगढ़ के सरगुजा अंचल में किसान आज भी अपनी पुरानी विरासत मेझरी की खेती को संजोए हुए हैं, जो कम मेहनत और न्यूनतम लागत में अच्छी पैदावार देती है।

खेती की पुरानी तकनीक आज भी प्रासंगिक

छत्तीसगढ़ के सरगुजा इलाके में कृषि की एक ऐसी प्राचीन पद्धति आज भी जीवित है, जिसे स्थानीय भाषा में मेझरी के नाम से जाना जाता है। बदलते दौर और आधुनिक खेती के बीच भी यहां के किसान इस पारंपरिक फसल को पूरी शिद्दत के साथ उगा रहे हैं। मेझरी न केवल इलाके की पहचान है, बल्कि यह छोटे और सीमांत किसानों के लिए आय का एक सशक्त जरिया भी बनी हुई है।

जुलाई में होती है बुवाई की शुरुआत

क्षेत्र के किसान गणेश कुमार यादव ने इस फसल की बारीकियों के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि मेझरी की खेती की प्रक्रिया मुख्य रूप से जुलाई महीने के दौरान शुरू की जाती है। इस फसल की सबसे बड़ी खासियत इसकी सरलता है। किसानों को धान की तरह इसके पौधों की अलग से रोपाई करने की कोई जरूरत नहीं पड़ती है।

कम मेहनत में अधिक उत्पादन

पारंपरिक खेती होने के कारण मेझरी की खेती में लागत बहुत कम आती है। बुवाई की प्रक्रिया भी बेहद सहज है। एक बार जब खेत की अच्छी तरह जुताई कर ली जाती है, तो उसके बाद सीधे बीजों को मिट्टी में बो दिया जाता है। इस विधि से खेती करने पर किसानों को न केवल शारीरिक श्रम कम करना पड़ता है, बल्कि आर्थिक रूप से भी उन्हें काफी राहत मिलती है। यही कारण है कि सरगुजा के कई किसान आधुनिक फसलों के बजाय इस पारंपरिक विकल्प को आज भी अपनाना पसंद करते हैं।

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