अयोध्या राम मंदिर दान चोरी: विवाद और सच्चाई
अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा अर्पित किए गए चढ़ावे की गिनती के दौरान हुई कथित चोरी के मामले ने सुरक्षा व्यवस्था पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस घटना के सामने आने के बाद से ही मंदिर प्रबंधन और सुरक्षा तंत्र सवालों के घेरे में है। हालांकि, इस पूरे विवाद को मंदिर निर्माण के लिए देश-विदेश से जुटाई गई बड़ी धनराशि के साथ जोड़कर देखना पूरी तरह से गलत और भ्रामक है। यह मामला सीधे तौर पर मंदिर में चढ़ावे के रूप में प्राप्त हुई नकदी को एकत्रित करने, उसे गिनने और अंत में सुरक्षित तरीके से बैंक तक पहुंचाने की प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है।
पुलिस की कार्रवाई और गिरफ्तारियां
इस पूरे घटनाक्रम पर पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए जांच शुरू की थी। ताजा अपडेट के अनुसार, पुलिस ने अब तक कुल 6 ऐसे कर्मचारियों को गिरफ्तार किया है, जो दान की गिनती के काम में तैनात थे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गिरफ्तार किए गए इन लोगों में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का कोई भी पदाधिकारी या सदस्य शामिल नहीं है। मंदिर प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि दान की गणना का सारा जिम्मा बैंक द्वारा नियुक्त किए गए आउटसोर्स कर्मचारियों के कंधों पर था, इसलिए ट्रस्ट की सीधी भूमिका इसमें नहीं है।
किसकी जवाबदेही और कैसा था समझौता
श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट और SBI के बीच दान की राशि की गणना को लेकर एक औपचारिक समझौता हुआ था। समझौते की शर्तों के अनुसार, ट्रस्ट की जिम्मेदारी दानपात्रों यानी हुंडियों को सुरक्षित रूप से बैंक अधिकारियों तक पहुंचाना और गिनती के लिए एक सुरक्षित स्थान उपलब्ध कराने तक सीमित थी। इसके अलावा नोटों की गिनती करना, कर्मचारियों का चयन और उनकी नियुक्ति करना, उन्हें पारिश्रमिक देना, काम की कार्यप्रणाली तैयार करना और नोट गिनने वाली मशीनों की व्यवस्था करना पूरी तरह से बैंक की जिम्मेदारी थी। बैंक ने इस काम के लिए SSS यानी सैनिक सुरक्षा समिति नाम की एक निजी एजेंसी को काम पर रखा था। मंदिर प्रबंधन के मुताबिक, बैंक और उक्त एजेंसी के बीच हुए समझौते में ट्रस्ट पक्षकार नहीं था।
नकदी के परिवहन की सुरक्षा परतें
मंदिर के भीतर से लेकर गिनती केंद्र तक नकदी को पहुंचाने के लिए एक व्यवस्थित सुरक्षा चक्र बनाया गया था। मंदिर की दानपेटियों से नकदी निकालने के बाद उसे सीधे कहीं ले जाने के बजाय एक कड़े प्रोटोकॉल का पालन किया जाता था। प्रत्येक हुंडी पर दो ताले लगाए गए थे, जिनमें से एक चाबी बैंक के पास और दूसरी चाबी मंदिर प्रबंधन के पास सुरक्षित रहती थी। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि कोई भी अकेला व्यक्ति रास्ते में दानपात्र को न खोल सके। बैंक अधिकारियों की मौजूदगी में ही इन हुंडियों को तय स्थान तक ले जाया जाता था, जिससे सुरक्षा की कई परतें बनी रहती थीं।
पब्लिक फैसिलिटी सेंटर में गिनती का काम
मंदिर के गर्भगृह या मुख्य परिसर में नकदी की गिनती नहीं की जाती थी। इसके लिए मंदिर परिसर के बाहर PFC यानी पब्लिक फैसिलिटी सेंटर का उपयोग किया जाता था। इस स्थान का चयन बैंक अधिकारियों के साथ विस्तृत चर्चा के बाद किया गया था। सैद्धांतिक रूप से, इस प्रक्रिया में सुरक्षा के कड़े इंतजाम थे, जैसे डबल लॉक वाली हुंडियां, पूर्व-निर्धारित सुरक्षित मार्ग और नोट गिनने वाली मशीनें। विडंबना यह है कि कथित चोरी इसी प्रक्रिया के उस चरण में हुई, जहां नोटों को मशीन में डालने से पहले हाथों से छांटा और व्यवस्थित किया जा रहा था।
निगरानी और व्यवस्था में बदलाव
इस घटना के बाद अब सुरक्षा की जवाबदेही पर सवाल उठ रहे हैं। गिनती केंद्र की निगरानी में मंदिर प्रशासन, बैंक और पुलिस तीनों की भूमिका थी, लेकिन नकदी के प्रबंधन की मुख्य जिम्मेदारी बैंक की ही थी। इस घटना के उपरांत मंदिर ट्रस्ट ने सुरक्षा व्यवस्था को और अधिक पुख्ता करने के लिए कई अहम कदम उठाए हैं। अब गिनती केंद्र में तैनात कर्मचारियों के लिए ऐसी विशेष ड्रेस निर्धारित की गई है जिसमें जेब नहीं होगी। इसके अलावा, CCTV कैमरों की निगरानी व्यवस्था को अपग्रेड किया गया है और रिकॉर्डिंग को लंबी अवधि तक संरक्षित रखने के नियम बनाए गए हैं। साथ ही, बार-बार बदलने वाले ठेका कर्मियों के स्थान पर अधिक भरोसेमंद और नियमित कर्मचारियों को प्राथमिकता दी जा रही है।
दान का गणित और निर्माण निधि की स्थिति
श्रीराम जन्मभूमि मंदिर को मिलने वाले दान का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा नकद रूप में हुंडियों के माध्यम से आता है, जबकि शेष राशि UPI और बैंक ट्रांसफर के जरिए प्राप्त होती है। इस कारण बड़ी मात्रा में नकदी को बैंक तक सुरक्षित पहुंचाना एक बड़ी चुनौती रहती है। वहीं, एक बड़ा सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या मंदिर निर्माण के लिए एकत्रित 3300 करोड़ रुपये की निधि में कोई सेंध लगी है। ट्रस्ट का कहना है कि वर्तमान चोरी का उस निर्माण निधि से कोई लेना-देना नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद देश भर के श्रद्धालुओं ने 3300 करोड़ रुपये दान दिए थे, जिसका ऑडिट हो चुका है। ट्रस्ट के अनुसार, लगभग 400 करोड़ रुपये भूमि अधिग्रहण और करीब 1800 करोड़ रुपये मंदिर के निर्माण कार्य में खर्च किए जा चुके हैं और पूरे फंड का हिसाब पारदर्शी है।
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