ईरान के साथ जारी तनाव का असर, प्रशांत क्षेत्र से अमेरिका ने हटाया अपना सबसे ताकतवर एयरक्राफ्ट कैरियर

अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य संघर्ष के कारण अमेरिकी नौसेना पर भारी दबाव है, जिसके चलते प्रशांत महासागर में तैनात यूएसएस जॉर्ज वॉशिंगटन को मिडिल ईस्ट भेजने का बड़ा फैसला लिया गया है। इस कदम से चीन को क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने का मौका मिल सकता है।

मिडिल ईस्ट के संकट का प्रशांत पर असर

अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा लंबा सैन्य टकराव अब केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहा है। इस संघर्ष ने अमेरिकी नौसेना की प्राथमिकताओं और संसाधनों को पूरी तरह से बदल दिया है। वर्तमान में अमेरिकी नौसेना पर इतना अधिक दबाव है कि उन्हें रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण निर्णय लेने पड़ रहे हैं। इसी कड़ी में अमेरिका के प्रमुख एयरक्राफ्ट कैरियर यूएसएस जॉर्ज वॉशिंगटन को प्रशांत क्षेत्र से हटाकर मिडिल ईस्ट की ओर रवाना किया जा रहा है। इस बदलाव से प्रशांत महासागर में अमेरिका की उपस्थिति के कम होने की आशंका जताई जा रही है, जो कि चीन के लिए एक बड़ा अवसर साबित हो सकता है।

युद्धपोत बदलने के पीछे की मजबूरी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के खिलाफ छेड़े गए सैन्य अभियानों के कारण नौसेना के सबसे बड़े हथियारों पर अत्यधिक दबाव आ गया है। स्थिति यह हो गई है कि मिडिल ईस्ट में ईरान के संकट को संभालने के लिए अमेरिका को अपने पश्चिमी प्रशांत महासागर स्थित नौसैनिक बेड़े को खाली करना पड़ा है। यूएसएस जॉर्ज वॉशिंगटन वहां पहुंचकर लंबे समय से तैनात यूएसएस अब्राहम लिंकन की जगह लेगा। लिंकन की स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह लगातार 240 दिनों से अधिक समय से समुद्र में तैनात है।

लगातार इतने लंबे समय तक खुले समुद्र में रहने के कारण न केवल जहाज की तकनीकी स्थिति पर असर पड़ता है, बल्कि उस पर तैनात सैनिकों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव पड़ रहा है। अमेरिकी सांसद लगातार इस बात पर चिंता जता रहे हैं कि सैनिकों को पर्याप्त आराम न मिलने से उनकी कार्यक्षमता कम हो रही है।

चीन के लिए बढ़ते अवसर

रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका की इस कमजोरी का लाभ उठाने की कोशिश चीन कर सकता है। हडसन इंस्टीट्यूट के रक्षा विशेषज्ञ ब्रायन क्लार्क ने एक रिपोर्ट में संकेत दिया है कि चीन भले ही तुरंत ताइवान पर हमला न करे, लेकिन वह जापान, फिलीपींस और इंडोनेशिया जैसे देशों को यह कड़ा संदेश जरूर दे सकता है कि प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका अब पहले जैसा मजबूत नहीं रहा। चीन का प्रयास इन देशों को यह विश्वास दिलाने का होगा कि अमेरिका अब उनकी सुरक्षा की गारंटी देने में सक्षम नहीं है, जबकि चीन खुद को इस क्षेत्र की सबसे बड़ी शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहता है।

चीन की बढ़ती सैन्य सक्रियता

प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका के कैरियर की अनुपस्थिति ऐसे समय में हो रही है जब चीन वहां अपनी सैन्य गतिविधियों में तेजी ला रहा है। हाल ही में चीन ने इंडोनेशिया के साथ संयुक्त नौसैनिक अभ्यास किया है। इसके अलावा, फिलीपींस के साथ विवादित स्कारबोरो शोआल इलाके के पास भी चीन ने सैन्य अभ्यास कर अपनी ताकत दिखाई है। चीन और जापान के बीच भी तनाव चरम पर है। पिछले महीने चीन के एक गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर ने जापान के ओकिनोटोरी द्वीप के पास लाइव फायर अभ्यास को अंजाम दिया था। ये तमाम घटनाक्रम उन अमेरिकी सहयोगी देशों के लिए चिंता का विषय हैं जो सीधे तौर पर अमेरिकी सुरक्षा कवच पर निर्भर हैं।

अमेरिकी प्रशासन का आश्वासन

इन आशंकाओं के बीच अमेरिकी सेना अपने सहयोगी देशों को भरोसा दिलाने की कोशिश में जुटी है कि प्रशांत क्षेत्र में उसकी पकड़ कमजोर नहीं हुई है। अमेरिकी स्पेशल ऑपरेशंस कमांड के प्रमुख एडमिरल फ्रैंक ब्रैडली ने फिलीपींस का दौरा कर वहां के वरिष्ठ अधिकारियों से चर्चा की। उन्होंने स्पष्ट किया कि अमेरिकी सेना दुनिया के किसी भी कोने में अपनी ताकत पहुंचाने में पूरी तरह सक्षम है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि यूएसएस जॉर्ज वॉशिंगटन के मिडिल ईस्ट जाने के बाद कुछ समय के लिए प्रशांत महासागर में कोई बड़ा अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर नहीं होगा। ब्रायन क्लार्क के अनुसार, मिडिल ईस्ट में स्थिति संभलते ही अमेरिका जरूरत के अनुसार अपने संसाधनों को वापस प्रशांत क्षेत्र में तैनात कर सकता है, लेकिन फिलहाल यह घटनाक्रम रणनीतिक रूप से काफी गंभीर है।

नौसेना पर बढ़ता रखरखाव का दबाव

अमेरिकी नौसेना के बेड़े में कुल 11 एयरक्राफ्ट कैरियर मौजूद हैं। सामान्य परिस्थितियों में इनमें से 2 या 3 कैरियर ही एक साथ तैनात रहते हैं। ईरान के साथ लंबा खिंचता युद्ध नौसेना के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर रहा है। यदि भविष्य में यूएसएस थियोडोर रूजवेल्ट को भी मध्य पूर्व भेजा जाता है, तो अमेरिका को एक साथ 4 कैरियर तैनात करने पड़ेंगे। इस स्थिति में जहाजों के रखरखाव और मरम्मत का मुद्दा सबसे बड़ी बाधा बनकर उभरेगा। अमेरिका में केवल 2 ऐसे शिपयार्ड हैं जहां इन एयरक्राफ्ट कैरियर की बड़ी मरम्मत संभव है। मरम्मत का बढ़ता दबाव भविष्य में नौसेना की तैनाती क्षमता को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है।

आधुनिक युद्ध में कैरियर की प्रासंगिकता पर सवाल

मौजूदा घटनाक्रम ने विशेषज्ञों के बीच एक नई बहस को जन्म दिया है कि क्या ड्रोन और लंबी दूरी की मिसाइलों के युग में इतने विशाल एयरक्राफ्ट कैरियर आधुनिक युद्ध में कितने कारगर हैं। कुछ जानकारों का मानना है कि चीन जैसे उन्नत देशों के खिलाफ ये बड़े युद्धपोत आसान निशाना बन सकते हैं। भविष्य में छोटे युद्धपोत, पनडुब्बियां और आधुनिक तकनीक से लैस हथियार कहीं अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं, जिससे एयरक्राफ्ट कैरियर की उपयोगिता पर भविष्य में पुनर्विचार की आवश्यकता हो सकती है।

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