धान के पौधों की सेहत पर रखें पैनी नजर
इस समय धान की रोपाई का काम पूरे जोर-शोर से चल रहा है। खेतों में नए पौधे लगने के साथ ही किसानों के सामने एक बड़ी चुनौती पौधों के सूखने और गलने की आ रही है। बहुत से किसान इस समस्या को केवल सामान्य सड़न समझकर अनदेखा कर देते हैं, लेकिन कृषि विज्ञान के जानकारों का मानना है कि यह बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट यानी जीवाणु झुलसा रोग की दस्तक हो सकती है। अगर धान की रोपाई के एक सप्ताह के भीतर ही पौधों की ऊपरी पत्तियों के सिरों पर सफेदी नजर आने लगे, तो यह इस घातक बीमारी का स्पष्ट संकेत हो सकता है।
बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट को कैसे पहचानें
बिलासपुर स्थित बैरिस्टर ठाकुर छेदीलाल कृषि महाविद्यालय के कृषि रोग विशेषज्ञ डॉ विनोद निर्मलकर के अनुसार, इस रोग की शुरुआत नर्सरी से ही हो सकती है। जब किसान पौधों को उखाड़कर मुख्य खेत में रोपाई करते हैं, तो शुरुआती दिनों में ही इसके लक्षण दिखने लगते हैं। इसके मुख्य पहचान बिंदु इस प्रकार हैं:
- पौधों की ऊपरी पत्तियों की नोक का रंग बदलकर सफेद हो जाना।
- यह सफेदी धीरे-धीरे पत्ती के नीचे वाले हिस्से की ओर बढ़ने लगती है।
- चूंकि नर्सरी में पौधे छोटे होते हैं, इसलिए इसमें बड़ी धारियां स्पष्ट न दिखकर पत्तियों के किनारों पर सूखेपन या सफेद धब्बों के रूप में लक्षण दिखाई देते हैं।
यदि किसान समय रहते इन बदलावों को देख लेते हैं, तो फसल को बड़े नुकसान से बचाया जा सकता है। नियमित तौर पर खेतों का निरीक्षण करना ही इस बीमारी से बचने का सबसे प्रभावी तरीका है।
रोपाई के दौरान अपनाएं ये सुरक्षा उपाय
विशेषज्ञों का कहना है कि रोपाई के समय ही सावधानी बरतने से बीमारी का असर काफी कम किया जा सकता है। यदि नर्सरी से लाए गए पौधों में संक्रमण के शुरुआती लक्षण दिख रहे हों, तो उन्हें सीधे खेत में लगाने के बजाय जैविक उपचार देना बेहतर होता है। इसके लिए स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस (Pseudomonas fluorescens) का उपयोग सबसे कारगर माना गया है।
पौधों की जड़ों को उपचारित करने की प्रक्रिया इस प्रकार है:
- खेत के पास ही एक गड्ढा बनाकर उसमें साफ पानी भर लें।
- इसमें स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस पाउडर को 10 से 15 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से अच्छी तरह मिलाएं।
- धान के पौधों की जड़ों को इस तैयार घोल में कुछ देर के लिए डुबोकर रखें।
- इसके बाद पौधों की रोपाई करें, जिससे जैविक एजेंट जड़ों के माध्यम से पौधे के भीतर पहुंचकर उसे सुरक्षा प्रदान करें।
बीमारी फैलने पर क्या करें
अगर खेत में रोग का प्रकोप अधिक बढ़ गया हो, तो केवल जैविक तरीकों से काम नहीं चलेगा। ऐसी स्थिति में विशेषज्ञ रसायनों के उपयोग की सलाह देते हैं। संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए स्ट्रेप्टोमाइसिन/स्ट्रेप्टोसाइक्लिन या टेट्रासाइक्लिन आधारित दवाओं का प्रयोग किया जा सकता है। इसके अलावा कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का छिड़काव भी काफी मददगार होता है। इसे तैयार करने के लिए 3 ग्राम कॉपर ऑक्सीक्लोराइड को प्रति लीटर पानी में मिलाकर घोल तैयार करें और प्रभावित फसलों पर इसका छिड़काव करें।
विशेषज्ञ की किसानों को सलाह
डॉ विनोद निर्मलकर का स्पष्ट कहना है कि फसल की सुरक्षा के लिए सतर्कता ही सबसे बड़ा बचाव है। किसानों को चाहिए कि वे रोपाई के बाद नियमित रूप से खेतों का दौरा करें। पत्तियों के रंग में बदलाव, किनारों का सूखना या पौधों में किसी भी प्रकार की गलन दिखे, तो तुरंत किसी स्थानीय कृषि विशेषज्ञ से संपर्क करें। शुरुआती अवस्था में सही उपचार मिलने से न केवल पैदावार सुरक्षित रहती है, बल्कि होने वाले आर्थिक नुकसान को भी कम किया जा सकता है। सही समय पर लिया गया निर्णय ही आपकी मेहनत और लागत को बर्बाद होने से बचा सकता है।
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