पाकिस्तान का प्रोपेगेंडा और हकीकत
पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने एक ऐसा बयान दिया है जिसने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस छेड़ दी है। अपनी विफलताओं और देश की बदतर होती स्थिति से ध्यान हटाने के लिए पाकिस्तानी नेतृत्व ने फिर से भारत के अखंड भारत के विचार को निशाना बनाया है। जरदारी ने दावा किया कि पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों को देश में पूरी आजादी है और वे भारत जाने के बजाय पाकिस्तान में रहना ही बेहतर समझते हैं।
हिंदुओं के नाम पर राजनीति
राष्ट्रपति ने अपने भाषण में विशेष रूप से पाकिस्तान में रह रहे 4 प्रतिशत हिंदुओं का जिक्र किया। उन्होंने यह दलील पेश करने की कोशिश की कि ये लोग यहां सुरक्षित और स्वतंत्र हैं। हालांकि, जानकारों का कहना है कि यह केवल एक राजनीतिक दांव है जिसका मकसद अपने देश की आंतरिक समस्याओं और अल्पसंख्यकों के खिलाफ हो रहे अत्याचारों से दुनिया का ध्यान भटकाना है।
सांख्यिकी का कड़वा सच
पाकिस्तान के दावों की पोल वहां के जनसांख्यिकीय आंकड़ों से ही खुल जाती है। ऐतिहासिक दस्तावेजों के मुताबिक, बंटवारे के समय पाकिस्तान के क्षेत्र में हिंदुओं की आबादी 20 से 25 फीसदी हुआ करती थी। पिछले कई दशकों में लगातार हो रहे जुल्म, भेदभाव और जबरन धर्म परिवर्तन के कारण यह संख्या घटकर अब महज 4 फीसदी पर आ गई है। यह आंकड़ा खुद इस बात का प्रमाण है कि वहां अल्पसंख्यकों के लिए स्थितियां कितनी चुनौतीपूर्ण रही हैं।
बदहाली छिपाने की कोशिश
विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के बयान देना पाकिस्तानी हुक्मरानों की पुरानी आदत रही है। जब भी देश आर्थिक संकट या सामाजिक अस्थिरता का सामना करता है, भारत को बदनाम करने के लिए हिंदुओं के नाम का इस्तेमाल किया जाता है। अखंड भारत के विचार को डर के रूप में पेश करके जरदारी ने यह साबित करने की कोशिश की कि वे अपनी विफलता का ठीकरा भारत पर फोड़ना चाहते हैं।
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