मध्य प्रदेश के खंडवा में एक मामूली दूध भंडार से शुरू हुआ कारोबार आज एक बड़े नाम में तब्दील हो चुका है। साल 1980 में डाली गई इस नींव को तीन पीढ़ियों ने मिलकर इतना सशक्त बनाया कि आज “दिव्य दूध” पूरे निमाड़ और मध्य प्रदेश में भरोसे की पहचान बन गया है। यह सिर्फ एक व्यवसाय की दास्तान नहीं, बल्कि कड़ी मेहनत, दूरदर्शिता, बदलाव को अपनाने की समझ और परिवार की एकता का जीवंत उदाहरण है, जिसने वक्त के साथ खुद को निरंतर निखारा।
छोटी शुरुआत और बड़े सपने
इस डेयरी की बुनियाद स्वर्गीय दुर्गा प्रसाद अग्रवाल ने रखी थी, जो मूल रूप से राजस्थान से खंडवा आकर बसे थे। शुरुआती दिनों में उन्होंने अतर गांव में किराना की दुकान चलाई, लेकिन बाद में शहर आकर जड़वचंद जैन के साथ मिलकर 1980 में एक छोटी दूध दुकान खोली। उस दौर में दूध महज 80 पैसे प्रति लीटर बिकता था और साधन भी बेहद सीमित थे, फिर भी ईमानदारी और गुणवत्ता के बल पर उन्होंने धीरे-धीरे ग्राहकों का विश्वास हासिल करना शुरू किया।
दूसरी पीढ़ी ने रखी मजबूत बुनियाद
इसके बाद इस कारोबार की कमान उनके बेटों पूरणमल अग्रवाल और शंभूराम अग्रवाल ने संभाली। दोनों ने अपनी लगन और परिश्रम से इस छोटे काम को आगे बढ़ाते हुए उसे एक अलग पहचान दिलाई। उस समय न तो कोई ब्रांडिंग थी और न आधुनिक सुविधाएं, लेकिन ग्राहकों के साथ भरोसे का रिश्ता इतना गहरा था कि दुकान पर हमेशा भीड़ जुटी रहती थी।
तीसरी पीढ़ी ने किया बड़ा बदलाव
जब कारोबार तीसरी पीढ़ी नवनीत अग्रवाल और विशाल अग्रवाल के हाथ में आया, तो उन्होंने समय की मांग के अनुसार बदलाव का फैसला लिया। कोरोना काल में लोगों का रुझान खुले दूध से हटकर पैकेज्ड दूध की ओर बढ़ गया। इसी अवसर को भांपते हुए दोनों भाइयों ने “दिव्य दूध” ब्रांड की नींव रखी। उन्होंने स्थानीय स्तर पर पैकिंग वाला शुद्ध दूध उपलब्ध कराने का लक्ष्य तय किया, जो आज कामयाब साबित हो रहा है।
दूध से आगे एक पूरा डेयरी ब्रांड
आज “दिव्य दूध” सिर्फ दूध तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह एक संपूर्ण डेयरी ब्रांड बन चुका है। इसके उत्पादों में शामिल हैं:
- ताजा पैकेज्ड दूध (गाय, भैंस और देशी गाय)
- पनीर
- मावा
- शुद्ध घी
- लस्सी और अन्य डेयरी उत्पाद
इन सभी उत्पादों को आधुनिक पैकेजिंग के साथ बाजार में उतारा जा रहा है, जिससे गुणवत्ता और स्वच्छता दोनों बरकरार रहती हैं।
गुणवत्ता ही सबसे बड़ी पूंजी
परिवार का एक ही उसूल रहा है, जो हम खुद खा-पी सकते हैं, वही अपने ग्राहकों को परोसें। इसी सोच ने “दिव्य दूध” को लोगों के बीच खास बना दिया। ग्राहक इसे केवल दूध नहीं, बल्कि भरोसे के रूप में देखते हैं। ब्रांड के विस्तार के साथ स्थानीय स्तर पर कई लोगों को रोजगार भी मिला है। आज यह डेयरी खंडवा के साथ-साथ आसपास के जिलों तक अपनी पहुंच बना चुकी है और आने वाले समय में बड़े शहरों तक विस्तार की तैयारी है।
पारिवारिक एकता बनी सफलता की कुंजी
नवनीत और विशाल का कहना है कि उनकी कामयाबी के पीछे सबसे बड़ी वजह परिवार की एकजुटता है। दोनों बताते हैं कि उन्होंने अपने जीवन में रामायण के आदर्शों को आत्मसात किया है। उनके अनुसार, जहां भाई-भाई के बीच प्रेम, सम्मान और समझदारी होती है, वहां तरक्की तय है। दोनों भाई हर फैसला आपसी सलाह-मशविरे से लेते हैं और यही तालमेल उनके कारोबार को लगातार आगे ले जा रहा है।
80 पैसे से 70 रुपए तक का सफर
जिस कारोबार की शुरुआत 80 पैसे प्रति लीटर दूध से हुई थी, वही दूध आज 60–70 रुपए प्रति लीटर तक पहुंच चुका है। यह सफर केवल कीमत का नहीं, बल्कि विश्वास, मेहनत और समय के साथ खुद को बदलने की क्षमता का है। “दिव्य दूध” की यह कहानी बताती है कि अगर आपके पास सही सोच, मेहनत और बदलाव को अपनाने की हिम्मत है, तो छोटे स्तर से शुरुआत करके भी एक बड़ा ब्रांड खड़ा किया जा सकता है। तीन पीढ़ियों की यह मेहनत आज एक मिसाल बन चुकी है, जो आने वाली युवा पीढ़ी और उद्यमियों को आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।
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