पटना सिटी: सुप्रीम कोर्ट के आदेश से मचा हड़कंप, कंगन घाट से नौजर घाट तक घरों को बचाने के लिए सड़कों पर उतरे लोग

पटना सिटी में गंगा किनारे बसे सैकड़ों परिवारों को घर खाली करने का नोटिस मिलने के बाद हड़कंप मच गया है। स्थानीय लोग दशकों पुराने अपने मकानों को बचाने के लिए सड़कों पर उतर आए हैं और इसे लेकर भारी विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।

गंगा किनारे बसे लोगों पर संकट के बादल

बिहार की राजधानी पटना के पटना सिटी इलाके में इस समय भारी तनाव का माहौल है। गंगा नदी के किनारे बसे कंगन घाट से लेकर नौजर घाट तक के निवासियों के सामने अपने सिर से छत छिन जाने का संकट खड़ा हो गया है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए एक आदेश के बाद प्रशासन ने इन इलाकों में बनी इमारतों को अवैध बताते हुए उन्हें खाली करने का नोटिस थमा दिया है। इस अचानक आई कानूनी कार्रवाई ने उन परिवारों की नींद उड़ा दी है, जो पिछले कई दशकों से यहां अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे। नोटिस मिलने के बाद से ही इलाके के लोग लामबंद हो गए हैं और अपने घरों को बचाने के लिए सड़क पर उतर आए हैं।

जमीन और आवास बचाओ संघर्ष मोर्चा का आंदोलन

सरकारी नोटिस के खिलाफ स्थानीय लोग एकजुट होकर सड़कों पर उतर आए हैं। इन लोगों ने जमीन और आवास बचाओ संघर्ष मोर्चा के बैनर तले एक बड़ा आक्रोश मार्च निकाला। रविवार को कंगन घाट से नौजर घाट तक निकाली गई इस रैली में बड़ी संख्या में पुरुष और महिलाएं शामिल हुईं। हाथों में तख्तियां लिए और सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते हुए प्रदर्शनकारियों ने साफ कर दिया कि वे किसी भी सूरत में अपनी जमीन और मकान छोड़कर कहीं और नहीं जाएंगे। प्रदर्शन के दौरान लोगों का आक्रोश साफ देखा जा सकता था, जो अपनी आजीविका और आवास के प्रति सरकार की नीति को चुनौती दे रहे थे।

प्रशासन की कार्रवाई के पीछे की कानूनी वजह

प्रशासन की ओर से की जा रही इस कार्रवाई का आधार सुप्रीम कोर्ट का वह आदेश है, जिसमें सरकारी जमीन से अवैध कब्जों को हटाने के निर्देश दिए गए हैं। राज्य सरकार इस आदेश के अनुपालन में पटना सिटी के नौजर घाट से कंगन घाट के बीच गंगा के किनारे बसी सरकारी जमीनों को खाली कराने की मुहिम चला रही है। इस मुहिम के तहत ही स्थानीय निवासियों को मकान खाली करने के लिए नोटिस जारी किए गए हैं। प्रशासन का तर्क है कि ये निर्माण बिना वैध अनुमति के सरकारी भूमि पर किए गए हैं, जबकि स्थानीय लोग इसके विपरीत दावे कर रहे हैं।

50 से 60 वर्षों का पुराना है बसेरा

विरोध प्रदर्शन कर रहे लोगों का कहना है कि वे यहां कोई नए बाशिंदे नहीं हैं। प्रदर्शन में शामिल निवासियों के अनुसार, वे पिछले 50 से 60 वर्षों से इसी इलाके में रह रहे हैं। उनका दावा है कि यह जमीन सरकारी नहीं बल्कि रैयती जमीन है। लोगों का कहना है कि उन्होंने बरसों पहले इन जमीनों की रजिस्ट्री कराई थी और उसके बाद ही यहां विधिवत रूप से मकान बनाए थे। उन्होंने आरोप लगाया कि अचानक सरकारी जमीन का लेबल लगाकर उनके साथ अन्याय किया जा रहा है।

बिजली और पानी के कनेक्शन पर भी उठे सवाल

स्थानीय निवासियों ने प्रशासन की कार्रवाई पर कड़े सवाल उठाए हैं। उन्होंने तर्क दिया है कि अगर यह जमीन सरकारी थी और अवैध रूप से कब्जा की गई थी, तो दशकों तक उन्हें बिजली और पानी के कनेक्शन कैसे और क्यों दिए गए। लोगों का कहना है कि उनके पास निवास से जुड़े सभी जरूरी पहचान पत्र और सरकारी दस्तावेज मौजूद हैं। यदि वे अवैध थे, तो सरकार ने इतने वर्षों तक उनकी मौजूदगी पर चुप्पी क्यों साधे रखी। अचानक दी गई बेदखली की नोटिस ने उनके सामने एक बड़ा मानवीय संकट खड़ा कर दिया है।

जान दे देंगे लेकिन घर नहीं छोड़ेंगे: स्थानीय निवासी

आक्रोश मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों का रुख बेहद सख्त और भावुक था। बहुत से परिवारों ने साफ लहजे में कहा कि उनके पास रहने के लिए कोई दूसरा ठिकाना नहीं है। उन्होंने भावुक होकर कहा, जान दे देंगे, लेकिन मकान खाली नहीं करेंगे। यह स्थिति उस पीड़ा को दर्शाती है जो इन परिवारों को नोटिस मिलने के बाद महसूस हो रही है। अपनी पूरी जिंदगी की कमाई और यादें इसी जमीन से जुड़ी होने के कारण वे इसे छोड़ने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं हैं।

समाधान की मांग और आगे की राह

प्रदर्शनकारियों ने राज्य सरकार से मांग की है कि इस पूरे मामले की नए सिरे से जांच कराई जाए। उनका कहना है कि किसी भी प्रकार की ध्वस्तीकरण या खाली कराने की कार्रवाई से पहले जमीन के दस्तावेजों का सत्यापन किया जाना चाहिए। प्रभावित परिवारों ने यह मांग रखी है कि सरकार उनकी बात सुने और मालिकाना हक के विवाद को सुलझाने के लिए कानूनी दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच करवाए। सरकारी अमले की कार्रवाई और जनता के कड़े विरोध के बीच यह मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है, जिससे इलाके में भविष्य को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं।

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