भिंडी की फसल में टेढ़े फल और पीलापन है बड़ी समस्या, इन वैज्ञानिक तरीकों से करें बचाव

भिंडी की खेती करने वाले किसान अक्सर फसल में लगने वाले 'भंगरी' रोग से परेशान रहते हैं, जिससे फल टेढ़े हो जाते हैं। कृषि विशेषज्ञों ने इसे नियंत्रित करने के लिए सटीक उपाय सुझाए हैं।

भिंडी की खेती और किसानों की चुनौती

आजकल किसान पारंपरिक खेती की राह छोड़कर सब्जियों की खेती की ओर रुख कर रहे हैं, क्योंकि इसमें मुनाफे की संभावनाएं अधिक होती हैं। हालांकि, सब्जी उत्पादन में कीटों और तरह-तरह की बीमारियों का खतरा हमेशा बना रहता है। इन दिनों भिंडी की खेती करने वाले किसान एक विशेष प्रकार की समस्या से काफी चिंतित हैं। कृषि जानकारों के अनुसार, भिंडी की फसल में एक गंभीर बीमारी लगती है जिसे किसान आम बोलचाल में भंगरी कहते हैं। वैज्ञानिक शब्दावली में इस रोग को येलो वेन मोजैक वायरस के नाम से जाना जाता है।

बीमारी के लक्षण और प्रभाव

इस वायरल बीमारी के हमले से भिंडी के पौधों की पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं और वे मुरझाई हुई सी दिखाई देती हैं। इसका सीधा असर पौधों के विकास पर पड़ता है और उनकी वृद्धि रुक जाती है। सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि इस रोग के कारण भिंडी के फल टेढ़े-मेढ़े हो जाते हैं, जिससे बाजार में उनकी गुणवत्ता गिर जाती है और किसानों को सही दाम नहीं मिल पाता। व्यावसायिक स्तर पर उगाई जाने वाली भिंडी जो बाजार में बिल्कुल सीधी दिखाई देती है, उसके पीछे कीटनाशकों का नियमित और नियंत्रित प्रयोग एक प्रमुख कारण है।

कैसे फैलती है यह बीमारी

पौधा संरक्षण अधिकारी सुजीत पाल के मुताबिक, यह एक वायरल बीमारी है और इसे जड़ से पूरी तरह खत्म करना बहुत चुनौतीपूर्ण कार्य है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि यह बीमारी मुख्य रूप से व्हाइट फ्लाई (सफेद कीट) के माध्यम से एक पौधे से दूसरे पौधे में फैलती है। इसलिए किसानों को फसल की शुरुआत से ही सतर्कता बरतने की आवश्यकता होती है। यदि शुरुआती अवस्था में ही कीटों को नियंत्रित कर लिया जाए, तो फसल के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

बचाव के प्रभावी उपाय

विशेषज्ञों ने जैविक खेती करने वाले किसानों को सलाह दी है कि वे नीम के तेल का छिड़काव करें, जो कीटों को दूर रखने में सहायक होता है। इसके अलावा, खेत के भीतर पीला और नीला ट्रैप (Yellow and Blue Trap) लगाना एक अत्यंत प्रभावी तरीका है। इन ट्रैप पर एक विशेष प्रकार का चिपचिपा पदार्थ लगा होता है, जिस पर व्हाइट फ्लाई जैसे हानिकारक कीट आकर चिपक जाते हैं। इससे खेत में कीटों की आबादी कम हो जाती है और बीमारी का प्रसार रुक जाता है।

दवा का छिड़काव और सावधानी

यदि कीटों का प्रकोप ज्यादा हो, तो किसान कीटनाशकों और सकिंग पेस्ट कंट्रोल दवाओं का उपयोग कर सकते हैं। हालांकि, इन रसायनों का प्रयोग करते समय विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। विशेषज्ञों का स्पष्ट निर्देश है कि कीटनाशक के छिड़काव के बाद कम से कम एक सप्ताह तक भिंडी की तुड़ाई बिल्कुल न करें। ऐसा इसलिए जरूरी है क्योंकि कीटनाशकों का असर पौधों पर कुछ दिनों तक बना रहता है। छिड़काव के सात दिन बीत जाने के बाद ही भिंडी की तुड़ाई करना स्वास्थ्य के लिहाज से सुरक्षित माना जाता है।

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