मिड-डे मील की गुणवत्ता पर उठे गंभीर सवाल
बिहार की राजधानी पटना से सटे दानापुर में एक सरकारी स्कूल की व्यवस्था पर उस समय सवालिया निशान लग गए, जब वहां परोसे जाने वाले मिड-डे मील में कीड़े पाए गए। दानापुर प्रखंड स्थित राजकीय मध्य विद्यालय, रघुनाथ टोला (दाउदपुर) का एक वीडियो सोशल मीडिया पर बड़ी तेजी से फैल रहा है, जिसमें भोजन में कीड़े होने का दावा किया गया है। जैसे ही यह बात सामने आई, स्कूल परिसर में हंगामा मच गया। नाराज अभिभावकों, स्थानीय जनप्रतिनिधियों और बच्चों ने स्कूल प्रशासन की लापरवाही के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया।
गोदाम से उठ रही थी बदबू, चावलों में थे कीड़े
स्कूल में हुए हंगामे के दौरान जब स्थानीय लोगों और अभिभावकों ने जांच की, तो स्कूल के गोदाम का नजारा देखकर सब हैरान रह गए। गोदाम में रखे राशन के बोरों से भारी बदबू आ रही थी। लोगों का आरोप है कि जो चावल बच्चों को खाना बनाने के लिए दिया जा रहा है, उसमें स्पष्ट रूप से कीड़े रेंगते देखे गए हैं। छात्रों का कहना है कि उन्हें अक्सर इस तरह का खराब भोजन परोसा जाता है, जिसके कारण कई बच्चे डर के मारे दोपहर का भोजन करने से ही कतराते हैं। छात्रों ने यह भी आरोप लगाया कि मिड-डे मील के निर्धारित मेन्यू का पालन नहीं होता है, उन्हें न तो अंडे दिए जाते हैं और न ही तय नियमों के अनुसार मौसमी फल मिलते हैं। इसके अतिरिक्त, स्कूल के शौचालयों की स्थिति भी अत्यंत दयनीय बनी हुई है।
रसोइयों ने खोली प्रधानाध्यापक की पोल
इस पूरे मामले पर स्कूल की रसोइया, रसभरिया देवी और रेशमी देवी ने बेहद चौंकाने वाला खुलासा किया है। उन्होंने बताया कि खराब राशन और कीड़े लगे हुए चावल को लेकर उन्होंने कई बार प्रधानाध्यापक को सूचित किया था। रसोइयों का दावा है कि उनके द्वारा शिकायत करने के बावजूद उन्हें प्रधानाध्यापक द्वारा हर बार यही निर्देश दिया गया कि वे उसी खराब राशन से बच्चों के लिए भोजन तैयार करें। यह खुलासा स्कूल प्रशासन की संवेदनहीनता को दर्शाता है कि जानकारी होने के बावजूद बच्चों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ किया गया।
प्रधानाध्यापक का चौंकाने वाला बयान
जब स्कूल के प्रधानाध्यापक नंद लाल चौधरी से इस लापरवाही के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने एक ऐसा बयान दिया जिसने सबकी चिंता बढ़ा दी। प्रधानाध्यापक ने यह तो माना कि चावल में कभी-कभार कीड़े निकल आते हैं और उसे साफ कराकर भोजन बनवाया जाता है, लेकिन इसके बाद उन्होंने जो कहा वह हैरान करने वाला था। उन्होंने साफ तौर पर स्वीकार किया कि वे खुद स्कूल में बनने वाला मिड-डे मील नहीं खाते हैं। जबकि सरकारी नियमावली के अनुसार, बच्चों को खाना परोसने से पहले प्रधानाध्यापक या किसी शिक्षक के लिए यह अनिवार्य होता है कि वे भोजन की गुणवत्ता की जांच करें यानी उसे चखें। प्रधानाध्यापक ने अपना बचाव करते हुए कहा कि उन्होंने इस मामले की जानकारी पूर्व में स्कूल के सचिव और गांव के मुखिया को भी दी थी।
प्रशासन ने दिए जांच के आदेश
स्कूल में हो रहे हंगामे की सूचना मिलने पर स्थानीय वार्ड पार्षद प्रतिनिधि नरेश कुमार और अन्य लोग वहां पहुंचे। उन्होंने बच्चों की सेहत के साथ हो रही इस गंभीर लापरवाही पर नाराजगी जताते हुए दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की है। मामले की गंभीरता को देखते हुए दानापुर के अनुमंडल पदाधिकारी (SDO) ने तत्काल संज्ञान लिया है। प्रशासन का कहना है कि इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच की जा रही है। जांच रिपोर्ट के आने के बाद जो भी दोषी पाया जाएगा, उसके खिलाफ कड़ी कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। अब सवाल यह उठता है कि बच्चों के पोषण और उनके भविष्य के नाम पर दी जाने वाली इस सरकारी योजना की गुणवत्ता की जिम्मेदारी किसकी है और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाएंगे।
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