मेहनत के दम पर बदली तकदीर
बिहार के सीतामढ़ी जिले से एक प्रेरणादायक कहानी सामने आई है। महज 17 वर्ष की आयु में कृष्णा आनंद ने मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट यानी NEET में अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की है। इस परीक्षा में पूरे देश से लगभग 23 लाख 33 हजार छात्र शामिल हुए थे, जिनमें से 11 लाख 21 हजार परीक्षार्थियों ने सफलता दर्ज की है। इस कड़े प्रतिस्पर्धात्मक माहौल के बीच कृष्णा आनंद ने अपनी मेहनत और संकल्प से ऑल इंडिया 1500वीं रैंक प्राप्त की है। वहीं, यदि उनकी ओबीसी श्रेणी की बात करें, तो उन्होंने 488वीं रैंक हासिल कर पूरे जिले का नाम गौरवान्वित किया है। इस उपलब्धि ने न केवल उनके परिवार को बल्कि पूरे क्षेत्र को गर्व से भर दिया है।
कोटा में गढ़ी सफलता की इबारत
कृष्णा आनंद का शैक्षणिक सफर बेहद अनुशासित रहा है। उन्होंने कक्षा 8वीं से लेकर 12वीं तक की अपनी पूरी शिक्षा राजस्थान के कोटा में रहकर ही पूर्ण की। कोटा में उन्होंने न केवल स्कूली पढ़ाई पर ध्यान दिया, बल्कि नीट परीक्षा की तैयारी के लिए दिन-रात एक कर दिया। अपनी इस कामयाबी का श्रेय वे अपने माता-पिता, अपने बड़े भाई और उन सभी शिक्षकों को देते हैं जिन्होंने हर मोड़ पर उनका साथ दिया। उनके बड़े भाई स्वयं दिल्ली से कंप्यूटर साइंस यानी CS ब्रांच में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे हैं, जो कृष्णा के लिए हमेशा से एक मजबूत प्रेरणा रहे हैं।
डॉक्टर बनने की प्रेरणा मिली विरासत में
चिकित्सा क्षेत्र से कृष्णा का जुड़ाव बचपन से ही रहा है। उनके परिवार में कई सदस्य स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े हुए हैं। उनके चाचा डॉ. अमलेंदु कुमार एक जाने-माने एमडी रेडियोलॉजिस्ट हैं, जो आनंद डायग्नोस्टिक सेंटर का संचालन करते हैं। इस सेंटर की पूरी प्रबंधन व्यवस्था कृष्णा के पिता धर्मेंद्र कुमार देखते हैं। अपने चाचा को मरीजों की सेवा करते हुए देखकर कृष्णा के मन में भी देश के बेहतरीन डॉक्टरों में शामिल होने का सपना पनपा। उन्होंने 12वीं कक्षा के साथ ही इस सपने को अपनी कड़ी मेहनत के जरिए हकीकत में बदलने की शुरुआत की।
चुनौतियों के बावजूद नहीं मानी हार
अपनी संघर्ष यात्रा के बारे में बात करते हुए कृष्णा ने बताया कि 8वीं से 10वीं तक की पढ़ाई भले ही सामान्य रही, लेकिन 11वीं और 12वीं कक्षा उनके लिए सबसे चुनौतीपूर्ण और निर्णायक साबित हुई। तैयारी के दौरान उनके सामने कई उतार-चढ़ाव आए, लेकिन उन्होंने हार मानने के बजाय चुनौतियों का डटकर सामना किया। कृष्णा ने बताया कि उन्होंने पूरी तरह से कोचिंग के स्टडी मटेरियल और लेक्चर्स पर ध्यान केंद्रित किया। उनके अनुसार, नीट जैसे बड़े एग्जाम को पास करने के लिए सिर्फ थ्योरी पढ़ना पर्याप्त नहीं है, बल्कि मॉक टेस्ट देना और सवालों की प्रैक्टिस करना सफलता के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है। उन्होंने तैयारी के दौरान अधिकतम प्रश्नों को हल करने को ही अपनी रणनीति का मुख्य आधार बनाया।
कार्डियोलॉजिस्ट बनने का है सपना
कृष्णा की इस उपलब्धि पर उनके परिवार में उत्सव जैसा माहौल है। उनके चाचा डॉ. प्रवीण कुमार ने इसे सीतामढ़ी के लिए गर्व का क्षण बताते हुए कहा कि लाखों परीक्षार्थियों के बीच 1500वीं रैंक लाना कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। कृष्णा के पिता धर्मेंद्र कुमार और उनकी माता रेनू रानी, जो कि एक आंगनबाड़ी सेविका हैं, अपने बेटे की इस सफलता पर अत्यधिक गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। अब कृष्णा का लक्ष्य एक कुशल कार्डियोलॉजिस्ट यानी दिल का डॉक्टर बनकर मरीजों की सेवा करना है। वे आगे की अपनी मेडिकल पढ़ाई देश के किसी प्रतिष्ठित टॉप कॉलेज से पूरी करना चाहते हैं, ताकि वे अपने डॉक्टर बनने के सपने को पूरी तरह साकार कर सकें।
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