फसल कोई और, सरकारी कागज में कोई और: फरीदाबाद के दयालपुर गांव में किसानों को क्यों नहीं मिल रही बाजरे पर सब्सिडी?

हरियाणा के फरीदाबाद जिले के दयालपुर गांव के किसानों ने सरकारी अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि खेतों में बाजरा बोने के बावजूद सरकारी फाइलों में धान दर्ज कर दिया जाता है, जिससे उन्हें प्रति एकड़ मिलने वाली 7 हजार रुपये की सब्सिडी नहीं मिल पा रही है।

हरियाणा के फरीदाबाद जिले के अंतर्गत आने वाले दयालपुर गांव के किसान इन दिनों एक बेहद अजीब और परेशान करने वाली समस्या से जूझ रहे हैं। खेतों में दिन-रात पसीना बहाकर फसल उगाने वाले इन अन्नदाताओं के सामने प्राकृतिक आपदाओं और बढ़ती लागत के अलावा अब प्रशासनिक लापरवाही एक बड़ी मुसीबत बन चुकी है। दयालपुर के किसानों का आरोप है कि उन्हें बाजरा और ज्वार जैसी महत्वपूर्ण फसलों पर मिलने वाली सरकारी सब्सिडी से सिर्फ इसलिए वंचित होना पड़ रहा है क्योंकि सरकारी दस्तावेजों में उनकी फसलों का विवरण पूरी तरह गलत दर्ज है।

किसानों का कहना है कि वे लगातार सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं और अपनी बात अधिकारियों के सामने रख रहे हैं, लेकिन उनकी इस जायज परेशानी को दूर करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा है। कागजी हेराफेरी के चलते किसानों के हक का पैसा उन तक नहीं पहुंच पा रहा है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति पर गहरा असर पड़ रहा है।

सरकारी योजना की घोषणा लेकिन धरातल पर सन्नाटा

सरकार की ओर से किसानों को वैकल्पिक फसलों की खेती के लिए प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से बाजरा और ज्वार पर करीब 7 हजार रुपये प्रति एकड़ की सब्सिडी देने की घोषणा की गई है। दयालपुर गांव के निवासी और स्थानीय किसान संजीव कुमार बैंसला ने इस पूरे मामले पर लोकल18 से विशेष बातचीत की। उन्होंने बताया कि सरकार दावे तो बहुत बड़े-बड़े करती है, लेकिन हकीकत में यह सब्सिडी जरूरतमंद किसानों तक सही तरीके से पहुंच ही नहीं पाती है।

संजीव कुमार बैंसला ने कहा कि यदि सरकार द्वारा घोषित की गई यह राशि बिना किसी अड़चन के और बिल्कुल सही समय पर किसानों के खातों में ट्रांसफर कर दी जाए, तो इससे उन्हें बहुत बड़ी आर्थिक राहत मिलेगी। समय पर आर्थिक मदद मिलने से किसान बाजरा, ज्वार और अन्य पारंपरिक फसलों को उगाने के लिए प्रेरित होंगे, जिससे खेती की विविधता भी बढ़ेगी। लेकिन मौजूदा व्यवस्था में सब्सिडी पाने के लिए किसानों को पटवारी से लेकर तमाम सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

कागजों में बाजरे की जगह दर्ज हो रहा धान

किसानों की इस समस्या की सबसे बड़ी जड़ सरकारी रिकॉर्ड में फसलों का गलत विवरण दर्ज होना है। संजीव कुमार बैंसला ने बताया कि खेतों में वास्तव में बाजरा या ज्वार की बुवाई की गई होती है, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में उसे बदलकर धान लिख दिया जाता है। इस बड़ी गड़बड़ी के कारण जब सब्सिडी जारी होने का समय आता है, तो तकनीकी कारणों से किसान का नाम लाभार्थियों की सूची से बाहर हो जाता है और वह अपने हक से वंचित रह जाता है।

इस गड़बड़ी को सुधारने के लिए किसानों को बेहद जटिल प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। उन्हें पहले पटवारी के चक्कर लगाने पड़ते हैं, फिर मंडियों में जाकर नए सिरे से पंजीकरण कराने की कोशिश करनी पड़ती है। इतनी भागदौड़ और मानसिक परेशानी झेलने के बाद भी इस बात की कोई गारंटी नहीं होती कि किसानों को उनकी सब्सिडी मिल ही जाएगी। संजीव कुमार बैंसला का कहना है कि अगर सरकार वास्तव में किसानों का भला चाहती है, तो उसे सबसे पहले फसल रिकॉर्ड के सत्यापन की प्रक्रिया को दुरुस्त करना होगा ताकि सही किसानों को समय पर सब्सिडी का लाभ मिल सके।

कम लागत में अच्छी फसल, फिर भी क्यों ठगा महसूस कर रहा किसान?

खेती-किसानी के खर्चों का ब्योरा देते हुए संजीव कुमार बैंसला ने बताया कि बाजरे की खेती किसानों के लिए बहुत ज्यादा खर्चीली नहीं होती है। इस फसल में लागत काफी सीमित आती है, जो इस प्रकार है:

  • एक एकड़ खेत में बाजरे के बीज पर आने वाला कुल खर्च लगभग 500 से 700 रुपये तक होता है।
  • अगर बुवाई से लेकर पूरी फसल की कुल लागत को देखा जाए, तो यह प्रति एकड़ करीब 2500 से 3000 रुपये के बीच आती है।

लागत कम होने और सरकारी सब्सिडी मिलने की उम्मीद में किसान इन फसलों की बुवाई तो कर देते हैं, लेकिन जब प्रशासनिक स्तर पर लापरवाही के कारण उन्हें सब्सिडी नहीं मिलती, तो वे खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं। सरकारी घोषणाओं के बावजूद धरातल पर लाभ न मिलना किसानों के भरोसे को तोड़ता है।

एसी दफ्तरों में बैठकर तैयार हो रहा है किसानों का रिकॉर्ड

किसानों का आरोप है कि आजकल सरकारी नियमों और दावों के विपरीत धरातल पर काम हो रहा है। नियमानुसार, फसलों का पंजीकरण ऑनलाइन माध्यम से किया जाता है, जिसके बाद संबंधित पटवारी को व्यक्तिगत रूप से खेतों में जाकर भौतिक सत्यापन करना होता है। पटवारी को मौके पर जाकर देखना होता है कि किसान ने वास्तव में किस फसल की बुवाई की है।

लेकिन दयालपुर के किसानों का सीधा आरोप है कि आजकल पटवारी खेतों में कदम तक नहीं रखते हैं। वे अपने दफ्तरों में बैठकर ही मनमाने ढंग से रिकॉर्ड को ऑनलाइन अपडेट कर देते हैं। इस लापरवाही के कारण कई बार चौंकाने वाली गलतियां सामने आती हैं। उदाहरण के लिए, यदि किसी किसान ने अपने खेत में भिंडी की खेती की है, तो रिकॉर्ड में कोई दूसरी ही फसल दर्ज कर दी जाती है। ठीक इसी तरह, जहां बाजरा और ज्वार लहलहा रहे होते हैं, वहां कागजों पर धान चढ़ा दिया जाता है।

एक दशक से जारी है यह समस्या, पुराने ढर्रे की मांग

किसान संजीव कुमार बैंसला ने बताया कि पहले की व्यवस्था आज की तुलना में कहीं बेहतर थी। आज से करीब 10 साल पहले पटवारी खुद चलकर खेतों तक आते थे। वे किसानों से बातचीत करते थे, फसलों को अपनी आंखों से देखते थे और उसके बाद ही सरकारी दस्तावेजों में फसलों का सही ब्योरा दर्ज किया जाता था। उस समय गलतियां होने की गुंजाइश बहुत कम होती थी और किसानों को बिना किसी परेशानी के सरकारी योजनाओं का लाभ मिल जाता था।

लेकिन पिछले करीब 10 साल से व्यवस्था में यह गिरावट आई है और तब से लगातार किसान इस गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं। अब दयालपुर गांव के किसान सरकार और उच्च अधिकारियों से पुरजोर मांग कर रहे हैं कि इस पुरानी और पारदर्शी व्यवस्था को दोबारा लागू किया जाए। अधिकारी खुद खेतों में आकर सही तरीके से सर्वे करें ताकि सरकारी रिकॉर्ड पूरी तरह से दुरुस्त हो सके और जिन वास्तविक किसानों का हक है, उन्हें बिना किसी देरी के उनकी मेहनत की सब्सिडी मिल सके।

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