अगेती गोभी की खेती से बंपर कमाई का मौका: कृषि वैज्ञानिक ने साझा किए उन्नत खेती के सफल सूत्र

खरीफ सीजन के दौरान अगेती गोभी की खेती किसानों के लिए मुनाफे का बड़ा जरिया बन सकती है, बस जरूरत है सही किस्मों और आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाने की।

खरीफ सीजन में गोभी की खेती से बंपर लाभ

खरीफ के मौसम में खेती करने वाले किसानों के लिए अगेती गोभी की फसल आर्थिक रूप से बेहद लाभदायक साबित हो सकती है। अगर किसान भाई सही वैज्ञानिक तरीके अपनाएं और उचित किस्मों का चयन करें, तो बाजार में शुरुआती सीजन के दौरान ही वे अपनी उपज का बेहतरीन मूल्य प्राप्त कर सकते हैं। शिवहर की कृषि वैज्ञानिक संचिता घोष के अनुसार, गोभी की खेती में सफलता का सबसे मुख्य आधार बीज का सही चयन होता है।

उन्नत किस्मों का चयन

कृषि वैज्ञानिक संचिता घोष ने किसानों को सलाह दी है कि वे बाजार की मांग को ध्यान में रखते हुए केवल उच्च गुणवत्ता वाली और अधिक उत्पादन देने वाली प्रजातियों का ही चुनाव करें। मुख्य रूप से पूसा दीपाली, सबौर अग्रिम, और सोनाली 45 जैसी उन्नत किस्में अगेती खेती के लिए सबसे उपयुक्त मानी गई हैं। इन किस्मों की बाजार में उपलब्धता कम और मांग अधिक होती है, जिसका सीधा फायदा किसानों को अच्छी कीमतों के रूप में मिलता है।

बीजोपचार की अनिवार्यता

फसल को शुरुआत में ही कई तरह की बीमारियों से बचाने के लिए बीजोपचार करना अनिवार्य है। वैज्ञानिक ने बताया कि किसान जैविक विधि से बीजोपचार करने के लिए ट्राइकोडर्मा का उपयोग कर सकते हैं। यदि किसान रासायनिक विधि अपनाना चाहते हैं, तो उन्हें प्रति किलोग्राम बीज के लिए 2 ग्राम थायरम या कैप्टन दवा का प्रयोग करना चाहिए। इससे बीजों में अंकुरण के बाद संक्रमण का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है।

आधुनिक नर्सरी प्रबंधन

पौध तैयार करने के लिए अब पारंपरिक तरीकों की जगह आधुनिक तकनीक अपनाना फायदेमंद है। प्रो-ट्रे (प्लास्टिक की छोटे खानों वाली ट्रे) में हर छेद में एक बीज डालकर बिचड़ा तैयार किया जाता है, जिससे पौधों का विकास एक समान होता है। यदि किसान पारंपरिक विधि का उपयोग करते हैं, तो उन्हें हमेशा जमीन से ऊँची उठी हुई क्यारियों का निर्माण करना चाहिए ताकि बारिश का पानी वहां न रुक सके।

पॉली-टनल तकनीक का महत्व

खरीफ के दौरान बारिश की अनिश्चितता को देखते हुए डॉ. संचिता घोष ने पॉली-टनल तकनीक अपनाने पर जोर दिया है। ऊँची क्यारियों पर पॉली-टनल बनाने से बारिश का पानी पौधों पर सीधा नहीं गिरता, जिससे बीज बहने या उनके सड़ने का डर खत्म हो जाता है। यह तकनीक फसलों को होने वाली घातक गलन बीमारी से बचाने में अत्यंत प्रभावशाली है। इस वैज्ञानिक पद्धति से मात्र 30 से 35 दिनों के भीतर पौधा मुख्य खेत में रोपाई के लिए तैयार हो जाता है।

रोपाई और देखभाल के टिप्स

एक एकड़ खेत की रोपाई के लिए लगभग 400 से 500 ग्राम बीज की आवश्यकता पड़ती है। सबौर अग्रिम जैसी किस्मों में एक फूल का वजन औसतन 400 से 700 ग्राम तक होता है, जो बाजार में अच्छा वजन देता है। खेत में रोपाई करते समय पौधों को मिट्टी चढ़ाकर या मेड़ बनाकर लगाने से भारी बारिश के दौरान भी जड़ें सुरक्षित बनी रहती हैं। हालांकि, यदि खेत में फिर भी फंगस या सड़न के लक्षण नजर आते हैं, तो उचित फफूंदनाशक का छिड़काव करना फसल को बचाने के लिए जरूरी है। इस प्रकार की वैज्ञानिक समझ और प्रबंधन अपनाकर किसान अपनी आय को कई गुना तक बढ़ा सकते हैं।

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