बांकीपुर चुनाव से पहले आरजेडी के भीतर गहराता संकट
बिहार की राजनीति में बांकीपुर विधानसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव को लेकर सरगर्मी तेज हो गई है, लेकिन इस चुनावी शोर के बीच राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) अपने ही घर में कलह का सामना कर रही है। एक तरफ पार्टी के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष तेजस्वी यादव इन दिनों यूरोप के दौरे पर हैं, तो दूसरी तरफ बिहार में पार्टी के भीतर उम्मीदवार चयन से लेकर संगठनात्मक फैसलों तक पर सवाल उठ रहे हैं। बांकीपुर के लिए पार्टी द्वारा उम्मीदवार घोषित किए जाने के बाद से ही विवादों का दौर शुरू हो गया है जो अब कई स्तरों तक फैल चुका है। ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि क्या तेजस्वी यादव की अनुपस्थिति का फायदा पार्टी के भीतर गुटबाजी करने वाले लोग उठा रहे हैं?
टिकट बंटवारे पर शुरू हुआ विवाद
बांकीपुर उपचुनाव के लिए आरजेडी ने रेखा गुप्ता को अपना उम्मीदवार बनाया है। इस फैसले के तुरंत बाद पार्टी में असंतोष की खबरें सामने आने लगीं। सबसे पहले सांसद सुरेंद्र यादव ने खुले मंच से यह बयान दिया कि वह रेखा गुप्ता को जानते तक नहीं हैं। यह बयान पार्टी की एकता पर सवालिया निशान लगाने के लिए काफी था। इसके बाद वरिष्ठ नेता भाई वीरेंद्र ने भी टिकट वितरण प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए, जिससे पार्टी नेतृत्व की असहजता बढ़ गई है। इसके अतिरिक्त तेज प्रताप यादव की पार्टी जनशक्ति जनता दल (जेजेडी) ने वीणा मानवी को मैदान में उतारकर आरजेडी की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। इस कदम से आरजेडी के परंपरागत वोट बैंक के बंटने की आशंका जताई जा रही है, जो चुनावी नतीजों पर सीधा असर डाल सकता है।
तेजस्वी की अनुपस्थिति और कार्यकर्ताओं में असंतोष
राजनीतिक गलियारों में इस बात की जोरदार चर्चा है कि जब बांकीपुर जैसी महत्वपूर्ण सीट पर उपचुनाव की तैयारी चल रही है, तब तेजस्वी यादव यूरोप के दौरे पर क्यों गए हैं? विरोधी दल तो इस पर सवाल उठा ही रहे हैं, लेकिन आरजेडी के अपने समर्थकों में भी इसे लेकर तरह-तरह की बातें हो रही हैं। यद्यपि आरजेडी नेताओं का कहना है कि पार्टी अपनी पूर्व निर्धारित रणनीति के अनुसार काम कर रही है, लेकिन लगातार सामने आ रहे विवादों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि संगठन में एकजुटता की कमी है।
रोहिणी आचार्य ने खोला मोर्चा
आरजेडी के भीतर की खींचतान केवल बांकीपुर सीट तक ही सीमित नहीं है। लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी आचार्य ने हाल ही में सारण के पार्टी प्रवक्ता हरेलाल यादव को पार्टी से निकाले जाने के फैसले का कड़ा विरोध किया है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए इस कार्रवाई को बेहद दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया और पार्टी के कुछ प्रभावशाली नेताओं पर निशाना साधा। रोहिणी आचार्य ने अपने संदेश में संजय यादव, सुनील सिंह और रमीज का स्पष्ट रूप से नाम लेते हुए आरोप लगाया कि ये लोग पार्टी को भीतर से कमजोर करने का काम कर रहे हैं। उन्होंने यह संकल्प दोहराया है कि वह पार्टी को ऐसे लोगों के प्रभाव से मुक्त कराने के लिए निरंतर आवाज उठाती रहेंगी। उन्होंने जोर देकर कहा कि वह लालू प्रसाद यादव की बेटी हैं और किसी भी गलत फैसले के सामने झुकने वाली नहीं हैं। रोहिणी का मानना है कि जमीनी और ईमानदार कार्यकर्ताओं को निशाना बनाना पार्टी के भविष्य के लिए कतई उचित नहीं है।
स्थापना दिवस पर दिखी गुटबाजी
आरजेडी के 30वें स्थापना दिवस समारोह के दौरान भी पार्टी की आंतरिक गुटबाजी सबके सामने आ गई। नालंदा के आईएमए हॉल में आयोजित इस कार्यक्रम में प्रदेश प्रवक्ता शक्ति सिंह यादव और पार्टी नेता अरुण कुमार उर्फ कल्लू मुखिया के बीच मंच पर ही तीखी बहस हो गई। इस हंगामे का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ, जिसने संगठन में चल रहे अंतर्विरोधों को जगजाहिर कर दिया। यह घटना दिखाती है कि पार्टी के भीतर विभिन्न धड़े एक-दूसरे के साथ तालमेल बिठाने में असमर्थ हैं।
बांकीपुर चुनाव की चुनावी गणित और चुनौतियां
बांकीपुर विधानसभा का उपचुनाव पहले से ही बेहद दिलचस्प मोड़ पर खड़ा है। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने अभिषेक सिन्हा बंटी को उम्मीदवार बनाकर मैदान में उतारा है। वहीं, जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर खुद इस चुनावी दौड़ में शामिल होकर मुकाबले को त्रिकोणीय बना रहे हैं। ऐसी स्थिति में विपक्षी वोटों के बिखरने की प्रबल संभावना है। यदि आरजेडी के अंदर असंतोष और सार्वजनिक बयानबाजी इसी तरह जारी रहती है, तो इसका सीधा असर चुनावी अभियान और कार्यकर्ताओं के मनोबल पर पड़ सकता है।
आगे की राह और संदेश
बांकीपुर उपचुनाव केवल एक विधानसभा सीट का चुनाव नहीं है, बल्कि इसे आने वाले समय में बिहार की राजनीतिक दिशा तय करने वाला संकेत माना जा रहा है। टिकट वितरण पर विवाद, वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी, रोहिणी आचार्य का खुला विरोध और स्थापना दिवस पर हुई बहस ने आरजेडी के शीर्ष नेतृत्व के लिए बड़ी चुनौती पेश कर दी है। अब सभी की निगाहें इस पर टिकी हैं कि लालू प्रसाद यादव और पार्टी नेतृत्व इन मतभेदों को कितनी जल्दी और किस तरह से सुलझा पाते हैं। किसी भी राजनीतिक दल के लिए संगठन की एकजुटता ही उसकी सबसे बड़ी ताकत होती है, और आरजेडी फिलहाल इसी परीक्षा से गुजर रही है।
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