कोसा साड़ियों की लोकप्रियता और नत्थूराम का योगदान
छत्तीसगढ़ की पहचान बन चुकी पारंपरिक कोसा साड़ियों का जलवा आज पूरे भारत में बिखरा हुआ है। अपनी बेमिसाल खूबसूरती, महीन बुनाई और कलात्मक कारीगरी के कारण ये साड़ियां देशभर के ग्राहकों की पहली पसंद बनी हुई हैं। इस कला को जीवंत बनाए रखने में राज्य के बालोद जिले के कुशल बुनकर नत्थूराम देवांगन का योगदान अतुलनीय है। उन्होंने अपने हुनर और अथक परिश्रम के दम पर छत्तीसगढ़ के इस पारंपरिक व्यवसाय को देश के महानगरों तक पहुंचाया है। 8वीं कक्षा तक शिक्षा प्राप्त करने वाले नत्थूराम पिछले 35 वर्षों से कोसा बुनाई के क्षेत्र में सक्रिय हैं और आज उनकी बनाई साड़ियों की मांग दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, इंदौर, भोपाल, जबलपुर और पूरे महाराष्ट्र जैसे राज्यों में बनी रहती है।
खुद करते हैं मैन्युफैक्चरिंग और डिजाइन
नत्थूराम देवांगन ने बताया कि वे केवल साड़ियों की बुनाई तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे पूरी मैन्युफैक्चरिंग प्रक्रिया का प्रबंधन स्वयं करते हैं। उनकी अपनी कार्यशाला में कोसा साड़ियों की विस्तृत श्रृंखला तैयार की जाती है, जिसमें बूटी साड़ी, जाला साड़ी, प्रिंट साड़ी और बेहद खास काथा वर्क जैसी आकर्षक डिजाइनों का समावेश होता है। नत्थूराम की उत्कृष्ट कला के लिए उन्हें राज्य सरकार की ओर से प्रतिष्ठित ‘स्वर्गीय श्री बिसाहूदास महंत सर्वश्रेष्ठ बुनकर पुरस्कार’ से भी सम्मानित किया जा चुका है, जो उनकी मेहनत का एक बड़ा प्रमाण है।
पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही परंपरा
यह व्यवसाय नत्थूराम के लिए केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि उनके परिवार की एक विरासत है। उन्होंने साझा किया कि उनका पूरा परिवार इस काम में गहराई से जुड़ा हुआ है। घर के 15 साल के बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक, सभी अपनी भूमिका निभाते हैं। इसमें धागा तैयार करने से लेकर रंगाई, जटिल डिजाइन बनाने और अंतिम बुनाई तक के काम शामिल हैं। यह पारंपरिक हुनर उन्हें अपने दादा और पिता से प्राप्त हुआ है और अब उनके परिवार की अगली पीढ़ी भी इस गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ा रही है, जिससे इस प्राचीन कला का संरक्षण सुनिश्चित हो रहा है।
अनुभव और बाजार की मांग
नत्थूराम ने मात्र 23 वर्ष की आयु में कोसा बुनाई का काम शुरू किया था और आज उन्हें इस क्षेत्र का गहरा अनुभव है। उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ की तुलना में अन्य राज्यों में कोसा साड़ियों की मांग कहीं अधिक देखी जाती है। महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश उनके उत्पादों के लिए सबसे बड़े बाजार के रूप में उभरे हैं। वहीं, छत्तीसगढ़ के भीतर रायपुर और भिलाई प्रमुख केंद्र हैं। वे सरकारी प्रदर्शनियों और हस्तशिल्प मेलों में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं ताकि अपने हुनर का प्रदर्शन कर सकें और अधिक से अधिक ग्राहकों तक पहुंच सकें।
कीमत और ऑनलाइन पहुंच
कोसा साड़ियों की रेंज और कीमतों के बारे में जानकारी देते हुए नत्थूराम ने बताया कि उनकी साड़ियों की शुरुआती कीमत लगभग 5000 रुपये से होती है। प्रदर्शनियों के दौरान उन्हें बेहद अच्छा प्रतिसाद मिलता है और वे दिल्ली व मुंबई जैसे शहरों में 8 से 10 लाख रुपये तक की कोसा साड़ियों की बिक्री कर चुके हैं। बदलते समय के साथ उन्होंने डिजिटल दुनिया का भी रुख किया है। अब ग्राहक घर बैठे उनकी साड़ियों को ऑनलाइन खरीद सकते हैं। इच्छुक लोग उनके मोबाइल नंबर 9926130939 पर व्हाट्सएप के जरिए संपर्क कर सकते हैं, जहां उन्हें विभिन्न डिजाइनों की साड़ियों की तस्वीरें दिखाकर पसंद करने की सुविधा दी जाती है। नत्थूराम का दृढ़ विश्वास है कि यदि पारंपरिक हस्तशिल्प को आधुनिक बाजार और डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ दिया जाए, तो छत्तीसगढ़ के बुनकरों के लिए अवसरों के नए द्वार खुलेंगे और उन्हें वैश्विक मंच पर पहचान मिलेगी।
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