चीन की 'मोतियों की माला' का नया जवाब
एक समय था जब हिंद महासागर में चीन की निरंतर बढ़ती उपस्थिति को देखकर पूरी दुनिया के रणनीतिक विश्लेषक एक खास शब्द का इस्तेमाल करते थे, वह था स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स यानी मोतियों की माला। इस रणनीति के तहत चीन ने पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह, श्रीलंका के हम्बनटोटा, म्यांमार के क्याउकप्यू और हिंद महासागर के कई अन्य अहम ठिकानों पर भारी निवेश करके अपनी पहुंच को विस्तार दिया था। चीन का यह कदम केवल व्यापार बढ़ाने तक सीमित नहीं था, बल्कि भविष्य में अपनी नौसैनिक ताकत और समुद्री दबदबे को मजबूत करने की एक सोची-समझी कोशिश थी।
हालांकि अब स्थितियां बदल रही हैं। भारत चीन की तरह किसी देश में बंदरगाहों का जाल नहीं बिछा रहा है, बल्कि वह अपने सबसे भरोसेमंद और शक्तिशाली हथियार ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल को मित्र देशों तक पहुंचाकर एक नई रणनीतिक व्यवस्था को जन्म दे रहा है। इसे आधिकारिक तौर पर भले ही कोई नाम नहीं दिया गया हो, लेकिन विश्लेषक इसे चीन के गले में भारत की ब्रह्मोस स्ट्रिंग्स के तौर पर देख रहे हैं। यह कोई औपचारिक सैन्य गठबंधन नहीं है, और न ही भारत किसी विदेशी भूमि पर अपना सैन्य अड्डा बना रहा है। इसके बजाय, भारत दक्षिण चीन सागर में चीन के आक्रामक रवैये का सामना कर रहे देशों की समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने में मदद कर रहा है। यदि फिलीपींस, वियतनाम और भविष्य में इंडोनेशिया जैसे देश ब्रह्मोस मिसाइलों से लैस हो जाते हैं, तो चीन के लिए दक्षिण चीन सागर में अपनी नौसैनिक गतिविधियों को पहले की तरह बिना किसी बाधा के जारी रखना बहुत कठिन हो जाएगा।
भारत की डिस्ट्रीब्यूटेड डिटरेंस रणनीति
भारत की यह नई रणनीति अत्यंत सरल होने के साथ-साथ बेहद प्रभावी भी है। किसी भी क्षेत्र में अपनी सेना उतारने या सैन्य अड्डा स्थापित करने के बजाय, भारत वहां के मित्र राष्ट्रों को ऐसी अत्याधुनिक मिसाइल प्रणाली उपलब्ध करा रहा है, जो दुश्मन के युद्धपोतों को सैकड़ों किलोमीटर की दूरी से ही निशाना बनाने में सक्षम है। इस रणनीति का सबसे बड़ा लाभ यह है कि भारत को सीधे किसी सैन्य संघर्ष का हिस्सा बने बिना अपने सामरिक साझेदारों की रक्षा क्षमताओं को बढ़ाने का मौका मिलता है।
जिन देशों को ब्रह्मोस मिसाइलें प्राप्त हो रही हैं, वे अब अपनी समुद्री सीमाओं की सुरक्षा कहीं अधिक कुशलता से कर सकेंगे। इसी वजह से रक्षा विशेषज्ञ इसे भारत की डिस्ट्रीब्यूटेड डिटरेंस यानी वितरित प्रतिरोध नीति मान रहे हैं। इसका अर्थ है कि एक केंद्रित सैन्य ताकत के स्थान पर कई देशों में फैली हुई छोटी लेकिन बेहद घातक रक्षा क्षमता का निर्माण करना, जो किसी भी आक्रामक देश के लिए सिरदर्द बन सकती है।
पहली कड़ी: फिलीपींस
भारत की इस रणनीति की शुरुआत फिलीपींस के साथ हुई। जनवरी 2022 में फिलीपींस ने भारत के साथ लगभग 375 मिलियन डॉलर यानी करीब 3,558.8 करोड़ रुपये का एक महत्वपूर्ण ब्रह्मोस सौदा किया था। यह भारत के रक्षा निर्यात के इतिहास में मिसाइलों का पहला इतना बड़ा समझौता था। इस सौदे के अंतर्गत फिलीपींस को अपनी तटीय रक्षा को मजबूत करने के लिए ब्रह्मोस मिसाइल बैटरियां प्रदान की जा रही हैं।
फिलीपींस लंबे समय से दक्षिण चीन सागर में चीन के साथ चल रहे समुद्री विवादों से जूझ रहा है। स्कारबोरो शोल और वेस्ट फिलीपीन सी जैसे क्षेत्रों में चीनी कोस्ट गार्ड और नौसेना की गतिविधियों के कारण दोनों देशों के बीच तनाव बना रहता है। ब्रह्मोस की तैनाती के बाद फिलीपींस के पास पहली बार ऐसी मारक क्षमता आई है, जिससे वह दुश्मन के किसी भी युद्धपोत को अपने तटों के करीब पहुंचने से पहले ही निशाना बना सकता है। इसका सीधा मतलब यह नहीं है कि युद्ध शुरू हो जाएगा, बल्कि इसका उद्देश्य यह है कि कोई भी आक्रामक शक्ति हमला करने से पहले सौ बार सोचे।
दूसरी कड़ी: वियतनाम
यदि दक्षिण चीन सागर में चीन का सबसे मुखर और संघर्षरत विरोधी कोई है, तो वह वियतनाम है। पारासेल और स्प्रैटली द्वीपों के स्वामित्व को लेकर चीन और वियतनाम के बीच दशकों से विवाद चला आ रहा है। कई बार ऐसी स्थितियां बनी हैं जब दोनों देशों के जहाज एक-दूसरे के सामने आ गए हैं। भारत और वियतनाम के बीच रक्षा सहयोग पिछले कुछ वर्षों में काफी तेजी से बढ़ा है।
दोनों देशों के बीच ब्रह्मोस मिसाइल की खरीद को लेकर बातचीत काफी उन्नत चरण में पहुंच चुकी है। विभिन्न रिपोर्ट्स का दावा है कि दोनों पक्ष इस दिशा में काफी प्रगति कर चुके हैं, हालांकि अंतिम अनुबंध की शर्तों के बारे में सार्वजनिक रूप से सीमित विवरण उपलब्ध है। यदि वियतनाम के पास ब्रह्मोस मिसाइलें आती हैं, तो चीन के लिए अपने दक्षिणी समुद्री मोर्चे पर चुनौती और विकट हो जाएगी। वियतनाम की लंबी समुद्री तटरेखा उसे दक्षिण चीन सागर में चीन की हर हरकत पर बारीक नज़र रखने की क्षमता देती है।
तीसरी कड़ी: इंडोनेशिया
भारत की 'स्ट्रिंग्स ऑफ ब्रह्मोस' रणनीति में अब सबसे महत्वपूर्ण कड़ी इंडोनेशिया बनकर उभरा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया इंडोनेशिया यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल और अस्त्र मिसाइल के लिए अहम समझौते किए गए। इसके साथ ही इंडोनेशिया फिलीपींस के बाद ब्रह्मोस खरीदने वाला दूसरा आसियान देश बन गया है। यह सौदा महज हथियारों का लेनदेन नहीं है, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत और इंडोनेशिया के बीच बढ़ती रणनीतिक साझेदारी का एक स्पष्ट संकेत है।
इंडोनेशिया भले ही दक्षिण चीन सागर विवाद का केंद्र न हो, लेकिन उसके नातुना द्वीप (Natuna Islands) के आसपास चीन की नाइन-डैश लाइन को लेकर अक्सर तनाव पैदा होता रहता है। चीन के मछली पकड़ने वाले जहाजों और कोस्ट गार्ड की दखलअंदाजी को लेकर जकार्ता समय-समय पर अपनी कड़ी आपत्ति जताता रहा है। ब्रह्मोस मिसाइल इंडोनेशिया की तटीय सुरक्षा को एक नई मजबूती देगी। रणनीतिक दृष्टि से इंडोनेशिया का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि वह दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों जैसे मलक्का जलडमरूमध्य, सुंडा जलडमरूमध्य और लोम्बोक जलडमरूमध्य के बेहद करीब स्थित है। चीन का अधिकांश ऊर्जा आयात और वैश्विक व्यापार इन्हीं रास्तों से गुजरता है। यदि भविष्य में इंडोनेशिया अपने संवेदनशील तटीय इलाकों में ब्रह्मोस बैटरियां तैनात करता है, तो चीन की नौसैनिक गतिविधियों पर भारी दबाव बनाया जा सकेगा।
ब्रह्मोस की मारक क्षमता
ब्रह्मोस को दुनिया की सबसे तेज़ ऑपरेशनल सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइलों में गिना जाता है। इसकी कुछ प्रमुख विशेषताएं इसे अद्वितीय बनाती हैं:
- लगभग मैक 2.8 से 3 तक की सुपरसोनिक गति।
- समुद्र की सतह के बेहद करीब उड़ान भरने की क्षमता (सी स्किमिंग)।
- अत्यधिक सटीक निशाना साधने की क्षमता।
- लॉन्च के बाद स्वचालित मार्गदर्शन (फायर एंड फॉरगेट)।
- युद्धपोतों और जमीनी लक्ष्यों दोनों को नष्ट करने की योग्यता।
इसकी निर्यात संस्करण की घोषित मारक क्षमता लगभग 290 किलोमीटर है, हालांकि भारत अपने स्वदेशी उपयोग के लिए इससे भी अधिक दूरी वाले उन्नत संस्करण विकसित कर चुका है। इसकी सुपरसोनिक गति के कारण दुश्मन के जहाजों को प्रतिक्रिया देने के लिए बहुत कम समय मिलता है, जो इसकी सबसे बड़ी ताकत है।
क्या चीन पूरी तरह घिर जाएगा?
यह कहना जल्दबाजी होगी कि केवल तीन देशों के पास ब्रह्मोस आ जाने से चीन पूरी तरह घिर जाएगा। चीन की नौसेना आज विश्व की सबसे बड़ी नौसेनाओं में गिनी जाती है, जिसके पास आधुनिक विमानवाहक पोत, विध्वंसक जहाज, पनडुब्बियां और लंबी दूरी की मिसाइलें मौजूद हैं। लेकिन ब्रह्मोस चीन की सैन्य रणनीति को जटिल जरूर बना देती है। पहले यदि चीन को किसी एक क्षेत्र में एक ही दिशा से खतरा महसूस होता था, तो अब अलग-अलग देशों के तटों से एंटी-शिप मिसाइलों का जोखिम बढ़ गया है। इसका मतलब है कि चीनी नौसेना को अब हर अभियान के लिए अधिक एयर डिफेंस, बेहतर इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और अधिक सतर्क संचालन पद्धति अपनानी होगी। ब्रह्मोस का उद्देश्य चीन को हराना नहीं, बल्कि उसकी कार्रवाई की लागत और जोखिम को बढ़ाना है। यही एक सफल प्रतिरोध रणनीति की पहचान होती है।
भारत के लिए इस रणनीति के फायदे
इस पूरी रणनीति का फायदा केवल रक्षा निर्यात तक ही सीमित नहीं है। सबसे पहला लाभ यह है कि भारत एक भरोसेमंद और प्रमुख रक्षा साझेदार के रूप में वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना रहा है। लंबे समय तक भारत को दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक माना जाता था, लेकिन अब वही भारत मिसाइल निर्यातक बन चुका है। दूसरा, इससे भारत के घरेलू रक्षा उद्योग को एक बड़ा बाजार मिल रहा है, जिसका मतलब है कि अधिक उत्पादन, उन्नत तकनीक और रोजगार के नए अवसर पैदा हो रहे हैं। तीसरा, भारत इंडोनेशिया जैसे देशों के साथ निकेल और अन्य क्रिटिकल मिनरल्स के क्षेत्र में भी सहयोग बढ़ा रहा है। निकेल इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरियों और आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए अनिवार्य है। चीन इस क्षेत्र में लंबे समय से हावी रहा है, इसलिए भारत एक वैकल्पिक आपूर्ति श्रृंखला विकसित करने की कोशिश में है। रक्षा सहयोग और खनिज साझेदारी दोनों मिलकर भारत की सामरिक स्थिति को मजबूत कर रहे हैं।
निष्कर्ष
क्या यह चीन की स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स का जवाब है? पूरी तरह नहीं, लेकिन काफी हद तक हां। चीन की रणनीति बंदरगाहों और रसद सुविधाओं पर आधारित थी। भारत की रणनीति अलग है; भारत किसी देश में अड्डा नहीं बना रहा, बल्कि अपने साझेदार देशों को ऐसी क्षमता दे रहा है जिससे वे खुद अपनी सुरक्षा करने में सक्षम हो सकें। जहाँ चीन ने इंफ्रास्ट्रक्चर बनाया, वहीं भारत प्रतिरोध यानी डिटरेंस बना रहा है। यह दक्षिण चीन सागर में बदलती भू-राजनीति का एक हिस्सा है। ब्रह्मोस स्ट्रिंग्स एक ऐसी व्यवस्था तैयार कर रही है जो चीन की नौसैनिक रणनीति के लिए पहले से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण साबित होगी। बिना किसी सैन्य गठबंधन का हिस्सा बने और बिना सैनिक तैनात किए, केवल अपनी तकनीक और साझेदारियों के दम पर भारत इंडो-पैसिफिक में एक निर्णायक खिलाड़ी के रूप में उभर रहा है।
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