भरतपुर के ग्रामीण अंचलों में जैसे ही जून और जुलाई का महीना आता है, खेतों में एक विशेष तरह की सक्रियता दिखाई देने लगती है। इस दौरान किसान बड़े पैमाने पर अपने खेतों में गोबर की जैविक खाद डालने का काम शुरू कर देते हैं। खेती की यह पारंपरिक पद्धति आज के दौर में भी उतनी ही असरदार मानी जाती है, जितनी पहले थी। एक ओर जहां रासायनिक खादों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है, वहीं भरतपुर के कई प्रगतिशील किसान आज भी गोबर की खाद को सबसे ऊपर रखते हैं।
जून-जुलाई क्यों है सबसे उपयुक्त समय
गर्मियों में खाली पड़े खेतों के लिए जून और जुलाई का समय गोबर की खाद डालने के लिहाज से सबसे अनुकूल माना जाता है। इस अवधि में खेतों की गहरी जुताई करते हुए खाद मिलाने से वह मिट्टी में भली-भांति घुल-मिल जाती है। यह प्रक्रिया मिट्टी की भौतिक और रासायनिक गुणवत्ता दोनों को सुधारती है। जैविक खाद मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में सबसे अहम भूमिका निभाती है, जिससे आने वाली फसलों की बढ़वार तेज होती है और पौधे मजबूत बनते हैं।
नमी बनाए रखने में कारगर
गोबर की खाद का सबसे बड़ा लाभ यह है कि वह मिट्टी की नमी को लंबे समय तक संजोए रखती है। स्थानीय किसान तोहीराम सैनी का कहना है कि गर्मी के बाद आने वाले मानसून में यह खाद पानी को अच्छी तरह सोख लेती है और फिर धीरे-धीरे पौधों की जड़ों तक पोषण पहुंचाती है। इससे फसलों को लगातार जरूरी पोषक तत्व मिलते रहते हैं और वे सूखे के असर से सुरक्षित रहती हैं।
उनके अनुसार, इस खाद में मौजूद नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश जैसे प्राकृतिक तत्व पौधों के सर्वांगीण विकास के लिए बेहद आवश्यक होते हैं। समय रहते गोबर की खाद डालने से फसलें अधिक हरी-भरी, स्वस्थ और रोगमुक्त बनी रहती हैं।
कम लागत में बंपर पैदावार
सही समय पर जैविक खाद के उपयोग से फसलों की पैदावार में साफ बढ़ोतरी देखने को मिलती है। कई अनुभवी किसानों का मानना है कि जैविक खाद के प्रयोग से मिट्टी लंबे समय तक उपजाऊ बनी रहती है। इससे रासायनिक खादों पर होने वाला भारी खर्च बच जाता है और खेती की कुल लागत भी काफी घट जाती है।
पर्यावरण के लिए सुरक्षित विकल्प
पर्यावरण की दृष्टि से भी गोबर की खाद को सबसे सुरक्षित और लाभकारी माना जाता है। यह पूरी तरह प्राकृतिक होती है और मिट्टी या भूमिगत जल को किसी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचाती।
सरकार और कृषि विभाग का प्रोत्साहन
यही कारण है कि अब सरकार और कृषि विभाग भी किसानों को रासायनिक खेती छोड़कर जैविक खेती अपनाने के लिए निरंतर प्रोत्साहित कर रहे हैं। भरतपुर के किसान अपने पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक वैज्ञानिक समझ का बेहतरीन तालमेल बनाते हुए गोबर की खाद का उपयोग कर रहे हैं। यह न सिर्फ उनकी फसलों के लिए फायदेमंद साबित हो रहा है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ खेती की दिशा में भी एक मजबूत कदम है।
किसानों को सलाह दी जाती है कि वे केवल अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद का ही इस्तेमाल करें।
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