हरियाणा में धान की बुवाई का सीजन शुरू होते ही किसानों के सामने एक नया और बड़ा संकट खड़ा हो गया है। फरीदाबाद के ग्रामीण इलाकों में इन दिनों खेतों में धान लगाने की तैयारी चल रही है, लेकिन किसानों के लिए इस समय सबसे बड़ी चुनौती बारिश या पानी की व्यवस्था नहीं, बल्कि फसलों के लिए सबसे जरूरी DAP खाद की भारी किल्लत बन चुकी है। हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि किसानों को सुबह तड़के 5 बजे से ही खाद वितरण केंद्रों के बाहर लंबी-लंबी लाइनों में लगना पड़ रहा है। तपती धूप और उमस के बीच घंटों इंतजार करने के बाद भी बड़ी संख्या में किसानों को शाम को खाली हाथ ही वापस लौटना पड़ रहा है।
किसानों का आरोप है कि उन्हें खाद वितरण केंद्रों पर न केवल परेशान किया जा रहा है, बल्कि सरकारी नियमों की धज्जियां उड़ाकर उनसे अवैध वसूली भी की जा रही है। किसानों का कहना है कि उन्हें निर्धारित सरकारी दर पर खाद उपलब्ध नहीं कराई जा रही है। इसके बजाय, उन पर जबरन सरसों का तेल, नैनो यूरिया और अन्य गैर-जरूरी कृषि उत्पाद खरीदने का भारी दबाव बनाया जा रहा है। किसानों के अनुसार, यदि वे इन अतिरिक्त सामानों को खरीदने से मना करते हैं, तो उन्हें DAP खाद देने से साफ इनकार कर दिया जाता है।
सरकारी रेट से बहुत ज्यादा कीमतों पर मिल रहा खाद
धान की खेती में समय पर खाद का छिड़काव बेहद जरूरी होता है। यदि सही समय पर फसलों को पर्याप्त पोषण नहीं मिला, तो पूरी फसल बर्बाद हो सकती है। किसानों ने बताया कि धान की खेती में प्रति एकड़ कम से कम दो बैग DAP की जरूरत होती है। सरकार द्वारा एक बैग DAP की कीमत 1355 रुपये निर्धारित की गई है। लेकिन खाद की इस कृत्रिम किल्लत का फायदा उठाकर कालाबाज़ारी करने वाले इसी खाद को ब्लैक मार्केट में 1800 रुपये तक में बेच रहे हैं।
इसके अलावा, जो किसान केंद्रों पर सीधे पहुंच रहे हैं, उन्हें जबरदस्ती एक लीटर सरसों का तेल और नैनो यूरिया का पैकेट थमाया जा रहा है। किसानों का कहना है कि उनकी जेब पर इस तरह से अतिरिक्त और गैर-जरूरी आर्थिक बोझ डाला जा रहा है, जिससे खेती की कुल लागत लगातार बढ़ती जा रही है।
प्रवासी किसानों की जुबानी: "अब खेती करना घाटे का सौदा"
बिहार के रहने वाले किसान महादेव ऋषि ने अपनी व्यथा साझा करते हुए बताया कि वे बेहतर आजीविका और खेती में अच्छे मुनाफे की उम्मीद में करीब 25 से 30 साल पहले बिहार छोड़कर फरीदाबाद आए थे। लेकिन अब यहां भी उनके लिए खेती करना बेहद मुश्किल होता जा रहा है। महादेव कहते हैं, "सबसे बड़ी मुसीबत खाद की कमी ने खड़ी कर दी है। हम सुबह 5 बजे ही आकर लाइन में लग जाते हैं और शाम को 5 बजे तक इंतजार करते हैं। इसके बावजूद हमें DAP खाद नहीं दी जाती। कभी कहा जाता है कि रजिस्ट्रेशन का पुराना कागज लाओ, तो कभी कोई और बहाना बनाकर हमें टाल दिया जाता है।"
महादेव ऋषि ने आगे बताया कि उन्होंने इस बार धान की 1509 वैरायटी की बुवाई की है। एक एकड़ धान की खेती को तैयार करने में लगभग 40 हजार रुपये का भारी-भरकम खर्च आता है। अगर समय पर खाद नहीं मिली, तो यह पूरी लागत और मेहनत मिट्टी में मिल जाएगी।
महिला किसान का दर्द: "खाद मांगने पर थमाई जा रही अनुपयोगी चीजें"
खेती के इस संकट से महिला किसान भी अछूती नहीं हैं। 62 साल की महिला किसान राजेश ने बताया कि वे अपनी जिंदगी के कई दशक खेती-किसानी को दे चुकी हैं, लेकिन खाद के लिए इस तरह की मारामारी उन्होंने पहले कभी नहीं देखी। इस साल उन्होंने धान की 1692 वैरायटी की फसल लगाई है।
राजेश का आरोप है कि जब भी वे खाद लेने केंद्र पर जाती हैं, तो अधिकारी और कर्मचारी उन्हें परेशान करते हैं। वे कहती हैं, "खाद लेने के लिए हमसे रजिस्ट्रेशन के पुराने कागजात मांगे जाते हैं। घंटों धूप में बैठाकर रखने के बाद अंत में कह दिया जाता है कि अभी आपका नंबर नहीं आया है। हमें इस समय सिर्फ DAP खाद की सबसे ज्यादा जरूरत है, लेकिन इसके बदले हमें जबरन 1950 रुपये की MP खाद और सरसों का तेल खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है। जो चीजें हमारे काम की नहीं हैं, उन्हें हमें जबरदस्ती थमाकर पैसे वसूल किए जा रहे हैं। अगर समय रहते खाद नहीं मिली, तो हमारी फसल पूरी तरह खराब हो जाएगी।"
यूपी से आए विकास की उम्मीदों पर फिरा पानी
मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले एक अन्य किसान विकास ने बताया कि वे उत्तर प्रदेश से फरीदाबाद इसी उम्मीद के साथ आए थे कि यहां की जमीन और व्यवस्थाएं खेती के अनुकूल होंगी। हालांकि, शुरुआत में सब ठीक रहा, लेकिन खाद की इस साल-दर-साल गहराती समस्या ने उनके सपनों को तोड़ दिया है।
विकास ने अपना गुस्सा जाहिर करते हुए कहा, "खाद केंद्रों पर 12-12 घंटे तक लाइन में खड़े रहने के बाद भी किसानों को बैरंग लौटना पड़ रहा है। धान की खेती में शुरुआती दौर में DAP सबसे महत्वपूर्ण तत्व होता है। इसके बिना पौधों की जड़ों का सही विकास नहीं हो पाता और अंततः इसका सीधा असर फसल की पैदावार पर पड़ता है। अलग-अलग वैरायटी के अनुसार खेती की लागत बदलती रहती है, लेकिन औसतन एक एकड़ धान उगाने में लगभग 25 हजार रुपये तक का खर्च आता है। इतनी बड़ी पूंजी लगाने के बाद भी हमें खाद के लिए भीख मांगनी पड़ रही है।"
हर साल का बन चुका है यह संकट
फरीदाबाद के किसानों का कहना है कि खाद की कमी और वितरण में अनियमितता कोई नई बात नहीं है। हर साल गेहूं की बुवाई के समय भी किसानों को DAP और यूरिया के लिए इसी तरह लंबी-लंबी लाइनों में रात-दिन काटना पड़ता है। प्रशासन हर बार स्थिति सुधारने के दावे तो करता है, लेकिन जमीन पर हालात जस के तस बने हुए हैं। धान और गेहूं दोनों ही मुख्य फसलों के सीजन में किसानों को इसी मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना से गुजरना पड़ता है।
क्षेत्र के किसानों ने जिला प्रशासन और कृषि विभाग से पुरजोर मांग की है कि:
- जिले में DAP और अन्य जरूरी खादों की पर्याप्त उपलब्धता तुरंत सुनिश्चित की जाए।
- खाद की बिक्री केवल निर्धारित सरकारी दरों पर ही सुनिश्चित की जाए और कालाबाज़ारी करने वालों पर नकेल कसी जाए।
- खाद के साथ जबरन सरसों का तेल, नैनो यूरिया या अन्य अनचाहे उत्पाद बेचने वाले दुकानदारों और अधिकारियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए।
यदि समय रहते इन समस्याओं का समाधान नहीं किया गया, तो फरीदाबाद के हजारों किसानों की मेहनत, लागत और धान की खड़ी फसल पूरी तरह से बर्बाद हो जाएगी, जिससे क्षेत्र के कृषि संकट को और बढ़ावा मिलेगा।
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