कबाड़ में छिपी संभावनाओं को पहचाना
खंडवा के रहने वाले पप्पू तंतवर ने अपने हुनर के दम पर यह साबित कर दिखाया है कि दुनिया में कोई भी चीज बेकार नहीं होती, बस उसे देखने का नजरिया अलग होना चाहिए। अक्सर हम घरों में पड़ी पुरानी प्लास्टिक की बोतलें, टूटे-फूटे सामान या नारियल के छिलकों को कूड़ा समझकर बाहर फेंक देते हैं। लेकिन पप्पू के लिए यही चीजें किसी खजाने से कम नहीं हैं। उन्हें बचपन से ही पुरानी और अनुपयोगी वस्तुओं से कुछ नया और रचनात्मक बनाने का गहरा शौक रहा है। बीकॉम की पढ़ाई पूरी करने के बाद जब करियर चुनने की बारी आई, तो उन्होंने पारंपरिक नौकरी की जगह अपने इस हुनर को चुना और आज वे इसी के जरिए एक नई पहचान बनाने में सफल रहे हैं।
वेस्ट मटेरियल को दी नई जिंदगी
पप्पू तंतवर की कलाकारी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे किसी भी साधारण सी दिखने वाली वस्तु में जान फूँक देते हैं। उनके कुशल हाथों का जादू ऐसा है कि साधारण प्लास्टिक की बोतलें बेहद खूबसूरत झूमर में बदल जाती हैं। वे नारियल के बेकार छिलकों का इस्तेमाल करके ब्रश और घर की सजावट का सामान तैयार करते हैं। उनकी कलात्मक सोच का नमूना तब देखने को मिलता है जब वे साधारण पत्थरों को तराशकर उन्हें एक आकर्षक मंदिर का स्वरूप दे देते हैं। उन्होंने वैष्णो देवी धाम से लाए गए पत्थरों से अपने घर में एक छोटा सा मंदिर बनाया है, जो उनकी आस्था और शिल्पकारी का बेहतरीन संगम है।
लागत मात्र 200 रुपये, मुनाफा रचनात्मकता का
उनकी रचनात्मकता का एक और बड़ा उदाहरण लकड़ी और अन्य वेस्ट मटेरियल से तैयार किया गया उनका छोटा सा जहाज है। इस जहाज को बनाने में उनकी कुल लागत महज 200 रुपये ही आई थी। यदि इसी तरह का कोई सजावटी सामान बाजार से खरीदा जाए, तो उसके लिए लोगों को हजारों रुपये खर्च करने पड़ते हैं। पप्पू का यह प्रयास न केवल पैसे की बचत करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि मेहनत और कल्पना शक्ति से कम बजट में भी बेहतरीन चीजें बनाई जा सकती हैं।
पर्यावरण संरक्षण और भविष्य की प्रेरणा
पप्पू की सोच सिर्फ सुंदर वस्तुएं बनाने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि वे पर्यावरण संरक्षण को लेकर भी बेहद जागरूक हैं। उन्होंने प्लास्टिक की बेकार बोतलों का उपयोग करके पक्षियों के लिए पानी पीने के छोटे-छोटे बर्तन बनाए हैं। इससे न केवल कचरा कम होता है, बल्कि बेजुबान परिंदों को भी मदद मिलती है। इसके अलावा, वे पुराने अखबारों की लुगदी से क्ले तैयार करते हैं, जिससे वे तरह-तरह की कलाकृतियां बनाते हैं। कपड़े के टुकड़े और माचिस की तीलियां जैसी छोटी चीजों को भी वे अपनी कला में इस्तेमाल करना बखूबी जानते हैं।
नई पीढ़ी में संस्कारों का संचार
सबसे सुखद पहलू यह है कि पप्पू का यह रचनात्मक हुनर अब उनकी अगली पीढ़ी तक भी पहुंच रहा है। उनकी बेटी भी उन्हें देखकर वेस्ट मटेरियल से नई-नई चीजें बनाना सीख रही है। पप्पू का मानना है कि बच्चों को हमेशा कुछ न कुछ नया और रचनात्मक करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। यदि बच्चे पुरानी चीजों से प्रयोग करते हैं, तो उन्हें रोकना नहीं चाहिए क्योंकि यही छोटी कोशिशें आगे चलकर किसी बड़े हुनर का रूप ले लेती हैं। आज पप्पू तंतवर की यह कहानी न केवल खंडवा बल्कि उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है जो अपने सपनों को एक नई और अलग पहचान देना चाहते हैं।
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