बिहार के शिवहर जिले में रहने वाले आलोक कुमार सिंह की जीवन यात्रा आज देश के उन तमाम लोगों के लिए एक बड़ी मिसाल बन चुकी है, जो संकट के समय हार मान लेते हैं या गलत रास्तों का चुनाव कर लेते हैं। करीब दो दशक पहले जब आलोक एक बेहद कठिन परिस्थिति में फंसे थे, तब उन्होंने भ्रष्टाचार के सामने घुटने टेकने के बजाय ईमानदारी और आत्मनिर्भरता का ऐसा रास्ता चुना, जिसने न केवल उनका आत्मसम्मान बचाया बल्कि उनके पूरे जीवन की दिशा ही बदल दी।
भ्रष्टाचार के सामने नहीं झुके, आत्मसम्मान की चुनी राह
यह कहानी वर्ष 2006 की है, जब आलोक कुमार सिंह को एक झूठे मुकदमे में घसीट लिया गया था। उस समय उनकी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी और ऐसे में कानूनी पचड़े में फंसना उनके और उनके परिवार के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं था। मामले से नाम हटाने और मामले को रफा-दफा करने के एवज में उनसे कथित तौर पर 30,000 रुपये की रिश्वत मांगी गई थी। एक आम इंसान ऐसी स्थिति में घबराकर पैसे दे देता है, लेकिन आलोक के मन में कुछ और ही चल रहा था।
अपनी आर्थिक तंगी और मानसिक तनाव के बीच आलोक ने अपने परिवार के बुजुर्गों और अभिभावकों से सलाह ली। उनके एक शुभचिंतक ने उन्हें बेहद व्यावहारिक और क्रांतिकारी सलाह दी। उन्होंने कहा कि पुलिस या दलालों को रिश्वत के रूप में 30,000 रुपये देने से अच्छा है कि इस पैसे से एक अच्छी नस्ल की गाय खरीद ली जाए। गाय से जो दूध मिलेगा, उसे बेचकर जो कमाई होगी, उससे मुकदमे की कानूनी लड़ाई लड़ी जाए। यह सलाह आलोक के दिल को छू गई और उन्होंने तुरंत इस पर अमल करने का फैसला किया।
एक गाय के दूध से चुकाई वकील की फीस और जीता मुकदमा
अपने अभिभावक की इस सलाह को जीवन का मंत्र मानकर आलोक कुमार सिंह ने मारर की प्रसिद्ध दुग्ध समिति का रुख किया। वहां कार्यरत लैब अटेंडेंट लक्ष्मण सिंह के माध्यम से उन्होंने 30,000 रुपये में एक उन्नत HF नस्ल की गाय खरीदी। उस समय आलोक के पास संसाधनों की भारी कमी थी, लेकिन उनके इरादे मजबूत थे।
उन्होंने इस गाय की पूरी लगन से सेवा की और उससे मिलने वाले दूध को बेचना शुरू किया। दूध की बिक्री से हर रोज जो आमदनी होती थी, उसे वे बहुत सहेज कर रखते थे। इसी पैसे से उन्होंने अपने वकील की फीस और कोर्ट-कचहरी के अन्य खर्चों का भुगतान करना शुरू किया। यह कानूनी लड़ाई कोई एक-दो दिन की नहीं थी, बल्कि लगभग दो वर्षों तक लगातार चली। इस पूरे संघर्ष के दौरान आलोक ने कभी हिम्मत नहीं हारी। अंततः सत्य की जीत हुई, न्यायालय ने उन्हें बेकसूर पाया और वे इस झूठे मुकदमे से पूरी तरह बरी हो गए।
आलोक आज भी उस दौर को याद करते हुए कहते हैं कि अगर उन्होंने उस समय घूस देने का आसान रास्ता चुना होता, तो शायद वे आज भी उसी दलदल में फंसे होते। उस एक सही फैसले ने उन्हें न केवल सम्मानजनक न्याय दिलाया, बल्कि उनके लिए स्वरोजगार का एक स्थायी जरिया भी खोल दिया।
एक गाय से शुरू हुआ सफर अब बन गया है बड़ा व्यवसाय
मुकदमा जीतने के बाद भी आलोक ने अपने इस नए व्यवसाय को बंद नहीं किया, बल्कि इसे और आगे बढ़ाने का फैसला किया। पहली गाय से मिली सफलता और अच्छी आमदनी ने उनका हौसला काफी बढ़ा दिया था। धीरे-धीरे उन्होंने उसी गाय की बछड़ियों को पालकर अपने पशुओं की संख्या बढ़ानी शुरू की। मेहनत रंग लाई और देखते ही देखते उनके पास गायों की संख्या बढ़कर 10 तक पहुंच गई।
वर्तमान समय में आलोक के पास 7-8 दुधारू गायें हैं, जो उनके डेयरी फार्म की मुख्य ताकत हैं। इन गायों से हर रोज भारी मात्रा में दूध का उत्पादन होता है, जिसे स्थानीय दुग्ध समितियों और बाजारों में बेचकर वे बेहतरीन मुनाफा कमा रहे हैं। आज उनका पूरा परिवार आर्थिक रूप से बेहद समृद्ध और आत्मनिर्भर हो चुका है। आलोक डेयरी व्यवसाय के गणित को समझाते हुए बताते हैं कि:
- एक अच्छी नस्ल की दुधारू गाय साल में लगभग 300 दिनों तक दूध देती है।
- यदि एक गाय से प्रतिदिन औसतन 10 लीटर दूध भी प्राप्त होता है, तो वह किसी भी छोटे या मध्यम किसान के लिए आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने का सबसे बड़ा सहारा साबित हो सकती है।
- डेयरी फार्मिंग में दैनिक नकदी प्रवाह होता है, जिससे किसानों को अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए किसी अन्य पर निर्भर नहीं रहना पड़ता।
करनाल के NDRI से लिया प्रशिक्षण और बदली ग्रामीणों की सोच
शुरुआती दौर में आलोक को महसूस हुआ कि ग्रामीण इलाकों में पारंपरिक पशुपालन के कारण लोगों को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता था। ग्रामीणों के बीच यह आम धारणा बन चुकी थी कि गायों की देखभाल करना बेहद कठिन काम है, और अक्सर सही प्रबंधन न होने के कारण पशु बांझपन जैसी बीमारियों का शिकार हो जाते हैं। इन भ्रांतियों को वैज्ञानिक तरीके से दूर करने के लिए आलोक ने खुद को शिक्षित करने का निर्णय लिया।
उन्होंने हरियाणा के करनाल में स्थित प्रसिद्ध राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (NDRI) का रुख किया। वहां उन्होंने पांच दिवसीय गहन आवासीय प्रशिक्षण कार्यक्रम में हिस्सा लिया। इस प्रशिक्षण के दौरान आलोक ने कई महत्वपूर्ण वैज्ञानिक तकनीकें सीखीं, जिनमें शामिल हैं:
- पशुओं के लिए संतुलित आहार तैयार करना।
- दूध उत्पादन बढ़ाने के लिए जरूरी फूड सप्लीमेंट्स और मिनरल मिक्चर का सही इस्तेमाल।
- पशुओं के स्वास्थ्य का प्रबंधन और मौसमी बीमारियों से उनका बचाव।
- आधुनिक डेयरी फार्मिंग की तकनीकों का उपयोग करके लागत को कम करना और मुनाफे को बढ़ाना।
करनाल से प्रशिक्षण प्राप्त कर जब आलोक वापस अपने गांव शिवहर लौटे, तो उन्होंने केवल अपने तक ही इस ज्ञान को सीमित नहीं रखा। उन्होंने ठान लिया कि वे अपने क्षेत्र के अन्य पशुपालकों की तकदीर भी बदलेंगे। इसके लिए उन्होंने गांव-गांव जाकर चौपालें लगाईं, किसानों के साथ बैठकें कीं और उन्हें वैज्ञानिक पशुपालन के फायदों के बारे में जागरूक किया। उन्होंने क्षेत्र में नई दुग्ध समितियों के गठन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे स्थानीय किसानों को उनके दूध का सही मूल्य मिलने लगा।
समाज के लिए मिसाल बनी आलोक की यह संघर्ष यात्रा
आलोक कुमार सिंह की यह प्रेरक कहानी आज के युवाओं और किसानों के लिए एक बहुत बड़ा सबक है। यह कहानी सिखाती है कि जब परिस्थितियां आपके विपरीत हों, तब भी ईमानदारी और सही रास्ते का साथ नहीं छोड़ना चाहिए। यदि आलोक ने 2006 में घूस दे दी होती, तो देश को शायद इतना प्रगतिशील और जागरूक डेयरी किसान नहीं मिल पाता।
आज वे न केवल एक सफल डेयरी व्यवसायी के रूप में सम्मानजनक जीवन जी रहे हैं, बल्कि शिवहर और आसपास के जिलों के सैकड़ों किसानों के लिए मार्गदर्शक की भूमिका निभा रहे हैं। उनका यह संघर्ष साबित करता है कि अटूट इच्छाशक्ति, सही निर्णय और वैज्ञानिक सोच के बल पर किसी भी बड़ी से बड़ी मुसीबत को एक सुनहरे अवसर में बदला जा सकता है।
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