हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने हत्या के एक संगीन मामले में सुनवाई करते हुए सह-आरोपी की जमानत याचिका को स्वीकार कर लिया है। इस मामले पर फैसला सुनाते समय अदालत ने अपराधियों और न्याय व्यवस्था को लेकर बेहद संवेदनशील और मानवीय दृष्टिकोण अपनाया। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि दुनिया में कोई भी व्यक्ति पैदाइशी अपराधी नहीं होता है, बल्कि उसके आस-पास की परिस्थितियां और हालात ही उसे अपराध के रास्ते पर धकेल देते हैं। अदालत ने सुधारवादी कानून व्यवस्था की पैरवी करते हुए कहा कि हर मनुष्य के भीतर अच्छाई की भावना मौजूद होती है, इसलिए किसी भी आरोपी को सुधार की गुंजाइश से बाहर नहीं माना जा सकता।
अदालत का मानवीय संदेश: 'हर पापी का एक भविष्य होता है'
जस्टिस संदीप शर्मा की एकल पीठ ने 2 जुलाई को इस मामले पर अपना फैसला सुनाया। उन्होंने किशोरों और युवा अपराधियों के प्रति कानून के नजरिए पर चर्चा की। न्यायाधीश ने अपने आदेश में लिखा कि जब हम गंभीर अपराधों से निपटते हैं, तो अक्सर हमारा मानवीय दृष्टिकोण पीछे छूट जाता है। उन्होंने एक बेहद दार्शनिक विचार साझा करते हुए कहा कि वास्तव में हर संत का अपना एक अतीत होता है और उसी तरह हर पापी का भी अपना एक भविष्य होता है।
उच्च न्यायालय के अनुसार, जब भी समाज में कोई अपराध जन्म लेता है, तो उसके पीछे सामाजिक ताना-बाना, आर्थिक तंगी, माता-पिता द्वारा ध्यान न दिया जाना या अत्यधिक मानसिक तनाव जैसी कई परिस्थितियां जिम्मेदार होती हैं। ऐसे में आरोपियों के प्रति केवल दंडात्मक रवैया अपनाने के बजाय उनके सुधार के अवसरों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।
क्या था यह पूरा मामला?
यह पूरा घटनाक्रम सितंबर 2025 का है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मुख्य आरोपी (जो याचिकाकर्ता का भतीजा है) और एक 24 वर्षीय युवती ने अपने परिवारों को बिना बताए गुप्त रूप से प्रेम विवाह कर लिया था। जब युवती के माता-पिता को इस विवाह और उसकी गर्भावस्था के बारे में पता चला, तो उन्होंने सामाजिक रीति-रिवाजों के अनुसार 24 सितंबर 2025 को लड़की को विदा करने का फैसला किया।
लेकिन विदाई से ठीक एक दिन पहले, यानी 23 सितंबर को युवती अचानक और संदेहास्पद परिस्थितियों में लापता हो गई। इसके बाद, एक वन रक्षक की सूचना पर पुलिस ने ऊना जिले के बरिया क्षेत्र के जंगलों से उक्त महिला का आधा जला हुआ शव बरामद किया था। मृतक लड़की की मां ने अपने दामाद और उसके चाचा पर हत्या की साजिश रचने का गंभीर आरोप लगाया था। पुलिस की जांच में सामने आया कि पैसों और गर्भावस्था को लेकर हुए आपसी विवाद के कारण पति ने ही अपनी गर्भवती पत्नी की बेरहमी से हत्या कर दी थी।
सह-आरोपी चाचा पर क्या थे आरोप?
अदालत के सामने जमानत की गुहार लगाने वाले सह-आरोपी यानी मुख्य आरोपी के चाचा पर सीधे तौर पर हत्या करने का कोई आरोप नहीं था। पुलिस के अनुसार, चाचा को अपने भतीजे द्वारा किए गए इस भयानक अपराध की पूरी जानकारी थी। इसके बावजूद उन्होंने पुलिस को सूचित करने के बजाय अपने भतीजे की मदद की और उसे गाड़ी से पठानकोट छोड़ दिया ताकि वह वहां से जम्मू में अपनी Army Unit में वापस भाग सके।
इस आरोप के तहत पुलिस ने चाचा को 25 सितंबर 2025 को गिरफ्तार किया था और तब से वह न्यायिक हिरासत में जेल में बंद था। पुलिस द्वारा मामले की चार्जशीट दाखिल किए जाने के बाद उसने अदालत से जमानत की मांग की थी।
अनुच्छेद 21 और मुकदमों में देरी पर चिंता
न्यायालय ने आरोपी को जमानत देते हुए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार पर विशेष बल दिया। कोर्ट ने कहा कि किसी भी आरोपी को त्वरित सुनवाई का अधिकार प्राप्त है। पुलिस जांच और न्यायिक प्रक्रिया की धीमी रफ्तार पर सवाल उठाते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने इस मामले में कुल 53 गवाहों की सूची पेश की है, लेकिन हैरानी की बात है कि अभी तक एक भी गवाह से पूछताछ शुरू नहीं हो सकी है।
अदालत ने कहा कि इस कछुआ चाल से चल रहे मुकदमे को खत्म होने में लंबा वक्त लगेगा। ऐसे में आरोपी को अनिश्चितकाल के लिए सलाखों के पीछे रखना 'प्री-टायल कन्विक्शन' यानी मुकदमे से पहले ही सजा भुगतने जैसा होगा। अदालत ने साफ किया कि अपराध चाहे कितना भी गंभीर क्यों न हो, वह किसी भी नागरिक से त्वरित सुनवाई के उसके अधिकार को नहीं छीन सकता।
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