अल्फा मूवी रिव्यू: स्पाई यूनिवर्स की सबसे कमजोर कड़ी साबित हुई 'अल्फा', आलिया भट्ट का एक्शन पड़ा फीका तो शरवरी ने लूटी महफिल

यशराज फिल्म्स के स्पाई यूनिवर्स की बहुप्रतीक्षित फिल्म 'अल्फा' सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है, लेकिन कमजोर कहानी और बेमेल कास्टिंग के कारण यह दर्शकों को निराश करती है।

यशराज फिल्म्स के मशहूर स्पाई यूनिवर्स की बहुप्रतीक्षित फिल्म 'अल्फा' आखिरकार सिनेमाघरों में दस्तक दे चुकी है। इस फ्रेंचाइजी ने 'एक था टाइगर', 'वॉर' और 'पठान' जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्मों के जरिए दर्शकों के बीच एक खास जगह बनाई है। इसी वजह से दर्शकों को 'अल्फा' से भी बहुत बड़ी उम्मीदें थीं। लेकिन अफसोस की बात यह है कि इस बार निर्माताओं का यह दांव पूरी तरह से उल्टा पड़ता नजर आ रहा है। देशभक्ति और बदले के नाम पर परोसी गई यह फिल्म एक बेहतरीन जासूसी थ्रिलर बनने के बजाय दर्शकों के साथ एक बड़ा धोखा साबित हुई है। इस फिल्म को देखने के बाद दर्शक खुद को बेहद ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

फिल्म के तकनीकी विवरण और मुख्य जानकारियां इस प्रकार हैं:

  • फिल्म का नाम: अल्फा
  • मुख्य भूमिकाएं: आलिया भट्ट, शरवरी, अनिल कपूर, बॉबी देओल और अन्य
  • निर्देशक: शिव रवैल
  • संगीत: रोहांश, अबीर पंडित, संचित और अंकित बलहारा
  • रिलीज की तारीख: 3 जुलाई 2026
  • फिल्म की अवधि: 140 मिनट
  • शैली: एक्शन थ्रिलर
  • रेटिंग: 1.5/5 स्टार

1999 के कारगिल युद्ध से शुरू होती 'अल्फा' की कहानी

इस फिल्म की कहानी साल 1999 में लड़े गए ऐतिहासिक कारगिल युद्ध की पृष्ठभूमि से शुरू होती है। युद्ध के मैदान में मची भीषण तबाही और भयंकर जंग के बाद भारतीय सेना के केवल दो जांबाज अधिकारी ही जीवित बच पाते हैं। इन दो किरदारों को परदे पर बॉबी देओल और अनिल कपूर ने जीवंत किया है। इस विनाशकारी जंग के समाप्त होने के बाद, देश की सुरक्षा को अभेद्य बनाने के लिए बॉबी देओल के दिमाग में एक क्रांतिकारी विचार आता है। वह भारतीय सैनिकों को सुपर-सैनिकों में तब्दील करने के लिए 'अल्फा सोल्जर' नामक एक अत्यंत गोपनीय परियोजना का प्रस्ताव रखते हैं। इस योजना का मुख्य आधार एक विशेष प्रकार का 'अल्फा सीरम' तैयार करना है, जिसे लेने के बाद सैनिकों को असीमित शारीरिक शक्ति मिल सकती है। इस महत्वाकांक्षी और चुनौतीपूर्ण मिशन में अनिल कपूर भी उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करते हैं।

कहानी में असली मोड़ तब आता है जब अनिल कपूर अपनी गंभीर रूप से बीमार पत्नी की जान बचाने के लिए इस सीरम का गुप्त रूप से इस्तेमाल कर लेते हैं। हालांकि, इसका परिणाम बेहद घातक होता है और उनकी पत्नी की जान चली जाती है। इस विश्वासघात के बाद दोनों अधिकारियों के बीच के संबंध पूरी तरह बिगड़ जाते हैं। गुस्से और नाराजगी में बॉबी देओल, अनिल कपूर की एक बेटी को जबरन अपने साथ ले जाते हैं। इसके बाद फिल्म कई साल आगे बढ़ जाती है और मुख्य कथानक व्यक्तिगत प्रतिशोध, राष्ट्रवाद और पारिवारिक विवाद के इर्द-गिर्द सिमट कर रह जाता है। फिल्म में आलिया भट्ट के किरदार का मुख्य लक्ष्य अनिल कपूर ही हैं।

कथानक में एक और बड़ा मोड़ तब देखने को मिलता है जब यह खुलासा होता है कि पड़ोसी देश पाकिस्तान ने भारतीय सेना के तंत्र में सेंध लगाने के लिए 'फतेह' नाम के एक बेहद शातिर और चतुर एजेंट को भेजा है। वह चुपके से पूरी व्यवस्था में घुसपैठ कर लेता है और खुद को 'अल्फा' के रूप में स्थापित करने में सफल हो जाता है। इसी बीच, अनिल कपूर की दूसरी बेटी यानी शरवरी भी इस उलझी हुई परिस्थितियों के बीच फंस जाती हैं। कुल मिलाकर, फिल्म की कहानी देशभक्ति के नाम पर एक जटिल और कमजोर पारिवारिक ड्रामा पेश करती है।

अभिनय का स्तर: शरवरी ने लूटी महफिल, आलिया हुईं मिसफिट

अभिनय के दृष्टिकोण से यह फिल्म दर्शकों को सबसे अधिक निराश करती है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि आलिया भट्ट भारतीय सिनेमा जगत की सबसे प्रतिभाशाली और बेहतरीन अभिनेत्रियों में से एक हैं। 'राजी' जैसी संजीदा फिल्मों में उनके शानदार अभिनय को हमेशा याद किया जाता है। लेकिन 'अल्फा' के मुख्य किरदार में वह पूरी तरह से बेमेल यानी मिसफिट नजर आती हैं। फिल्म के भारी-भरकम एक्शन दृश्यों के साथ उनका तालमेल बिल्कुल नहीं बैठ पाया है। कई दृश्यों में वे जरूरत से ज्यादा ओवरएक्टिंग करती और अजीबोगरीब हाव-भाव बनाती हुई दिखाई देती हैं, जो उनके जैसी स्थापित अभिनेत्री के स्तर के अनुकूल नहीं है।

फिल्म की रिलीज से पहले ही सोशल मीडिया पर इस बात की चर्चा जोरों पर थी कि शरवरी इस फिल्म में अभिनय के मामले में आलिया भट्ट पर भारी पड़ने वाली हैं, और सिनेमाघरों में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिलता है। हालांकि फिल्म में शरवरी को आलिया की तुलना में कम एक्शन दृश्य मिले हैं, लेकिन जितने भी दृश्यों में वे स्क्रीन पर आती हैं, अपनी दमदार उपस्थिति और बेहतरीन टाइमिंग से दर्शकों का ध्यान आकर्षित करने में सफल रहती हैं।

जब बात खलनायक के रूप में बॉबी देओल और सहयोगी भूमिका में अनिल कपूर की आती है, तो बॉबी देओल परदे पर अपनी दमदार और खूंखार उपस्थिति से प्रभाव तो छोड़ते हैं, लेकिन निर्माताओं ने उनके किरदार को जो हरियाणवी लहजा दिया है, वह उनके पूरे व्यक्तित्व को खराब कर देता है। थिएटर में संवाद अदायगी के दौरान उनका यह लहजा दर्शकों को काफी खटकता है। दूसरी ओर, अनिल कपूर अपने छोटे से किरदार में औसत लगे हैं और उन्होंने अपनी भूमिका के साथ न्याय करने का प्रयास किया है।

कमजोर निर्देशन और भटका हुआ दृष्टिकोण

फिल्म के निर्देशन की जिम्मेदारी शिव रवैल के कंधों पर थी, लेकिन स्पाई यूनिवर्स जैसी बड़ी फ्रेंचाइजी के नाम पर उन्होंने दर्शकों को केवल भव्य लोकेशन्स और भारी-भरकम बजट की नुमाइश ही परोसी है। फिल्म का निर्देशन बेहद कमजोर और दर्शकों को भ्रमित करने वाला है। ऐसा प्रतीत होता है कि फिल्म के निर्माता हाल ही में आई ब्लॉकबस्टर फिल्म 'धुरंधर' की अपार सफलता और उसके पाकिस्तान केंद्रित विषय से बहुत ज्यादा प्रभावित थे, जिसमें मुख्य किरदार हमजा पाकिस्तान की धरती पर जाकर दुश्मन के इरादों को नाकाम करता है।

हालांकि, निर्देशक शिव रवैल 'धुरंधर' जैसा रोमांच पैदा करने या स्पाई यूनिवर्स की प्रतिष्ठा को बनाए रखने में पूरी तरह से विफल रहे हैं। परदे पर अभिनेताओं को केवल स्टाइलिश पोज देते हुए दिखाया गया है, जिसके पीछे किसी भी तरह का कोई ठोस दृष्टिकोण या मजबूत पटकथा नजर नहीं आती है।

तकनीकी पहलू: शानदार सिनेमैटोग्राफी लेकिन खोखली कहानी

तकनीकी तौर पर यह फिल्म अपनी भव्यता के कारण दर्शकों को कुछ हद तक प्रभावित करती है। तोजो जेवियर की शैली की तरह ही इस फिल्म का कैमरावर्क भी बहुत ही बेहतरीन और साफ-सुथरा है। फिल्म की शूटिंग कई खूबसूरत और विदेशी लोकेशन्स पर की गई है। बर्फीले पहाड़ों पर फिल्माए गए दृश्य और कारगिल युद्ध के शुरुआती दृश्यों को बहुत बड़े पैमाने पर फिल्माया गया है, जो परदे पर देखने में काफी आकर्षक लगते हैं। लेकिन जब फिल्म की मूल कहानी ही इतनी खोखली और बेजान हो, तो खूबसूरत दृश्य और बेहतरीन विजुअल्स भी दर्शकों को बोर होने से नहीं बचा पाते।

औसत संगीत और ऋतिक रोशन का फीका कैमियो

फिल्म का संगीत भी कुछ खास कमाल नहीं दिखा पाता है और पूरी तरह से औसत श्रेणी का है। निर्माताओं ने पंजाबी गानों और एक्शन दृश्यों के दौरान पृष्ठभूमि में बजने वाले भारी संगीत का जो मिश्रण तैयार किया है, वह कुछ दृश्यों में तो ठीक लगता है, लेकिन ज्यादातर समय वह दर्शकों के लिए सिरदर्द साबित होता है।

इस पूरी फिल्म का सबसे बहुप्रतीक्षित और दमदार क्षण ऋतिक रोशन का कैमियो माना जा रहा था। जब वे फिल्म 'वॉर' के अपने लोकप्रिय किरदार कबीर के रूप में स्क्रीन पर अवतरित होते हैं, तो सिनेमाघरों में दर्शकों की तालियों की गूंज सुनाई देती है। लेकिन निराशा की बात यह है कि यहां ऋतिक रोशन का यह कैमियो भी बेहद कमजोर और बेअसर साबित होता है। अगर आप 'टाइगर 3' में शाहरुख खान के पठान वाले कैमियो जैसी उम्मीदें लेकर सिनेमाघर जा रहे हैं, तो आपको निश्चित रूप से मायूसी हाथ लगेगी।

फिल्म की मुख्य खामियां और अतार्किक बातें

'अल्फा' की कहानी में तार्किक रूप से इतनी ज्यादा कमियां हैं कि समझदार दर्शक खुद को ठगा हुआ महसूस करता है। जिस अविश्वसनीय आसानी से एक पाकिस्तानी जासूस भारतीय सेना के उच्च सुरक्षा वाले सिस्टम में प्रवेश करता है और खुद 'अल्फा' बन जाता है, वह बात गले से नीचे नहीं उतरती। किसी भी अच्छी जासूसी थ्रिलर फिल्म में एक्शन दृश्यों का यथार्थवादी होना बेहद जरूरी होता है, लेकिन यहां मुख्य अभिनेत्रियां केवल पोज देने और पारिवारिक ड्रामेबाजी में ही व्यस्त नजर आती हैं। दर्शक पूरी फिल्म के दौरान किसी भी किरदार के साथ भावनात्मक रूप से नहीं जुड़ पाते, जिसके कारण फिल्म का देशभक्ति वाला पहलू भी पूरी तरह से बेअसर और नीरस बन जाता है।

अंतिम फैसला: उम्मीदों पर पानी फेरती 'अल्फा'

संक्षेप में कहें तो, यशराज फिल्म्स के बैनर तले बनी 'अल्फा' अब तक की स्पाई यूनिवर्स की सबसे कमजोर, धीमी और निराशाजनक फिल्म साबित होती है। आलीशान लोकेशन्स और ऋतिक रोशन की संक्षिप्त उपस्थिति के अलावा इस फिल्म में दर्शकों के लिए कुछ भी नया या मनोरंजक नहीं है। आदित्य चोपड़ा का आलिया भट्ट को एक सख्त एक्शन जासूस के रूप में पेश करने का यह प्रयोग पूरी तरह से विफल साबित हुआ है। मेरी ओर से इस फिल्म को 5 में से केवल 1.5 स्टार की रेटिंग दी जाती है।

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