गंभीर बीमारी के शुरुआती संकेत
पेट और बड़ी आंत का कैंसर एक ऐसी स्वास्थ्य समस्या है, जिसकी शुरुआत अक्सर बहुत ही सामान्य और मामूली लगने वाले लक्षणों के साथ होती है। शुरुआती दौर में मरीज को पेट फूलने, गैस बनने, एसिडिटी या फिर पेट में हल्के दर्द की समस्या हो सकती है। ज्यादातर लोग इन संकेतों को सामान्य पाचन विकार समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। यही वजह है कि बड़ी संख्या में मरीज तब डॉक्टरों के पास पहुंचते हैं, जब बीमारी का प्रसार काफी आगे बढ़ चुका होता है। यदि इन समस्याओं को समय रहते नहीं समझा गया और इनका उपचार नहीं किया गया, तो यह स्थिति काफी गंभीर हो सकती है। विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि यदि पेट संबंधी परेशानियां लंबे समय तक बनी रहें या वजन में अचानक कमी आने लगे, तो इसे मामूली समझकर छोड़ना बड़ी भूल हो सकती है।
पेट के कैंसर के लक्षण और पाचन तंत्र पर प्रभाव
फरीदाबाद स्थित अमृता हॉस्पिटल के गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल सर्जरी विभाग के सलाहकार डॉ. सलीम नाइक ने बताया कि पेट के कैंसर के लक्षण पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करते हैं कि कैंसर पाचन तंत्र के किस हिस्से को प्रभावित कर रहा है। उदाहरण के लिए, यदि कैंसर भोजन नली में विकसित हो रहा है, तो रोगी को भोजन को निगलने में काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है। यदि कैंसर पेट यानी स्टमक में अपनी जगह बना चुका है, तो खाना आगे की ओर प्रवाहित नहीं हो पाता है। इसके कारण भोजन करने के तत्काल बाद ही उल्टी आने जैसी स्थिति पैदा हो जाती है। वहीं, यदि बीमारी छोटी या बड़ी आंत तक पहुंच जाए, तो उल्टी की समस्या तो बनी रहती है, लेकिन वह भोजन के कुछ समय बाद महसूस होती है।
लक्षणों को पहचानना क्यों है चुनौतीपूर्ण
डॉ. सलीम नाइक के अनुसार, पेट के कैंसर के शुरुआती लक्षण अक्सर इतने सामान्य होते हैं कि मरीज उन्हें अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। गैस बनना, पेट में भारीपन महसूस होना, हल्का दर्द या बेचैनी ऐसी समस्याएं हैं जो अन्य सामान्य बीमारियों में भी देखने को मिलती हैं। इस कारण लोग अक्सर घरेलू नुस्खों या ओवर-द-काउंटर दवाओं पर निर्भर रहते हैं। हालांकि, जब बीमारी एक स्तर से आगे निकल जाती है, तो शरीर कुछ ऐसे गंभीर संकेत देने लगता है जिन्हें अनदेखा करना मुश्किल होता है। इनमें मुख्य रूप से भूख कम लगना, बिना किसी स्पष्ट कारण के वजन तेजी से गिरना, लगातार थकान और शारीरिक कमजोरी महसूस करना, पेट का अत्यधिक फूलना, शौच का लंबे समय तक न आना या फिर मल के साथ खून का आना शामिल है।
एसिडिटी और दर्द को कब गंभीरता से लें
यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि केवल एसिडिटी होने का अर्थ कैंसर नहीं होता। एसिडिटी एक बहुत ही आम जीवनशैली जनित समस्या है, जिसके आधार पर कैंसर का निर्धारण नहीं किया जा सकता। हालांकि, यदि कोई व्यक्ति लंबे समय से एसिडिटी से जूझ रहा है और दवाओं के सेवन के बावजूद इसमें सुधार नहीं हो रहा है, या फिर यह समस्या बार-बार वापस आ रही है, तो इसे बिल्कुल भी हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। यदि एसिडिटी के स्वरूप में कोई बदलाव महसूस हो रहा है, तो सावधान होना जरूरी है। विशेष रूप से 60 वर्ष या उससे अधिक आयु के लोगों में यदि नई तरह की एसिडिटी, पेट दर्द या पाचन संबंधी कोई नई परेशानी उत्पन्न होती है, तो तुरंत किसी विशेषज्ञ चिकित्सक से परामर्श करना अनिवार्य है।
जांच ही बीमारी का सटीक पता लगा सकती है
यदि किसी व्यक्ति का वजन बिना किसी विशेष प्रयास के लगातार कम हो रहा हो, भूख में भारी कमी आ गई हो, या फिर पेट का दर्द बढ़कर पीठ तक महसूस होने लगा हो, तो यह अत्यंत चिंताजनक संकेत माना जाता है। ऐसे में खुद से दवा लेने के बजाय डॉक्टर से मिलकर विस्तृत जांच कराना ही सही कदम है। चिकित्सकीय सलाह के आधार पर एंडोस्कोपी, कोलोनोस्कोपी और अन्य उन्नत जांचों के जरिए बीमारी का वास्तविक कारण पता लगाया जा सकता है। समय रहते की गई जांच इलाज की सफलता दर को काफी हद तक बढ़ा देती है।
उपचार और जीवनशैली में बदलाव
डॉ. सलीम नाइक ने बताया कि पेट के कैंसर से पूरी तरह बचाव का कोई अचूक तरीका नहीं है, क्योंकि कई मामलों में आनुवंशिक कारण भी जिम्मेदार होते हैं। हालांकि, एक अनुशासित और स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर इस बीमारी के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। धूम्रपान और शराब के सेवन से दूरी बनाना, बासी भोजन का त्याग करना, अधिक अचार या प्रिजर्वेटिव युक्त खाद्य पदार्थों का सेवन कम करना और संतुलित आहार लेना स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है। इसके अलावा, नियमित शारीरिक गतिविधि करने से शरीर स्वस्थ रहता है और कई तरह के कैंसर का जोखिम कम हो जाता है।
पारिवारिक इतिहास और विशेष सावधानी
जिन लोगों के परिवार में पहले किसी को पेट, बड़ी आंत या भोजन नली के कैंसर की समस्या रही हो, उन्हें अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए। ऐसे व्यक्तियों के लिए नियमित स्क्रीनिंग और डॉक्टरों से समय-समय पर परामर्श लेना जरूरी है। परिवार में कैंसर का इतिहास होने पर बीमारी के विकसित होने का जोखिम सामान्य लोगों की तुलना में अधिक होता है, इसलिए लक्षणों के प्रकट होने का इंतजार करने के बजाय नियमित जांच कराते रहना ज्यादा सुरक्षित है।
कोलोनोस्कोपी का महत्व
चिकित्सकों का मानना है कि 50 वर्ष की आयु पूरी होने के बाद नियमित कोलोनोस्कोपी कराना काफी फायदेमंद होता है। बड़ी आंत के कैंसर की शुरुआत अक्सर छोटे पॉलीप से होती है, जिसे कैंसर का रूप लेने में करीब 10 साल तक का लंबा समय लग सकता है। यदि कोलोनोस्कोपी के जरिए इन पॉलीप को समय रहते पहचान कर निकाल दिया जाए, तो कैंसर होने की संभावना लगभग खत्म हो जाती है। इसीलिए 50 वर्ष के बाद इस तरह की जांच को बड़ी आंत के कैंसर से बचाव का सबसे प्रभावी माध्यम माना जाता है। जागरूक होकर और समय रहते जांच करवाकर ही इस गंभीर बीमारी से निपटा जा सकता है।
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