जापान से मिट्टी और पानी मंगवाने के पीछे क्या था पीएम मोदी का खास मकसद? जानिए 14 साल पुराना वो दिलचस्प किस्सा

जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची की भारत यात्रा के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापान के पुराने रिश्तों की चर्चा तेज हो गई है। साल 2010 में जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब उन्होंने वहां बसे प्रवासियों से एक अनोखी चीज मांगी थी।

भारत और जापान के बीच कूटनीतिक और आर्थिक संबंध हमेशा से बेहद मजबूत रहे हैं। हाल ही में जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची भारत के दौरे पर आईं, जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया। इस मुलाकात के दौरान पीएम मोदी ने जापानी प्रधानमंत्री को अपनी छोटी बहन कहकर संबोधित किया। दोनों देशों के बीच निवेश, व्यापार और आपसी साझेदारी को लेकर कई महत्वपूर्ण समझौते भी हुए, जो द्विपक्षीय संबंधों को एक नई ऊंचाई पर ले जाएंगे। लेकिन इस मजबूत रिश्ते की जड़ें बहुत पुरानी हैं, खासकर जब बात गुजरात और वहां के प्रवासी भारतीयों की आती है। इस संदर्भ में साल 2010 का एक बेहद अनोखा किस्सा आज भी चर्चा का विषय बना हुआ है, जब तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने जापान में बसे भारतीयों से कुछ ऐसा मांगा था जिसने सबको हैरान कर दिया था।

स्वर्णिम गुजरात समारोह और वह अनोखी मांग

बात आज से करीब चौदह साल पुरानी है। वर्ष 2010 में गुजरात अपनी स्थापना के 50 वर्ष पूरे होने का जश्न मना रहा था। इस ऐतिहासिक अवसर को राज्य सरकार ने 'स्वर्णिम गुजरात' समारोह के रूप में बेहद भव्य तरीके से आयोजित किया था। पूरे साल कई तरह के सांस्कृतिक और विकासपरक कार्यक्रम आयोजित किए गए। इसी समारोह की कड़ी में राज्य की राजधानी गांधीनगर में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की याद में एक भव्य स्मारक यानी 'महात्मा मंदिर' के निर्माण की योजना बनाई गई।

इस मंदिर को वैश्विक पहचान दिलाने और इसे पूरी दुनिया में फैले गुजराती समुदाय से जोड़ने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक अनूठी पहल की। उन्होंने दुनिया के अलग-अलग कोनों में रहने वाले गुजराती प्रवासियों से एक विशेष अपील की। उन्होंने आग्रह किया कि वे जिस भी देश में रह रहे हैं, वहां की थोड़ी सी मिट्टी और वहां का पवित्र जल गुजरात भेजें।

वैश्विक स्तर पर मिला जबरदस्त समर्थन

इस अनोखे अभियान के तहत जापान के साथ-साथ अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका और खाड़ी देशों में रहने वाले गुजराती संगठनों को आधिकारिक तौर पर पत्र भेजे गए थे। गुजरात सरकार की इस भावुक अपील का प्रवासी भारतीयों पर गहरा असर हुआ और उन्होंने इसे अपनी मातृभूमि से जुड़ने का एक बड़ा अवसर माना।

विशेष रूप से जापान का इस अभियान में बहुत बड़ा योगदान था। उस समय जापान गुजरात के लिए एक प्रमुख निवेशक देश के रूप में उभर रहा था और कई बड़ी जापानी कंपनियां राज्य में अपना निवेश बढ़ा रही थीं। जापान में गुजराती व्यापारियों का एक बहुत ही सक्रिय और प्रभावशाली समूह मौजूद था। पीएम मोदी के आह्वान पर जापान में बसे गुजरातियों ने बड़े उत्साह के साथ वहां की मिट्टी और जल जुटाकर भारत भेजा।

मिट्टी और पानी मंगवाने के पीछे के तीन बड़े कारण

सरकार का उद्देश्य कोई निर्माण सामग्री इकट्ठा करना नहीं था, बल्कि इसके पीछे एक गहरा और दूरगामी संदेश छिपा था। इस पहल के मुख्य रूप से तीन बड़े उद्देश्य थे:

  • वैश्विक एकता का प्रतीक: दुनिया के अलग-अलग देशों की मिट्टी और जल को एक स्थान पर मिलाकर यह दर्शाना था कि भौगोलिक दूरियों के बावजूद संपूर्ण वैश्विक गुजराती समुदाय दिल से एक है।
  • प्रवासियों की भागीदारी: इसके जरिए विदेशों में रह रहे गुजरातियों को यह महसूस कराना था कि वे भी अपने मातृराज्य के इस ऐतिहासिक स्वर्ण जयंती समारोह का एक अहम हिस्सा हैं।
  • भावनात्मक जुड़ाव: गांधीनगर का महात्मा मंदिर केवल कंक्रीट और पत्थरों से बना एक साधारण कन्वेंशन सेंटर न बनकर रह जाए, बल्कि यह वैश्विक स्तर पर बसे भारतीयों के भावनात्मक और सांस्कृतिक जुड़ाव का एक सजीव प्रतीक बन सके।

आज कहां है वह मिट्टी और पानी?

दुनियाभर से आए इस पवित्र जल और मिट्टी का उपयोग गांधीनगर के महात्मा मंदिर के निर्माण के दौरान उसकी नींव और अन्य संरचनाओं में किया गया था। आज भी जब प्रवासी भारतीय और विशेष रूप से जापान से आने वाले लोग इस भव्य परिसर को देखने आते हैं, तो वे अपनी भेजी हुई मिट्टी और जल की सुगंध को महसूस करते हैं। यह अनूठा प्रयास आज भी भारत और जापान के बीच के गहरे और आत्मीय संबंधों की एक मूक लेकिन बेहद मजबूत गवाही देता है।

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