शिक्षा से वंचित बच्चों की बदलती तस्वीर
बिहार के शेखपुरा में दस साल की रीना कुमारी अब बड़े सपने देख रही है। कभी स्कूल का दरवाजा न देखने वाली रीना अब बड़ी होकर शिक्षिका बनना चाहती है। रीना जैसे लाखों बच्चे बिहार के उन ईंट-भट्टों पर पल रहे हैं, जहां की जिंदगी अक्सर धुएं और मेहनत-मजदूरी के बीच सिमट कर रह जाती है। राज्य भर में लगभग 7000 ईंट-भट्टे संचालित हैं, जहां करीब 12 लाख मजदूर कड़ी मेहनत करते हैं। इन परिवारों के साथ रहने वाले लगभग 4 लाख बच्चे ऐसे हैं, जो स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं से आज भी दूर हैं।
पलायन और दस्तावेजों की चुनौतियां
इन श्रमिकों और उनके बच्चों के लिए शिक्षा में सबसे बड़ी बाधा बार-बार होने वाला पलायन है। रोजी-रोटी की तलाश में ये मजदूर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते रहते हैं। इस कारण न तो वे अपने बच्चों का दाखिला सरकारी स्कूलों में करा पाते हैं और न ही उनके पास स्थानीय निवास या पहचान पत्र जैसे जरूरी दस्तावेज होते हैं। प्रशासनिक जटिलताओं और निरंतर विस्थापन के कारण ये बच्चे मुख्यधारा की शिक्षा व्यवस्था से पूरी तरह कट जाते हैं।
प्रोजेक्ट स्वाभिमान का आगाज
शेखपुरा के जिलाधिकारी शेखर आनंद ने इस गंभीर समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए एक सराहनीय कदम उठाया है। उन्होंने प्रोजेक्ट स्वाभिमान की शुरुआत की है, जिसके तहत जिले के सभी 55 ईंट-भट्टों पर अक्षर लर्निंग सेंटर खोले गए हैं। इन भट्टों पर करीब 6000 मजदूर कार्यरत हैं, जिनमें से 2000 से ज्यादा प्रवासी परिवार हैं। इन परिवारों के लगभग 2000 बच्चे वहीं भट्टों पर ही निवास करते हैं, जिन्हें अब अक्षर लर्निंग सेंटर के माध्यम से बुनियादी साक्षरता प्रदान की जा रही है।
चौंकाने वाले सर्वे के आंकड़े
इस प्रोजेक्ट की शुरुआत से पहले प्रशासन द्वारा एक विस्तृत सर्वेक्षण किया गया, जिसमें जिले के 1976 श्रमिक परिवारों की स्थिति को परखा गया। इस सर्वे के परिणाम बेहद चौंकाने वाले थे:
- ईंट-भट्टों पर रहने वाले 95% वयस्क लोग पूरी तरह निरक्षर थे।
- लगभग 90% बच्चों ने अपने जीवन में कभी स्कूल का मुंह तक नहीं देखा था।
- 6 से 14 वर्ष की आयु के 95% से अधिक बच्चे ऐसे पाए गए जिन्हें हिंदी वर्णमाला के अक्षरों का ज्ञान भी नहीं था।
- इन बच्चों को 1 से 9 तक की संख्या पहचानने में भी कठिनाई हो रही थी।
प्रशासन और नींव की ईंट फाउंडेशन का सहयोग
जिला प्रशासन की इस मुहिम को जमीन पर उतारने के लिए नींव की ईंट फाउंडेशन तकनीकी और जमीनी स्तर पर मदद कर रही है। प्रोजेक्ट स्वाभिमान का मुख्य उद्देश्य इन वंचित परिवारों को जागरूक करना और उन्हें साक्षर बनाना है। जिलाधिकारी शेखर आनंद के अनुसार, ईंट-भट्टा मजदूर समाज का वह तबका है जो लंबे समय तक प्रशासनिक व्यवस्था की नजरों से ओझल रहा है। मुख्यमंत्री प्रतिज्ञा योजना के तहत 55 स्थानीय युवाओं और 71 शिक्षा सेवकों को नियुक्त कर इन केंद्रों को संचालित किया जा रहा है ताकि हर बच्चे तक शिक्षा पहुंचे।
गर्मी रोधी कमरों की विशेष व्यवस्था
ईंट-भट्टों के तपते वातावरण को ध्यान में रखते हुए, प्रशासन ने 15 भट्टों पर विशेष हीट रेजिलिएंट कमरे बनवाए हैं। इन कमरों की छतें ट्रिपल इंसुलेटेड हैं, जिससे अंदर का तापमान बाहर की तुलना में 6 से 7 डिग्री सेल्सियस कम रहता है। इसके अतिरिक्त, इन केंद्रों पर बच्चों के लिए मिनी लाइब्रेरी, स्टडी किट, इनडोर खेलकूद की सामग्री, फर्स्ट एड किट और ओआरएस कॉर्नर जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध कराई गई हैं।
जीवन में आता सकारात्मक बदलाव
आरबीएफ ईंट-भट्टे पर काम करने वाली सुमित्रा देवी और ललीता का कहना है कि वे स्वयं शिक्षित नहीं हैं, इसलिए अपने बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित रहती थीं। लेकिन अब भट्टे पर ही स्कूल खुलने से उनके बच्चे पढ़ रहे हैं। वहीं, भट्टा संचालक संतोष कुमार भी इस बदलाव को महसूस कर रहे हैं। उनके अनुसार, जिन 9 से 10 साल के बच्चों को गिनती तक नहीं आती थी, वे अब साक्षर हो रहे हैं। यह शेखपुरा मॉडल यदि राज्य के सभी 7,000 भट्टों पर लागू किया जाए, तो लाखों बच्चों का भविष्य संवर सकता है।
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