1. सिद्धनाथ मंदिर: महाभारत कालीन इतिहास और युधिष्ठिर की असीम आस्था
बहराइच शहर के ठीक बीचों-बीच स्थित घंटाघर के समीप स्थापित सिद्धनाथ मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि यह करीब 5,000 वर्ष पुराने इतिहास को अपने भीतर समेटे हुए है। सिद्धनाथ मंदिर के महामंडलेश्वर स्वामी रवि गिरी महाराज के अनुसार, इस पवित्र स्थल पर स्थापित शिवलिंग की स्थापना स्वयं धर्मराज युधिष्ठिर ने की थी। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महाभारत काल के दौरान जब पांचों पांडव यहां आए थे, तब वे इस शांत और पावन स्थान पर बैठकर भगवान शिव की विशेष आराधना किया करते थे।
आज भी इस प्राचीन मंदिर का ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व पूरी तरह बना हुआ है। शहर के मध्य में स्थित होने के कारण यहां रोजाना सैकड़ों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं, लेकिन त्योहारों और विशेष अवसरों पर यहां भक्तों का तांता लग जाता है। लोगों की ऐसी अटूट मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है और भगवान शिव अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं।
2. श्री वृद्ध मातेश्वरी माता घुरदेवी मंदिर: सांप्रदायिक सौहार्द और अटूट विश्वास की मिसाल
बहराइच जिले के जैतापुर के प्रसिद्ध बाजार के निकट स्थित श्री वृद्ध मातेश्वरी माता घुरदेवी मंदिर स्थानीय लोगों की गहरी आस्था का केंद्र है। इस मंदिर की उत्पत्ति की कथा बेहद अलौकिक है। माना जाता है कि यह मंदिर किसी मानव द्वारा निर्मित नहीं है, बल्कि भूमि की खुदाई के दौरान यहां माता की दिव्य पिंडी स्वयं प्रकट हुई थी। इस मंदिर से जुड़ी सबसे चमत्कारी और चर्चित कहानी मोहम्मद अली नाम के एक व्यक्ति की है।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, मोहम्मद अली की आंखों की रोशनी पूरी तरह से जा चुकी थी। उन्होंने मंदिर में चढ़ाए जाने वाले अत्यंत पवित्र नीर को अपनी आंखों पर लगाया, जिसके बाद उनकी आंखों की रोशनी चमत्कारी रूप से वापस आ गई। इस विस्मयकारी घटना के बाद माता घुरदेवी के प्रति उनका विश्वास इतना गहरा गया कि वह पिछले 18 वर्षों से निरंतर निस्वार्थ भाव से मंदिर की सेवा में जुटे हुए हैं। वर्तमान में मोहम्मद अली इस मंदिर समिति के अध्यक्ष हैं। उनकी यह अटूट श्रद्धा और मंदिर के प्रति समर्पण आज के दौर में हिंदू-मुस्लिम एकता और आपसी भाईचारे की एक बेहद खूबसूरत मिसाल पेश करता है।
3. गुल्लाबीर मंदिर: अज्ञातवास की स्मृतियां और 84 कोस के कोतवाल
बहराइच के सलारगंज मोहल्ले में रेलवे लाइन के समीप स्थित गुल्लाबीर मंदिर की अपनी एक अनोखी और गौरवशाली कहानी है। लोक कथाओं के अनुसार, महाभारत काल में जब पांडवों को एक वर्ष का अज्ञातवास मिला था, तब उन्होंने अपने अज्ञातवास की कुछ अवधि इसी स्थान पर व्यतीत की थी। इस प्राचीन मंदिर में संकटमोचन भगवान हनुमान जी चौरे के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
हनुमान जी के इस स्वरूप को क्षेत्र में 84 कोस का कोतवाल भी कहा जाता है, जो पूरे क्षेत्र की रक्षा करते हैं। मंदिर परिसर में समय-समय पर भव्य धार्मिक अनुष्ठानों और सुंदरकांड के पाठ का आयोजन होता रहता है। होली के त्योहार के बाद यहां लगने वाला आठे का मेला स्थानीय लोगों के लिए सबसे बड़ा आकर्षण होता है। इसके अलावा, बहराइच और आसपास के क्षेत्रों के लोग अपने बच्चों के शुभ संस्कार जैसे मुंडन, अन्नप्राशन और नए दंपतियों की सुखद वैवाहिक शुरुआत के लिए यहां आकर पूजन संपन्न कराना अत्यंत शुभ मानते हैं।
4. पंचमुखी हनुमान मंदिर: महाराज के त्याग और बंगाल के कारीगरों की अद्भुत कला
बहराइच शहर के बाहरी इलाके में सरयू नदी के पावन तट पर झिगहा घाट के पास स्थित पंचमुखी हनुमान मंदिर अपनी भव्यता के लिए प्रसिद्ध है। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहां स्थापित भगवान हनुमान की विशालकाय 39 फीट ऊंची पंचमुखी प्रतिमा है। इस अद्भुत प्रतिमा को देखने और बजरंगबली का आशीर्वाद लेने के लिए दूर-दराज के क्षेत्रों से हजारों की संख्या में भक्त यहां आते हैं। विशेष रूप से प्रत्येक मंगलवार को मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है, जिससे पूरा माहौल किसी मेले जैसा जीवंत हो जाता है।
इस भव्य प्रतिमा के निर्माण के पीछे भी एक बेहद दिलचस्प और प्रेरक इतिहास है। मंदिर के मुख्य पुजारी के अनुसार, इस विशाल प्रतिमा को आकार देने का काम बंगाल से आए अत्यंत कुशल कारीगरों ने किया था, जिसे पूरा करने में उन्हें लगभग 4 वर्ष का लंबा समय लगा था। सबसे अनोखी बात यह है कि जब इस मंदिर के निर्माण का संकल्प लिया गया था, तब धन की भारी कमी थी। उस समय इस पवित्र कार्य को शुरू करने के लिए तत्कालीन स्थानीय महाराज ने अपनी प्रिय लाइसेंसी रिवॉल्वर तक बेच दी थी। इसके बाद ही मंदिर निर्माण का कार्य सुचारू रूप से शुरू हो सका था, जो आज लाखों लोगों की आस्था का प्रमुख स्तंभ बन चुका है।
5. मां संहारणि देवी मंदिर: महाराजा सुहेलदेव के शौर्य और खड्ग पूजन की गवाह
बहराइच शहर के डिगीहा तिराहे के पास स्थापित मां संहारणि देवी मंदिर एक अत्यंत जाग्रत सिद्धपीठ माना जाता है। इस पावन स्थल पर आदि शक्ति मां चंडी के विभिन्न दिव्य स्वरूपों की पूरे विधि-विधान से पूजा की जाती है। इस मंदिर की स्थापना के पीछे का इतिहास सोमनाथ मंदिर पर हुए ऐतिहासिक आक्रमण के कालखंड से जुड़ा हुआ माना जाता है।
स्थानीय लोककथाओं और ऐतिहासिक परंपराओं के अनुसार, महान पराक्रमी महाराजा सुहेलदेव ने जब विदेशी आक्रांताओं की मुगल सेना से युद्ध लड़ा था, तो रणभूमि में उतरने से पूर्व उन्होंने इसी सिद्धपीठ में आकर विशेष तांत्रिक अनुष्ठान किया था। महाराजा सुहेलदेव ने यहां मां संहारणि देवी के चरणों में अपना खड्ग रखकर खड्ग पूजन किया था और युद्ध में विजय का अचूक आशीर्वाद प्राप्त किया था। भक्तों का ऐसा दृढ़ विश्वास है कि जो भी श्रद्धालु सच्चे और निर्मल मन से यहां आकर महाकाली की आराधना करता है, उसके जीवन के सभी रुके हुए और बिगड़े हुए कार्य अवश्य पूरे हो जाते हैं। यही वजह है कि साल के बारही महीने यहां श्रद्धालुओं की भारी उपस्थिति देखी जाती है।
6. गंगवल स्टेट की भूलभुलैया: सरयू नदी की लहरों के बीच सुरक्षित दिव्य रहस्य
बहराइच जिला मुख्यालय से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर सरयू नदी के सुरम्य तट पर एक अनोखी और अद्भुत ऐतिहासिक इमारत खड़ी है, जिसे स्थानीय लोग भूलभुलैया के नाम से जानते हैं। यह भव्य संरचना लगभग 400 वर्ष पुरानी बताई जाती है। इस इमारत की सबसे विस्मयकारी बात यह है कि इसका एक बड़ा हिस्सा लगातार सरयू नदी के जल के भीतर डूबा रहता है, लेकिन इसके बावजूद इसकी विशाल दीवारें और गुंबद आज भी पूरी मजबूती के साथ खड़े हैं, जो लोगों के कौतूहल का विषय बने हुए हैं।
स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार, इस शानदार इमारत का निर्माण तत्कालीन गंगवल स्टेट की महारानी ने करवाया था। इस ऐतिहासिक भूलभुलैया के ठीक बीच में एक अत्यंत प्राचीन मंदिर स्थापित है, जहां आज भी नियमित रूप से भगवान की पूजा-आरती की जाती है और मंदिर के पुजारी वहीं निवास करते हैं। श्रद्धालुओं का यह अटूट विश्वास है कि मंदिर की इसी दिव्य और आलौकिक शक्ति के कारण यह ऐतिहासिक इमारत सदियों की आपदाओं को झेलने के बाद भी पूरी तरह सुरक्षित है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, सावन के पवित्र महीने में यहां भव्य धार्मिक उत्सवों का आयोजन होता है, जिसमें बड़ी संख्या में भक्त शामिल होते हैं।
7. महमदा समय शक्तिपीठ मंदिर: घने जंगलों के बीच प्रकृति और आध्यात्मिकता का अनूठा मिलन
बहराइच शहर के बाहरी इलाके में स्थित डिहवा के घने जंगलों और हरी-भरी वादियों के बीच महमदा समय शक्तिपीठ मंदिर स्थित है। यह मंदिर रहस्य, असीम आस्था और अलौकिक प्राकृतिक सुंदरता का एक अद्भुत उदाहरण है। इस मंदिर की एक और भौगोलिक विशेषता यह है कि बहराइच से रुपईडीहा जाने वाली रेलवे लाइन ठीक इस मंदिर परिसर के करीब से होकर गुजरती है, जो इस स्थान को एक विशिष्ट पहचान प्रदान करती है।
चारों तरफ फैले घने जंगलों और शांत वातावरण के कारण यहां आने वाले श्रद्धालुओं को गहन मानसिक और आध्यात्मिक शांति की प्राप्ति होती है। विशेष रूप से शारदीय और चैत्र नवरात्रि के पावन दिनों में बहराइच के साथ-साथ आसपास के कई पड़ोसी जिलों से भी बड़ी संख्या में भक्त यहां माता के दर्शन के लिए आते हैं। सामान्य दिनों में भी लोग अपनी व्यस्त दिनचर्या से समय निकालकर यहां दर्शन करने और प्राकृतिक वादियों में समय बिताने आते हैं। स्थानीय मान्यताओं के कारण यह मंदिर अपने रहस्यमयी इतिहास और चमत्कारों की कथाओं के लिए भी जाना जाता है।
8. भास्कर मंदिर: बशीरगंज में भक्ति की बयार और मातृशक्ति का समागम
बहराइच शहर के बशीरगंज क्षेत्र के व्यस्त गुदरी रोड पर स्थित भास्कर मंदिर स्थानीय लोगों की दैनिक पूजा-अर्चना और धार्मिक आस्था का एक अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र है। मुख्य मार्ग के किनारे स्थित होने के बावजूद जैसे ही कोई श्रद्धालु मंदिर परिसर के भीतर कदम रखता है, उसे एक बेहद शांत और ध्यानमयी वातावरण का अनुभव होता है।
इस मंदिर की मुख्य विशेषता यह है कि यहां हर महीने आने वाली दोनों एकादशी तिथियों पर विशेष धार्मिक कीर्तन और भव्य पूजा-अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता है। इन कार्यक्रमों में स्थानीय महिलाओं की भागीदारी विशेष रूप से देखने लायक होती है, जो पूरे उत्साह के साथ भक्ति गीतों और भजनों का गायन करती हैं। नवरात्रि के पावन पर्व पर इस मंदिर की सजावट, धार्मिक अनुष्ठान और श्रद्धालुओं की भारी भीड़ मंदिर की भव्यता और आकर्षण में चार चांद लगा देती है, जिससे श्रद्धालुओं का मन श्रद्धा से सराबोर हो उठता है।
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