रांची के कुलदीप का कमाल: महज 2 डेसिमल जमीन पर उगा रहे 15 तरह की सब्जियां, दूध और पनीर के लिए भी नहीं है बाजार पर निर्भर

रांची निवासी कुलदीप ने अपनी छोटी सी जमीन पर किचन गार्डन विकसित कर आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश की है, जहां वे जैविक खाद और स्मार्ट तकनीकों से भरपूर सब्जियां उगा रहे हैं।

सीमित संसाधन में आत्मनिर्भरता की अनोखी पहल

झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाले कुलदीप ने साबित कर दिखाया है कि अगर इरादे मजबूत हों, तो बहुत कम जगह में भी शानदार खेती की जा सकती है। उन्होंने अपने घर के पास मौजूद महज 2 डेसिमल जमीन को एक आदर्श किचन गार्डन में तब्दील कर दिया है। इस छोटे से भूखंड पर वे एक या दो नहीं, बल्कि पूरे 15 तरह की सब्जियां उगा रहे हैं। उनकी इस बागवानी का सबसे बड़ा आकर्षण यह है कि वे पूरी तरह से जैविक तरीकों का पालन करते हैं और बाजार की निर्भरता को लगभग खत्म कर दिया है।

गोबर खाद का जादुई असर

कुलदीप अपनी इस सफलता का पूरा श्रेय मिट्टी को तैयार करने में अपनाए गए वैज्ञानिक तरीके को देते हैं। उनके अनुसार, पौधों के लिए सड़ा हुआ गोबर किसी ब्रह्मास्त्र से कम नहीं है। वे पिछले 4 से 5 वर्षों से लगातार गोबर जमा कर रहे हैं। उनके पास 3 साल पुरानी खाद का भंडार हमेशा उपलब्ध रहता है, जिसे वे समय-समय पर मिट्टी में मिलाते हैं। वे बताते हैं कि खाद को और अधिक उपजाऊ बनाने के लिए इसमें थोड़ी मात्रा में केंचुआ खाद और बेहद कम यूरिया का मिश्रण भी किया जाता है। कीटनाशकों के उपयोग से बचने के लिए वे नीम के तेल और नीम के पानी का छिड़काव करते हैं, जो पौधों को बीमारियों से सुरक्षित रखता है।

किचन वेस्ट का बेहतरीन इस्तेमाल

कुलदीप ने वेस्ट मैनेजमेंट का एक शानदार मॉडल भी पेश किया है। उनके घर से निकलने वाले किचन वेस्ट को वे फेंकते नहीं हैं। रसोई से निकले गीले कचरे को 10 से 15 दिनों तक सड़ाया जाता है और फिर उसे 20 दिन के अंतराल पर पौधों की जड़ों के पास डाला जाता है। उनका मानना है कि यह प्रक्रिया न केवल पौधों को पोषण देती है, बल्कि यह उन्हें कीटों के प्रकोप से भी बचाती है। इसी तकनीक के दम पर उन्हें बाजार से खरीदी गई सब्जियों की तुलना में कहीं अधिक शुद्ध और ऑर्गेनिक उपज मिलती है।

दूध, पनीर से लेकर फल तक सब कुछ घर में

कुलदीप का यह किचन गार्डन केवल सब्जियों तक सीमित नहीं है। उन्होंने अपने इस छोटे से फार्म में 2 गाय भी पाल रखी हैं। इन गायों से मिलने वाले दूध का वे घर पर ही पनीर बनाने में उपयोग करते हैं। इसके अलावा, यहां मुर्गी पालन भी किया जाता है, जिससे उन्हें अंडे और मांस की जरूरतों के लिए कहीं बाहर नहीं जाना पड़ता। उनके बगीचे में कटहल, आम और सहजन के पेड़ भी लगे हैं। भिंडी, कच्चा केला और सहजन जैसी सब्जियां उनके दैनिक भोजन का हिस्सा बनती हैं। वे बताते हैं कि हर दिन उनके बगीचे से करीब 1 किलो भिंडी निकलती है, जबकि कटहल का इस्तेमाल कोफ्ता, सब्जी और अचार बनाने में किया जाता है।

बाजार जाने की जरूरत खत्म

कुलदीप का यह स्मार्ट प्रयास आज के समय में बहुत प्रेरणादायक है। वे कहते हैं कि अब उन्हें किसी भी सब्जी या दूध-पनीर के लिए बाजार के चक्कर नहीं काटने पड़ते। अपने घर की जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ वे एक स्वस्थ और आत्मनिर्भर जीवन शैली अपना रहे हैं। उनकी इस मेहनत और लगन से यह स्पष्ट होता है कि अगर हम अपनी मिट्टी और कचरे का सही प्रबंधन सीख लें, तो अपनी रसोई की जरूरतें घर पर ही पूरी करना बहुत आसान है।

https://hindi.news18.com/news/jharkhand/ranchi-unique-kitchen-gardening-tips-of-ranchi-kuldeep-from-vegetables-to-milk-local18-ws-l-10610941.html