संघर्ष से सफलता तक का सफर
झारखंड की राजधानी रांची के पास स्थित बेड़ों गांव में रहने वाली सावित्री खजूर की कहानी उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा है, जो जीवन में विपरीत परिस्थितियों के बावजूद आगे बढ़ना चाहते हैं। सावित्री का जीवन एक समय ऐसा था जब उन्हें अपनी आजीविका चलाने के लिए दूसरों के खेतों में मजदूरी करनी पड़ती थी। आर्थिक तंगी और जानकारी के अभाव में उनका जीवन काफी सीमित था। सावित्री बताती हैं कि एक वक्त था जब उन्हें स्मार्टफोन के उपयोग और स्कूटी चलाने जैसी बुनियादी चीजों की भी जानकारी नहीं थी। उस समय उन्हें यात्रा करने के लिए ऑटो रिक्शा में 20 लोगों के साथ बैठकर जाना पड़ता था, जो काफी कष्टकारी होता था। लेकिन आज सावित्री अपनी मेहनत के दम पर अपनी खुद की बॉस बन चुकी हैं और आत्मनिर्भर जीवन जी रही हैं।
जैविक खेती और नर्सरी से बदली किस्मत
सावित्री खजूर आज अपनी खुद की नर्सरी का संचालन करती हैं। उन्होंने अपनी छोटी सी जमीन पर विभिन्न प्रकार के पौधे तैयार किए हैं, जिनमें महोगनी, आम, जामुन और अन्य फलदार पेड़ों की किस्में शामिल हैं। उनकी सफलता का मुख्य आधार जैविक खेती है। वह खुद अपने हाथों से ब्रह्मास्त्र, नीमस्त्र और अग्निअस्त्र जैसी जैविक दवाइयां तैयार करती हैं। इन दवाइयों को बनाने के लिए वह सहजन के पत्ते, गुड़, सड़ा हुआ गोबर, रसोई से निकलने वाले जैविक कचरे और सब्जियों के छिलकों का इस्तेमाल करती हैं। इन जैविक उत्पादों को तैयार करके और अपनी नर्सरी के माध्यम से वह हर महीने 50000 रुपये से अधिक की कमाई कर रही हैं। उनकी इस मेहनत का परिणाम यह है कि आज उनके बच्चे प्राइवेट स्कूल में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं और उनके पास आधुनिक सुविधाओं के साथ स्मार्टफोन भी उपलब्ध है, जिसका उपयोग वह अपने बिजनेस को आगे बढ़ाने के लिए करती हैं।
प्रशिक्षण ने दिखाया नया रास्ता
सावित्री की सफलता में एनजीओ 'प्रदान' द्वारा दी गई ट्रेनिंग की बड़ी भूमिका रही है। इस प्रशिक्षण के दौरान उन्हें जैविक खेती के उस मॉडल के बारे में जानकारी मिली, जिससे कम जमीन में भी बेहतर परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। उन्हें समझ आया कि किस प्रकार जैविक दवाइयों का उपयोग करके नर्सरी में बेहतरीन पौधे उगाए जा सकते हैं। उदाहरण के तौर पर, उन्होंने महोगनी के पौधों पर विशेष ध्यान दिया है, जिसे वाटरप्रूफ लकड़ी के रूप में जाना जाता है और जिसकी मांग विदेशों में भी बनी रहती है। उनके पास मौजूद एक पौधे की कीमत 300 से 400 रुपये तक होती है। फिलहाल उनकी नर्सरी में 10 से 12 तरह के फलदार पेड़ों के पौधे उपलब्ध हैं।
बाजार में ब्रांडेड उत्पादों की मांग
आज सावित्री ने अपनी मेहनत से एक बड़ा मुकाम हासिल कर लिया है। उनकी अपनी एक दुकान है, जहां वह अपने द्वारा तैयार की गई जैविक दवाइयों की ब्रांडेड पैकेजिंग करके बेचती हैं। अब किसान सीधे उनकी दुकान पर आकर इन उत्पादों को खरीदते हैं। सावित्री मानती हैं कि सरकारी योजनाओं और एनजीओ द्वारा दी गई ट्रेनिंग उनके जीवन में मील का पत्थर साबित हुई है। उन्होंने अन्य किसानों को भी प्रोत्साहित करते हुए कहा कि उन्हें नई तकनीकों को अपनाना चाहिए, ताकि वे अपनी जमीन का सही इस्तेमाल कर सकें और बेहतर लाभ कमा सकें। सावित्री की यह यात्रा साबित करती है कि दृढ इच्छाशक्ति और सही दिशा में किए गए प्रयास व्यक्ति की आर्थिक स्थिति और सामाजिक स्तर को पूरी तरह बदल सकते हैं। आज वह खुद स्कूटी चलाकर अपने सारे व्यावसायिक काम निपटाती हैं, जो उनके आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता को दर्शाता है।
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