कबीर जयंती विशेष: गृहस्थ जीवन को अलविदा कह महंत लखन मुनि ने अपनाया संन्यास का मार्ग, बताया संत जीवन का असली अर्थ

छत्तीसगढ़ के बालोद स्थित प्राचीन कबीर कुटीर तरेकेला के महंत लखन मुनि ने कबीर जयंती के मौके पर अपने जीवन के सफर और संत परंपरा के अनुशासन पर खुलकर बात की।

कबीर पंथ से जुड़ाव और संन्यास का सफर

आज 29 जून को कबीर जयंती के पावन अवसर पर छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में स्थित प्राचीन कबीर कुटीर तरेकेला के महंत लखन मुनि ने अपने जीवन के अनछुए पहलुओं को साझा किया है। उन्होंने बताया कि कबीर पंथ के साथ उनका नाता बहुत पुराना है, जो उनके दादा और परदादाओं के समय से चला आ रहा है। महंत लखन मुनि का कहना है कि वे बचपन से ही इस विचारधारा के प्रभाव में पले-बढ़े हैं, जिसने उनके भविष्य की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अपनी शिक्षा पूरी करने के सिलसिले में वे बनारस भी गए थे। बनारस से लौटने के बाद जब उन्होंने आम लोगों के गृहस्थ जीवन में व्याप्त संघर्षों, तनावों और जिम्मेदारियों को बहुत करीब से देखा, तो उनके भीतर संसार को त्यागने की भावना उत्पन्न हो गई। इसी वैराग्य ने उन्हें सांसारिक मोह-माया से दूर जाकर संत मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया। अंततः वर्ष 2010 में उन्होंने पूरी निष्ठा के साथ संन्यास धारण कर लिया।

शास्त्रों का अध्ययन और जिम्मेदारी

संन्यास लेने के बाद उन्होंने अपने ज्ञान को और अधिक विस्तार देने के लिए वृंदावन का रुख किया। वहां उन्होंने लंबे समय तक रहकर रामायण, भागवत गीता और विभिन्न भारतीय शास्त्रों का गहन अध्ययन किया। यह समय उनके जीवन में परिपक्वता लाने वाला साबित हुआ। कालांतर में अपने गुरुजी के निधन के पश्चात उन्होंने प्राचीन कबीर कुटीर तरेकेला की महत्वपूर्ण बागडोर संभाली। वर्तमान में वे न केवल इस आश्रम का कुशलतापूर्वक संचालन कर रहे हैं, बल्कि कबीर पंथ की शिक्षाओं को जन-जन तक पहुँचाने का कार्य भी कर रहे हैं।

संत जीवन में अनुशासन और समाज

महंत लखन मुनि का मानना है कि संत जीवन की परिभाषा को लोग अक्सर गलत समझ लेते हैं। उनके अनुसार, इसका मतलब केवल घर-परिवार को छोड़ देना ही नहीं है, बल्कि अपने विचारों, अपनी दिनचर्या और अपने आचरण में एक गहरा अनुशासन लेकर आना है। वे स्पष्ट करते हैं कि संत समाज से पूरी तरह कटकर नहीं रहते हैं। एक मनुष्य के रूप में उन्हें भी भूख लगती है और भोजन करना पड़ता है। आज के दौर में संत भी प्रशासनिक जरूरतों जैसे कि आधार कार्ड बनवाने या संचार के लिए मोबाइल फोन का उपयोग करने जैसी अनिवार्यताओं से बंधे होते हैं। हालांकि, उन्होंने रेखांकित किया कि सामान्य जीवन और संत जीवन में सबसे बड़ा अंतर यह है कि एक संत का जीवन स्त्रियों से दूरी और सांसारिक आसक्तियों से पूर्ण विरक्ति पर टिका होता है।

गुण और चरित्र ही मनुष्य की पहचान

संत कबीर के विचारों को आत्मसात करते हुए महंत लखन मुनि ने यह संदेश दिया कि एक व्यक्ति की असली पहचान उसके पद या वेशभूषा से नहीं, बल्कि उसके गुणों और चरित्र से होती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि कबीर साहब का मूल संदेश यही है कि चाहे कोई व्यक्ति गृहस्थ हो या फिर संन्यासी, यदि उसके भीतर अच्छे मानवीय गुण और सच्चाई का वास है, तो वही उसकी सबसे बड़ी संपत्ति है। कबीर जयंती पर महंत लखन मुनि की ये बातें समाज को संयम, सेवा और मानवता के रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित करती हैं।

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