खेती में कमाल कर रहे भोजपुर के आशुतोष पांडेय: प्रो-ट्रे तकनीक से मात्र 21 दिन में तैयार कर रहे हैं सब्जियां, उपज में भी है दम

भोजपुर के किसान आशुतोष पांडेय प्रो-ट्रे तकनीक अपनाकर खेती में नई मिसाल पेश कर रहे हैं, जिससे कम खर्च और कम समय में स्वस्थ पौधे तैयार कर बंपर पैदावार ली जा रही है।

खेती के आधुनिक तौर-तरीके

आज के दौर में कृषि क्षेत्र में लगातार नवाचार हो रहे हैं। नई तकनीकों के आने से किसान अब पारंपरिक खेती के साथ-साथ स्मार्ट खेती की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। हाइड्रोपोनिक और वर्टिकल फार्मिंग जैसी विधियां अब काफी लोकप्रिय हो रही हैं, और इसी कड़ी में प्रो-ट्रे तकनीक ने कम लागत में अधिक लाभ कमाने का एक नया रास्ता खोल दिया है। भोजपुर जिले के किसान आशुतोष पांडेय ने इस तकनीक को न केवल अपनाया है, बल्कि वे अन्य किसानों के लिए भी एक मिसाल बनकर उभरे हैं।

प्रो-ट्रे तकनीक का महत्व

प्रो-ट्रे तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि किसान सीधे खेत में बीज बोने के बजाय तैयार पौधे लगा रहे हैं। इससे फसल चक्र में लगभग एक महीने का बहुमूल्य समय बच जाता है। इसके अलावा, खेत में बीज के सीधे संपर्क में आने वाली खाद, पानी की बर्बादी और मौसम की अनिश्चितता से होने वाले नुकसान से भी किसान सुरक्षित रहते हैं। आशुतोष पांडेय बताते हैं कि व्यावसायिक दृष्टिकोण से यह तरीका बेहद प्रभावी है क्योंकि इसमें पौधों की गुणवत्ता बेहतर रहती है और उपज में भी जबरदस्त सुधार देखने को मिलता है।

नर्सरी तैयार करने की प्रक्रिया

आशुतोष पांडेय इस तकनीक के तहत हर 21 दिन के अंतराल पर नई सब्जियां तैयार कर रहे हैं। इसके लिए सबसे पहले पॉलीहाउस की मदद से तापमान को नियंत्रित किया जाता है। नर्सरी की प्रक्रिया में मुख्य रूप से प्रो-ट्रे, ऑर्गेनिक खाद और कोकोपिट ब्लॉक का उपयोग होता है। प्रक्रिया को विस्तार से बताते हुए वे कहते हैं कि कोकोपिट ब्लॉक को लगभग 5 घंटे तक पानी में भिगोना पड़ता है। इसके बाद इसकी अच्छी तरह सफाई की जाती है ताकि किसी भी तरह की अशुद्धि पौधों को नुकसान न पहुँचा सके। कोकोपिट को सुखाने के बाद इसमें खाद और बीज डाल दिए जाते हैं।

बीजों के अंकुरण का समय

विभिन्न प्रकार की सब्जियों के अंकुरण में लगने वाले समय का विवरण इस प्रकार है:

  • शिमला मिर्च और मिर्च: 8 से 10 दिन
  • प्याज: 4 से 6 दिन
  • बैंगन: 7 से 8 दिन
  • पत्ता गोभी: 2 से 3 दिन
  • टमाटर: 4 से 6 दिन
  • खीरा, करैला और नेनुआ: 18 से 21 दिन

इन ट्रे को छायादार स्थानों या शेड-नेट पॉलीहाउस में रखा जाता है, जिससे पौधे तेज बारिश, सीधी धूप और कीट-पतंगों के हमलों से सुरक्षित रहते हैं।

पारंपरिक विधि बनाम प्रो-ट्रे

जमीन पर बेड बनाकर की जाने वाली पारंपरिक नर्सरी विधि में कीट और रोगों का खतरा अधिक रहता है। इसके विपरीत, प्रो-ट्रे तकनीक से तैयार पौधे अधिक स्वस्थ और रोगाणु मुक्त होते हैं। जब इन पौधों को खेतों में रोपा जाता है, तो वे सीधे मिट्टी के अनुकूल जल्दी हो जाते हैं और अपनी विकास दर बढ़ा लेते हैं। पांडेय के अनुसार, इस तकनीक से प्राप्त पौधे खेतों में लगाने पर 100 प्रतिशत तक बेहतर उपज देने की क्षमता रखते हैं। इसके अतिरिक्त, इस विधि में खरपतवार की समस्या न के बराबर होती है और पौधे निकालते समय उनकी जड़ें भी नहीं टूटतीं।

आपातकालीन स्थितियों में सुरक्षा और लाभ

प्रो-ट्रे तकनीक का एक बड़ा आर्थिक लाभ इसका परिवहन है। पौधों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाना बेहद आसान है। बाढ़ या ओलावृष्टि जैसी प्राकृतिक आपदाओं की स्थिति में, इन ट्रे को सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित करना सरल होता है, जिससे पूरी फसल को नष्ट होने से बचाया जा सकता है। किसान इस तरह से तैयार नर्सरी की बुनियाद पर अगेती सब्जियों की खेती बड़ी आसानी से कर रहे हैं।

किसानों के लिए संदेश

आशुतोष पांडेय न केवल अपनी खेती कर रहे हैं, बल्कि अन्य किसानों को भी इस तकनीक के बारे में जागरूक कर रहे हैं। उनका मानना है कि यदि किसान बीज डालने और अंकुरित होने के लंबे इंतजार से बचना चाहते हैं, तो उन्हें प्रो-ट्रे का सहारा लेना चाहिए। इस तकनीक से खेती की लागत कम हो जाती है क्योंकि बीज बोने के बाद शुरुआती पटवन और खाद की फिजूलखर्ची से बचत होती है। बीज के बजाय तैयार पौधा लगाने का असर यह होता है कि आपकी सब्जी की फसल 3 महीने की जगह महज 2 महीने में ही फल देने योग्य हो जाती है। यह समय की बचत और अधिक मुनाफे का एक सटीक संतुलन है जो आज के किसानों के लिए अत्यंत आवश्यक है।

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