महरंग बलोच केस ने उजागर किया पाकिस्तान का असली चेहरा
बलूचिस्तान की बुलंद आवाज और मानवाधिकार कार्यकर्ता महरंग बलोच को आतंकवाद निरोधक अदालत द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा ने पाकिस्तान की न्याय प्रणाली पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस फैसले के बाद पाकिस्तान न केवल आंतरिक रूप से बल्कि वैश्विक मंच पर भी कठघरे में खड़ा दिखाई दे रहा है। महरंग ने जिस कानूनी प्रक्रिया को शुरू से ही गुप्त और पक्षपातपूर्ण करार दिया था, उसी में उन्हें दोषी ठहरा दिया गया। अब संयुक्त राष्ट्र ने भी इस पूरे घटनाक्रम पर अपनी गंभीर चिंता जाहिर की है और पाकिस्तान की न्यायपालिका से अपील की है कि वे इस फैसले को तुरंत रद्द करें।
सजा के पीछे का घटनाक्रम और अदालत का फैसला
यह पूरा मामला जुलाई 2024 में आयोजित बलोच नेशनल गैदरिंग से जुड़ा है। उस दौरान फ्रंटियर कॉर्प्स के जवान शब्बीर बलोच की मौत हो गई थी। श्रीलंका गार्जियन की एक रिपोर्ट के अनुसार, क्वेटा की एटीसी-1 अदालत के न्यायाधीश मोहम्मद अली मुबीन ने 22 जून को यह फैसला सुनाया। इस मामले में बीवाईसी की संस्थापक महरंग बलोच के साथ संगठन के नेता सिबगतुल्लाह शाह को भी उम्रकैद की सजा दी गई। अदालत का यह रुख बलोच अधिकार आंदोलन के प्रति सरकारी मशीनरी की सख्ती को दर्शाता है। गौरतलब है कि महरंग बलोच, बीवाईसी के अन्य सदस्य और उनके वकीलों ने इस सुनवाई का पूरी तरह से बहिष्कार किया था, क्योंकि उनका मानना था कि यह मुकदमा निष्पक्ष सुनवाई के बुनियादी सिद्धांतों के विरुद्ध था।
न्यायिक प्रक्रिया पर उठे बड़े सवाल
महरंग बलोच के वकील इसरार जट्टक और बीवाईसी नेताओं ने इस पूरी न्यायिक कार्यवाही को एक नाटक करार दिया है। उनके अनुसार, शब्बीर बलोच की मौत का कारण बलोच नेशनल गैदरिंग के दौरान कुछ प्रदर्शनकारियों द्वारा फेंके गए पत्थर थे, लेकिन इसका दोष महरंग बलोच और उनके साथियों पर मढ़ दिया गया। बीवाईसी के सदस्यों ने 12 जून से ही क्वेटा की हुड्डा जिला जेल में धरना शुरू कर दिया था। उनकी मुख्य मांगें निम्नलिखित थीं:
- मुकदमे को बंद कमरे के बजाय एक खुली अदालत में चलाया जाए।
- आरोपियों को अपनी पसंद का कानूनी प्रतिनिधि चुनने का पूर्ण अधिकार दिया जाए।
- सरकार द्वारा थोपे गए वकीलों को स्वीकार करने से इनकार।
महरंग की बहन और अधिवक्ता नादिया बलोच ने भी इस निर्णय को सिरे से खारिज किया है और इसे एक गुप्त अदालत का पूर्व-नियोजित फैसला बताया है।
बलूचिस्तान में सुलग सकता है असंतोष
बलोच यकजेहती कमेटी (बीवाईसी) ने एक कड़ा कूटनीतिक बयान जारी करते हुए कहा है कि महरंग को दी गई सजा वास्तव में बलोच समुदाय की पहचान को मिटाने की एक दमनकारी साजिश है। संगठन ने चेतावनी दी है कि यह फैसला बलोच युवाओं की आवाज को दबाने में नाकाम रहेगा, बल्कि यह पाकिस्तान के खिलाफ आत्मनिर्णय के अधिकार के एक नए और अभूतपूर्व ऐतिहासिक संघर्ष को जन्म देगा। जानकारों का मानना है कि इस घटना के बाद बलूचिस्तान में सरकार और स्थानीय आबादी के बीच अविश्वास की खाई और गहरी हो गई है, जो भविष्य में बड़े स्तर पर विद्रोह को हवा दे सकती है।
महरंग बलोच का संघर्ष और पारिवारिक पृष्ठभूमि
महरंग बलोच का सामाजिक और राजनीतिक सफर काफी कष्टदायक रहा है। उनके संघर्ष की जड़ें उनके निजी दुखों में छिपी हैं। उनके पिता अब्दुल गफ्फार लंगोव एक वामपंथी नेता थे, जिन्हें 2009 में जबरन गायब कर दिया गया था और तीन साल बाद उनका शव लसबेला जिले से बरामद हुआ था। इसके बाद 2017 में महरंग के भाई को भी सुरक्षा बलों द्वारा हिरासत में लिया गया और महीनों तक प्रताड़ित किया गया। इन व्यक्तिगत हादसों ने महरंग को बलूचिस्तान में गायब किए गए लोगों के खिलाफ एक मुखर चेहरा बना दिया। वे 2024 में ग्वादर सम्मेलन की मुख्य आयोजक थीं, जिसमें बलूचिस्तान के संसाधनों के शोषण का मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया था। 2025 में क्वेटा में 13 अज्ञात शवों के दफन के बाद हुए विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व करने के कारण उनकी गिरफ्तारी ने उन्हें आंदोलन का और भी बड़ा प्रतीक बना दिया।
संयुक्त राष्ट्र की कड़ी आपत्ति
मानवाधिकार रक्षकों की स्थिति पर नजर रखने वाली संयुक्त राष्ट्र की विशेष प्रतिवेदक एंड्रिया बोलानोस वर्गास ने इस फैसले पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने सोशल मीडिया मंच एक्स पर अपनी चिंता व्यक्त करते हुए पाकिस्तान की उच्च न्यायपालिका से इन दोषसिद्धियों को पलटने की पुरजोर अपील की है। वर्गास के अनुसार, इस पूरे मामले में कई गंभीर विसंगतियां देखी गई हैं, जिनमें शामिल हैं:
- आतंकवाद विरोधी कानूनों का मनमाना दुरुपयोग।
- शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन को अपराध का दर्जा देना।
- कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन और निष्पक्ष सुनवाई से इनकार।
- एक ही मामले में दोहरी सजा का प्रावधान।
संयुक्त राष्ट्र की यह फटकार पाकिस्तान की मौजूदा शहबाज सरकार के लिए एक बड़ा राजनयिक झटका मानी जा रही है, जो पहले ही अपनी गिरती साख और मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोपों से जूझ रही है।
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