सुल्तानपुर के 5 प्रगतिशील किसान, जिन्होंने केले की खेती से बदली अपनी किस्मत

उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के पांच किसानों ने धान और गेहूं जैसी पारंपरिक फसलों का मोह छोड़कर केले की व्यावसायिक खेती अपनाई है, जिससे वे लाखों का मुनाफा कमा रहे हैं।

खेती में बदलाव की नई इबारत

सुल्तानपुर जिले के किसानों ने खेती के पारंपरिक ढर्रे को चुनौती दी है। अब यहां के अन्नदाता केवल धान और गेहूं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाकर अपनी आय को कई गुना बढ़ा रहे हैं। जिले के पांच ऐसे किसान सामने आए हैं जिन्होंने केले की बागवानी को न केवल अपनाया, बल्कि इसे एक सफल व्यवसाय के रूप में स्थापित भी किया है। सरकारी सब्सिडी, कम लागत और सही मार्गदर्शन की मदद से ये किसान अब दूसरों के लिए प्रेरणा बन चुके हैं।

विमलेश सिंह: पारंपरिक खेती से इतर सफलता

लंभुआ तहसील के तेरये गांव के निवासी विमलेश सिंह उन किसानों में शामिल हैं जिन्होंने अपनी कृषि कार्यशैली में क्रांतिकारी बदलाव किया है। विमलेश बताते हैं कि जब उन्होंने धान और गेहूं की पारंपरिक खेती को छोड़कर केले की ओर रुख किया, तो उन्हें शुरुआत में थोड़ा संशय था। हालांकि, समय के साथ इस फैसले के परिणाम बेहद सकारात्मक रहे। उन्होंने अपने करीब 10 एकड़ खेत में 12,000 केले के पौधे लगाए। इस पूरी फसल को तैयार करने में उनकी कुल लागत 2 लाख रुपये आई, जिसके बदले में उन्होंने 5 लाख रुपये मूल्य का केला बाजार में बेचा। उनकी सफलता का मुख्य कारण कम लागत में बेहतर पैदावार हासिल करना है।

चंद्रप्रकाश मिश्रा: मुनाफे का नया गणित

ग्राम सभा रामपुर के किसान चंद्रप्रकाश मिश्रा का अनुभव भी कुछ ऐसा ही है। उन्होंने भी अपनी जमीन को पारंपरिक फसलों के चक्र से मुक्त कर केले की खेती को प्राथमिकता दी। चंद्रप्रकाश ने करीब आधा हेक्टेयर जमीन पर 1,800 केले के पौधे लगाए हैं। इस बागवानी के लिए उन्हें कुल 1 लाख रुपये का निवेश करना पड़ा। बेहतरीन प्रबंधन और सरकारी योजनाओं के लाभ से उन्होंने इस फसल से 6 लाख रुपये की कमाई की है। अब चंद्रप्रकाश अपने अधिकांश खेतों में केले की ही फसल उगा रहे हैं।

दलजीत वर्मा: मिश्रित खेती और तकनीक का मेल

हरिपुर बनवा गांव के निवासी दलजीत वर्मा खेती में तकनीकी नवाचार के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने 670 से अधिक केले के पौधों की बागवानी की है, लेकिन उनकी रणनीति दूसरों से थोड़ी अलग है। दलजीत केवल केले पर निर्भर नहीं हैं, बल्कि वे केले के पौधों के बीच खाली बची जगह में सब्जियों की नर्सरी भी तैयार कर रहे हैं। वे गोभी, मिर्च, लौकी और नेनुआ जैसी सब्जियों की पौध भी उगाते हैं, जिनकी बाजार में भारी मांग रहती है। इससे उन्हें एक ही समय में दोहरी आय का लाभ मिल रहा है। उन्नत कृषि विधि अपनाकर वे खेती को अधिक लाभकारी बना चुके हैं।

अनुपम यादव: युवा पीढ़ी का नया करियर विकल्प

युवा किसान अनुपम यादव ने केले की खेती को अपने करियर के रूप में चुना है। उन्होंने उद्यान विभाग से प्राप्त पौधों के साथ अपनी यात्रा शुरू की। सुल्तानपुर के रहने वाले अनुपम ने 2.5 एकड़ से अधिक भूमि पर 5,000 से अधिक केले के पेड़ लगवाए हैं। वे बताते हैं कि इस पूरी बागवानी प्रक्रिया में उनकी लागत मात्र 40,000 रुपये आई है, लेकिन मुनाफा लागत से कई गुना अधिक है। इस सफलता में उद्यान विभाग के सहायक उद्यान निरीक्षक दिनेश सिंह का मार्गदर्शन उनके लिए बहुत मददगार साबित हुआ है। अनुपम के अनुसार, केले का पौधा लगाने के लिए दो पेड़ों के बीच लगभग 6 फीट की दूरी रखना आवश्यक होता है और यह फसल करीब 12 माह में तैयार हो जाती है।

कृष्ण कुमार सिंह: सरकारी सहायता से मिली नई राह

बल्दीराय तहसील के किसान कृष्ण कुमार सिंह ने भी गेहूं और धान से हटकर केले की ओर कदम बढ़ाए हैं। उन्होंने अपनी 1 एकड़ जमीन पर 1,100 केले के पौधे रोपित किए। इस फसल के लिए उनकी कुल लागत 1 लाख रुपये आई, जिसके मुकाबले उन्होंने 3 लाख रुपये का केला बेचकर अच्छा मुनाफा कमाया। कृष्ण कुमार सिंह बताते हैं कि उन्हें जिला उद्यान विभाग से लगातार प्रोत्साहन मिल रहा है। उन्हें केले के पौधे लगाने के लिए सरकार की ओर से सब्सिडी भी प्राप्त हुई है। उन्होंने इस पूरे सफर में सहयोग के लिए जिला उद्यान अधिकारी रणविजय सिंह और सहायक उद्यान निरीक्षक दिनेश सिंह का विशेष आभार व्यक्त किया है।

निष्कर्ष

सुल्तानपुर के इन किसानों की कहानी यह सिद्ध करती है कि यदि सही तकनीक और सरकारी सहयोग का सही तालमेल बिठाया जाए, तो कृषि को एक बेहद लाभकारी व्यवसाय बनाया जा सकता है। ये किसान अब अपने आसपास के अन्य लोगों को भी प्रेरित कर रहे हैं, ताकि वे भी कम लागत वाली और अधिक मुनाफा देने वाली फसलों को अपनाकर अपनी आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ कर सकें।

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