संघर्ष और सफलता का सफर
बिहार के छपरा जिले की रहने वाली अंकिता कुमारी ने अपनी मेहनत और दृढ़ संकल्प की बदौलत बड़ी उपलब्धि हासिल की है। अंकिता ने 70वीं बिहार लोक सेवा आयोग यानी बीपीएससी परीक्षा में 272वीं रैंक हासिल की है, जिसके चलते उनका चयन अनुमंडल पदाधिकारी यानी एसडीएम के पद पर हुआ है। अंकिता की यह सफलता उन तमाम अभ्यर्थियों के लिए एक मिसाल है जो परीक्षाओं में असफलता मिलने के बाद निराश हो जाते हैं। उनकी कामयाबी ने न केवल उनके परिवार बल्कि पूरे सारण जिले का गौरव बढ़ाया है।
मेधावी छात्रा का शैक्षिक सफर
अंकिता कुमारी बचपन से ही पढ़ाई में काफी तेज रही हैं। उनकी शुरुआती पढ़ाई छपरा के सरस्वती शिशु विद्या मंदिर से हुई, जहाँ से उन्होंने वर्ष 2013 में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद उन्होंने वर्ष 2015 में छपरा के राजेंद्र कॉलेज से इंटरमीडिएट पूरा किया। उच्च शिक्षा के प्रति अपनी रुचि को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने पटना का रुख किया। पटना वीमेंस कॉलेज से उन्होंने स्नातक की डिग्री प्राप्त की और अपनी असाधारण मेधा के कारण वे गोल्ड मेडलिस्ट रहीं। उनकी शैक्षणिक यात्रा यहीं समाप्त नहीं हुई, उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से परास्नातक भी किया और वहां भी सिल्वर मेडल अपने नाम किया। अंकिता की शैक्षणिक योग्यता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने तीन बार यूजीसी-नेट परीक्षा भी सफलतापूर्वक पास की थी।
अधिकारियों का परिवार और पारिवारिक पृष्ठभूमि
अंकिता का परिवार काफी शिक्षित और प्रशासनिक पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखता है। वे सेवानिवृत्त प्रखंड विकास पदाधिकारी रसिक बिहारी सिंह की पोती हैं। उनके पिता अनिल कुमार सिंह भवन निर्माण विभाग में सहायक अभियंता के तौर पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। उनकी माता स्वर्गीय किरण देवी थीं, जिनका आशीर्वाद अंकिता के साथ हमेशा रहा। वहीं उनके नाना स्वर्गीय बिनदेश्वरी राय पौधा संरक्षण पदाधिकारी के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। अंकिता के मामा राजन कुमार वर्तमान में छपरा जंक्शन पर स्टेशन अधीक्षक के पद पर कार्यरत हैं। इस तरह के माहौल में पले-बढ़े होने के कारण उन्हें बचपन से ही प्रशासनिक सेवा में जाने की प्रेरणा मिली।
चौथे प्रयास में हासिल किया लक्ष्य
अंकिता के लिए प्रशासनिक सेवा तक का सफर आसान नहीं था। उन्होंने लगातार चार बार बीपीएससी की परीक्षा दी। शुरुआती तीन प्रयासों में उन्हें असफलता का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। 70वीं बीपीएससी में उन्होंने अपनी कमियों को सुधारा और पूरी लगन के साथ तैयारी की। अपनी इस उपलब्धि का श्रेय उन्होंने अपने माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी और अपने शिक्षकों को दिया है। उनका मानना है कि कठिन समय में परिवार और गुरुओं का मार्गदर्शन ही सबसे बड़ी ताकत साबित होता है।
14 घंटे की कड़ी मेहनत और रणनीति
अपनी सफलता की रणनीति साझा करते हुए अंकिता ने बताया कि वे प्रतिदिन 13 से 14 घंटे तक पढ़ाई करती थीं। उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे अन्य छात्रों को सलाह दी कि वे सबसे पहले अपनी नींव मजबूत करने के लिए एनसीईआरटी की किताबों का गहन अध्ययन करें। इसके साथ ही उन्होंने लक्ष्मीकांत और स्पेक्ट्रम जैसी मानक पुस्तकों को पढ़ने का सुझाव दिया। उनका यह भी मानना है कि पुराने वर्षों के प्रश्न पत्रों को हल करना और बार-बार पूछे जाने वाले विषयों पर पकड़ बनाना बहुत जरूरी है। अंकिता कहती हैं कि उन्होंने कभी भी असफलताओं से घबराकर पढ़ाई नहीं छोड़ी, बल्कि हर असफलता को अपनी कमजोरी को पहचानने का जरिया बनाया।
समाज को एक महत्वपूर्ण संदेश
एसडीएम बनने के बाद अंकिता ने समाज के लिए एक प्रेरणादायक संदेश भी दिया। उन्होंने अभिभावकों से अपील की कि वे अपनी बेटियों की शादी के लिए दहेज का पैसा जमा करने के बजाय उस पैसे को उनकी उच्च शिक्षा पर खर्च करें। उनका कहना है कि यदि एक बेटी को शिक्षित किया जाए, तो वह अपने भविष्य के साथ-साथ परिवार का नाम भी रोशन कर सकती है। अंकिता के अनुसार, लड़का और लड़की में भेदभाव करना गलत है। यदि बेटियों को पढ़ने की पूरी आजादी दी जाए, तो वे किसी भी क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने में सक्षम हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि अब उनके घर से और भी अधिकारी निकलेंगे।
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