बीमा जगत में बड़ा बदलाव
अगर अब तक आप भी यह मानकर चल रहे थे कि अस्पताल में कम से कम 24 घंटे भर्ती रहने पर ही हेल्थ इंश्योरेंस का दावा किया जा सकता है, तो अब अपनी धारणा को बदल लीजिए। स्वास्थ्य बीमा क्षेत्र में आए नए बदलावों ने लाखों बीमाधारकों के लिए बड़ी राहत की खबर दी है। अब किसी आकस्मिक समस्या या छोटे मेडिकल प्रोसीजर के लिए आपको पूरे दिन अस्पताल के बिस्तर पर रहने की मजबूरी नहीं झेलनी पड़ेगी। अब महज 2 घंटे तक अस्पताल में रहने के बाद भी आपकी इंश्योरेंस कंपनी उपचार का बिल चुकाने के लिए बाध्य होगी। हालांकि, यह सुविधा पूरी तरह से आपकी पॉलिसी के नियमों पर निर्भर करती है, इसलिए क्लेम के लिए आवेदन करने से पहले इससे जुड़ी महत्वपूर्ण शर्तों को समझना आपके लिए अनिवार्य है।
नियम में बदलाव की वजह
लंबे समय से भारत में स्वास्थ्य बीमा के लिए 24 घंटे का भर्ती नियम एक बड़ी चुनौती बना हुआ था। विशेषज्ञों के अनुसार, चिकित्सा तकनीक में हुए आधुनिक विकास के कारण अब मोतियाबिंद, कीमोथेरेपी और कई अन्य छोटे ऑपरेशन चंद घंटों के भीतर ही पूरे किए जा सकते हैं। पहले तकनीक सीमित थी, इसलिए मरीज की निगरानी के लिए 24 घंटे का समय जरूरी माना जाता था। अब समय बदलने के साथ चिकित्सा प्रक्रियाएं भी त्वरित हो गई हैं। इसके अलावा, दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में अस्पताल के एक दिन के बेड का किराया ही 15,000 से 30,000 रुपये तक पहुंच जाता है। इस बदलाव से मरीजों का बिल कम होगा, जिसका सकारात्मक असर इंश्योरेंस कंपनियों पर भी पड़ेगा और कुल चिकित्सा व्यय में कमी आएगी। IRDAI द्वारा लाए गए इस नए नियम के तहत यदि डॉक्टर को लगता है कि मरीज को इमरजेंसी, छोटी सर्जरी या स्वास्थ्य देखरेख के लिए केवल 2 घंटे की निगरानी में रखने की जरूरत है, तो उसे बीमा कवरेज का लाभ मिल सकता है।
क्या सभी बीमा कंपनियां इसे मान रही हैं?
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि यह नियम फिलहाल सभी कंपनियों पर एक साथ लागू नहीं हुआ है। आईसीआईसीआई लोम्बार्ड, केयर हेल्थ और निवा बूपा जैसी कुछ प्रमुख कंपनियों ने इस व्यवस्था को अपनी पॉलिसियों में शामिल करना शुरू कर दिया है। बाजार में कुछ कंपनियां इस सुविधा को सीधे तौर पर उपलब्ध करा रही हैं, जबकि कुछ कंपनियां इसके लिए अलग से अतिरिक्त शुल्क की मांग कर सकती हैं। बीमा कंपनियां प्रत्येक दावे की गहनता से जांच करेंगी ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि मरीज को अस्पताल में रहने की वास्तविक आवश्यकता थी या केवल सामान्य जांच के लिए भर्ती हुआ था। इसलिए, डॉक्टर की सलाह, डिस्चार्ज समरी और उपचार से संबंधित सभी जरूरी दस्तावेज संभाल कर रखना बेहद आवश्यक है।
डे-केयर और नए नियम में अंतर
बहुत से लोग इस नए 2 घंटे वाले नियम को पहले से प्रचलित 'डे-केयर' प्रोसीजर समझ रहे हैं, लेकिन दोनों में बुनियादी फर्क है। डे-केयर सुविधा में केवल उन बीमारियों की सूची शामिल होती है जो पहले से तय हैं, जैसे कि मोतियाबिंद का ऑपरेशन। इसके विपरीत, इस नए नियम का दायरा काफी व्यापक है। यदि डॉक्टर किसी भी मेडिकल कारण से आपको 2 से 3 घंटे के लिए ऑब्जर्वेशन में रखने का निर्णय लेते हैं, तो वह बीमारी चाहे लिस्ट में हो या न हो, आप क्लेम के पात्र हो सकते हैं।
क्लेम के लिए ध्यान रखने योग्य शर्तें
- पैनल अस्पताल: यह सुविधा केवल उसी अस्पताल में मिलेगी जो आपकी बीमा कंपनी के नेटवर्क या पैनल का हिस्सा है।
- पूर्व सूचना: अस्पताल में भर्ती होने से पहले या भर्ती होते ही इसकी सूचना अपनी बीमा कंपनी को दें और उनकी मंजूरी प्राप्त करें। बिना पूर्व अनुमति के किया गया क्लेम रिजेक्ट हो सकता है।
- जांच की सीमा: केवल नियमित स्वास्थ्य जांच या रूटीन टेस्ट कराने के लिए 2 घंटे रुकने पर क्लेम की पात्रता नहीं बनती है।
- अन्य नियम: पुरानी बीमारियों (Pre-existing diseases) के लिए वेटिंग पीरियड और अन्य पॉलिसी संबंधी शर्तें पहले की तरह ही यथावत लागू रहेंगी।
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