लखीमपुर खीरी के किसान की अनूठी पहल, मचान विधि से करेले की खेती कर कमा रहे हैं तगड़ा मुनाफा

उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के 60 वर्षीय किसान कामता सिंह मचान विधि का उपयोग करके करेले की खेती कर रहे हैं और प्रतिदिन 2000 रुपये तक की कमाई कर रहे हैं।

खेती में आधुनिक तकनीक का कमाल

आज के दौर में जब कई किसान पारंपरिक खेती के पुराने ढर्रे पर चल रहे हैं, वहीं लखीमपुर खीरी के प्रगतिशील किसान कामता सिंह ने आधुनिक तकनीक अपनाकर मिसाल पेश की है। साठ वर्ष की आयु पार कर चुके कामता सिंह आज भी पूरे जोश और ऊर्जा के साथ अपने खेतों में सक्रिय हैं। उन्होंने सब्जी उत्पादन को अपनी आजीविका का जरिया बनाया है और अब उनकी मेहनत रंग ला रही है। कामता सिंह का मानना है कि कृषि में नई तकनीकों का समावेश करके न केवल पैदावार बढ़ाई जा सकती है, बल्कि आर्थिक स्थिति में भी बड़ा सुधार लाया जा सकता है।

तीन बीघा में फैली हरियाली

किसान कामता सिंह इस समय लगभग तीन बीघा जमीन पर मचान विधि के माध्यम से करेले की खेती कर रहे हैं। उनके खेत में लहलहाती बेलों पर लटके करेले न केवल उनकी कड़ी मेहनत का प्रमाण देते हैं, बल्कि दूर से ही किसानों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते हैं। मचान विधि को अपनाकर उन्होंने पौधों के विकास के लिए एक आदर्श वातावरण तैयार किया है। इस पद्धति के उपयोग से बेलों को न केवल पर्याप्त मात्रा में सूरज की रोशनी मिलती है, बल्कि हवा का संचार भी बना रहता है, जिससे पौधों में बीमारियों और कीटों का प्रकोप काफी हद तक कम हो जाता है।

करेले की खेती से बेहतर मुनाफा

अपने कई वर्षों के अनुभव के बारे में बताते हुए कामता सिंह कहते हैं कि उन्होंने सब्जियों की कई तरह की खेती की है, लेकिन जितना मुनाफा उन्हें करेले से मिला है, वह किसी और फसल में नहीं था। उनका अनुभव कहता है कि करेला एक ऐसी फसल है जिसकी मांग स्थानीय बाजार और मंडियों में पूरे सीजन बनी रहती है। यही कारण है कि उन्होंने अपनी अधिकांश भूमि पर इसी फसल को वरीयता दी है।

लागत और आमदनी का गणित

मचान तकनीक के बारे में बात करते हुए कामता सिंह स्वीकार करते हैं कि पारंपरिक खेती की तुलना में शुरुआत में इसमें निवेश थोड़ा अधिक करना पड़ता है। इसमें मचान बनाने के लिए सामग्री और ढांचे की जरूरत होती है, जिस पर शुरुआती खर्च आता है। हालांकि, वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि लंबे समय में यह निवेश बहुत फायदेमंद साबित होता है। इस तकनीक के कारण उत्पादित फल की गुणवत्ता बहुत ही उच्च स्तर की होती है, जिसकी बाजार में बहुत मांग रहती है।

  • फसल की गुणवत्ता: मचान के कारण करेले जमीन के संपर्क में नहीं आते, जिससे वे साफ-सुथरे और बेहतर आकार के निकलते हैं।
  • उत्पादन में वृद्धि: इस विधि से प्रति पौधा फल की संख्या काफी बढ़ जाती है।
  • लागत की वसूली: बेहतर दाम मिलने के कारण शुरुआती लागत का बोझ जल्दी ही उतर जाता है।

अपनी दैनिक कमाई के बारे में जानकारी साझा करते हुए किसान कामता सिंह ने बताया कि वे वर्तमान में करेला बेचकर हर दिन लगभग 2000 रुपये तक का शुद्ध मुनाफा कमा रहे हैं। स्थानीय बाजारों और मंडियों में उनके द्वारा उगाए गए करेले की गुणवत्ता को देखते हुए उन्हें अपनी उपज का उचित मूल्य आसानी से मिल जाता है। उनकी सफलता को देखकर आसपास के अन्य किसान भी अब मचान विधि से सब्जी उत्पादन के लिए प्रेरित हो रहे हैं और खेती की इस नई राह को अपना रहे हैं।

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